गुरुवार, 15 सितंबर 2011

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता - चिड़िया का ज्ञान

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चिड़िया का ज्ञान

कान्ति प्रकाश त्यागी

एक दिन मैं बहुत अधिक उदास था ,
कुछ खुद से, कु्छ अपनों से परेशान था।
बैठा था बिलकुल अकेला ,
बुना था विचारों का झमेला।।

तभी एक देखी चिड़िया अकेली ,
न कोई साथी, न कोई सहेली।
देर तक वह मुझे देखती रही ,
मेरे में अपने को ढूंढती रही।।

बोली तू क्यों, विचारों में डूबा ,
लगता है, अपनों का है भूखा।
मुझे भी लगा, कोई अपना मिल गया ,
दुनिया न समझी,पर पक्षी समझ गया।।

हम दोनों ने बच्चों को बहुत ,
प्यार से पाल कर बड़ा किया।
धीरे धीरे उड़ने का ज्ञान दे,
हमने ही उन्हें उड़ने दिया।।

अपनी चोंच से हमने उन्हें दाना खिलाया ,
खुद भीग कर, उन्हें घोंसले में सुलाया।

जब उनके पंख निकले , तो वे उड़ गए ,
अन्जान दिशाओं में न जाने वे कहां गए।
रह गए हम अकेले, नितान्त अकेले अब ,
पता नहीं जीवन में फिर हम मिलेंगे कब।।

पर देख ! तू तो बहुत भाग्यशाली है ,
तेरे साथ कम से कम, तेरी घरवाली है ई
कम से कम एक दूसरे से कुछ तो कहोगे ,
मेरी तरह जीवन भर अकेले यूं नहीं मरोगे।

तेरे बच्चे भी सीख कर चले गए हैं ,
मेरे बच्चों की तरह दूर उड़ गए हैं।
जब उनके बच्चों के पंख निकल जायेंगे ,
वे भी उड़कर कहीं बहुत  दूर चले जायेंगे।।

उन्हें महसूस होगा, अपनों के बिछुड़ने का गम ,
शायद तभी याद आ आयेंगे, हम ऒर तुम।
मेरे तो मेरे पास कभी नहीं आयेंगे ,
यदि आये भी तो, माँ  नही बुलायेंगे

आज़ से मैंने यहां, रोज़ आने की ठानी ,
तेरी सुनूंगी, अपनी सुनाउंगी, राम कहानी।
खुश रहे जीवन की है  यही  लम्बी कहानी ,
जो समझे ज्ञानी, जो न समझे अज्ञानी।।

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, बिहार की कलाकृति)

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