रविवार, 11 सितंबर 2011

हरीश नारंग की कविता - देशवासी यह कब तक सहेंगे

 

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हादसा फिर एक घटा

दिल्ली में फिर बम फटा

वो अपना काम कर गए

कितने घायल कितने मर गए

 

नेता लोग फिर जागे

अस्पतालों की और भागे

पहले पहुँचने की दौड़ लग गयी

नंबर बनाने की होड़ लग गयी

टी वी पे फिर एक बहस छिड़ गयी

एक पार्टी दूसरी पार्टी से भीड़ गयी

 

एक ने दूसरी पे आरोप लगाया

पलटवार में उसने भी दोष लगाया

यूं ही सारा दिन चीखते चिल्लाते रहे

अपने को ही पाक दामन बताते रहे

असली मुद्दे से सभी दूर थे

अपने ढपली पीटने पर मजबूर थे

किसी को भी मृतकों का ख्याल न था

परिजनों को मदद देने का सवाल न था

बातों का कहीं कोई अभाव नहीं था

किसी के पास कोई भी सुझाव नहीं था

 

अस्पताल में घायल चीख चिल्ला रहे थे

घर वाले उनसे मिल नहीं पा रहे थे

क्योंकि नेता लोग आ जा रहे थे

मानो बस उनका यही फ़र्ज़ बाकी था

सभी अपनी पीठ थपथपा रहे थे

फुर्सत किसको थी कि जो देखे

कफ़न के भी पैसे वसूले जा रहे थे

न यह पहली बार है , न यह अंतिम बारी है

आतंकवादियों का कहर अभी जारी है

कल हुआ , कल फिर दोहराया जाये गा

पार्टियों को भिड़ने का अवसर , फिर दिलाया जाए गा

नेता फिर वाही पुराने बाते कहें गे

प्रशन यह है

देशवासी यह कब तक सहें गे !!!

 

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हरीश नारंग

15, अरावली अपार्टमेंट्स

अलकनंदा, नई दिल्ली

5 blogger-facebook:

  1. देशवासियों को भी तो इसी में मजा आता है, जिस दिन हर परिवार में एक की बलि चढ़ जायेगी उसी दिन सबकी समझ में आयेगी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही स्टिक कहा है आपने, आजकल ऐसे ही हो रहा है| लेकिन अब जागना होगा| बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. amita kaundal4:50 am

    ati sunder kavita. har dil ki pida ko darsha rahi. aur har bharatvasi yehi puch raha hai kab tak aakhir kab tak.
    saadar,
    amita kaundal

    उत्तर देंहटाएं

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