शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - भेड़ों को नोटिस

यशवंत कोठारी

भेड़ियों को अपनी छवि की बड़ी चिन्‍ता थी। उनकी छवि लगातार मलिन हो रही थी। वे चिन्‍ता में कमेटियां बना रहे थे। मिटिगें कर रहे थे मगर छवि में सुधार नहीं हो रहा था। उन्‍होने चिन्‍तकों को बुलाया। चिन्‍तन किया। बैठके की मगर छवि में सुधार नहीं हुआ। इधर जंगल में अराजकता का माहोल हो रहा था। भेड़ों ने भेड़ियों के नियम, कानून की परवाह करना बन्‍द कर दिया गया था। भेड़िये अपने भेड़ियेपन के साथ, सीन पर मौजूद तो थे, मगर उनके हाथ से सत्‍ता निकल जाने का डर बन गया था। भेड़िये सब तरफ से परेशान हो गये थे। इधर भेड़ों के रेवड़ के रेवड़ जनपथ पर निकल आये थे। वे भेड़ियों के निरकुंश शासन को चुनौती दे रहे थे, भेड़ियों के समझ में कुछ नहीं आ रहा था, एक बूढ़े भेड़िये ने कहा चिन्‍ता की कोई बात नहीं है, ये भेडें सरकार नहीं गिरा सकती और न ही ये भेड़े चुनाव में खड़ी होकर हमारा मुकाबला कर सकती है, वैसे भी चुनाव अभी बहुत दूर है, घबराने की बात नहीं है। भेड़ों को झुण्‍ड़ों से अलग करो․․․․बस।․․․

बूढे़ भेड़िये की बात युवा भेड़ियों को समझ में आ गई उन्‍होने भेड़ों के झुन्‍ड के गडरियों को नोटिस देने शुरु कर दिये। भेड़ियों ने अलग से एक नोटिस मंत्रालय की स्‍थापना कर दी, उन्‍होनें हर भेड़ के लिए एक नोटिस तैयार कर दिया। पचास साल पुराने भेड़ के दादा-परदादा के समय का मामला निकाल कर नोटिस जारी कर दिये गये। गडरिये इन नोटिसो को नहीं समझ पाये, मगर वे भेड़ों को हांकने के काम से कतराने लगे। लेकिन भेड़ें अब स्‍वयं गडरियों की तरह बन गई थी। ऐसी ही एक भेड़ को नोटिस के लिए मुख्‍य भेड़िये ने सचिव से कहा इस बड़ी मोटी ताजी भेड को भी एक नोटिस टिका दों।

लेकिन सर इस के खिलाफ कोई मामला ही नहीं है। इसने कुछ किया ही नहीं हैं।

इसे इसी बात का नोटिस दे दो कि इसने अभी तक कुछ किया क्‍यों नहीं कुछ नहीं करके यह हमारी सत्‍ता का मखौल उड़ा रही है। इसे इसी बात का नोटिस जारी कर दो।

यस सर!

और सुनो। उस दूसरी भेड़ को भी नोटिस दे दो। लेकिन सर उसने माफी मांग ली है। माफी से क्‍या होता है। अगर सब ने माफी मांग ली और हमने माफी दे दी तो तुम्‍हारा नोटिस मंत्रालय तो बन्‍द हो जायगा। मंत्रालय बन्‍द होने के नाम से ही प्रभारी भेड़िये को दिन में तारे नजर आने लग गये। उसने सरकारी प्रेस से लाखों नोटिस छपवा दिये और हर भेड को नोटिस थमा दिया।

जंगल में हाहाकार मच गया। हर बाशिन्‍दे के पास एक नोटिस था। पेड़ खतम हो गये क्‍योंकि सब पेड़ों का कागज बनवा लिया गया था। भेड़े हैरान परेशान थी। एक भेड को तो इस बात का नोटिस मिल गया कि उसने उसी नदी से पानी पिया था जिस नदी पर भेड़िये नहाते थे। एक अन्‍य भेड को नोटिस इस कारण मिल गया के वह नदी में नहा रही थी। भेड़िये अपनी सफलता से खुश थे जंगल में शेर भी था, मगर भेड़ियों के सामने उसकी कुछ नहीं चल रही थी वो अपने शेरत्‍व को बचाये रखने में मगन था, मगर शेरत्‍व भेडियत्‍व के सामने बौना था। माफीनामे के कागज नोटिसों के नीचे दब गये थे। भेड़ें हैरान परेशान थी, गडरिये उन्‍हे लेकर जनपथ के चौराहे पर खड़े थे क्‍योंकि आगे भेड़ियों के नोटिस मंत्रालय के मंत्री, सचिव, अतिरिक्‍त सचिव, संयुक्‍त सचिव, उपसचिव, निदेशक डेस्‍क अधिकारी, डेस्‍क अटैची जैसे लोगों की फौज खड़ी थी और उनके हाथो में नोटिसों के ब्रहमास्‍त्र थे। नोटिस देने के अलावा भेड़ियों ने बाकी सब काम बन्‍द कर दिये है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. किरण-केजरीवाल का, खेला करो खराब |
    (१)
    सरकारी बन्धुआ मिले, फ़ाइल रक्खो दाब,
    किरण-केजरीवाल का, खेला करो खराब |

    खेला करो खराब, बहुत उड़ते हैं दोनों --
    न नेता न बाप, पटा ले जायँ करोड़ों |

    कह सिब्बल समझाय, करो ऐसी मक्कारी,
    नौ पीढ़ी बरबाद, डरे कर्मी-सरकारी ||

    (२)
    खाता बही निकाल के, देखा मिला हिसाब,
    फंड में लाखों हैं जमा, लोन है लेकिन साब |

    लोन है लेकिन साब, सूदखोरों सा जोड़ा,
    निकले कुल नौ लाख, बचेगा नहीं भगोड़ा |

    अफसर नेता चोर, सभी को एक बताता |
    फँसा केजरीवाल, खुला घपलों का खाता ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. khata dekho sibbal ka, milegaa ajagar bhari,
    karodon lutaa kar usane chandani chauk seet mari,
    chandani chauk seet mari karata ab makkari,
    lekin annaa jee ne bhi isako badle ki ghutaki pilaai,
    kahe raavat kaviraay sibbal ke hosh ud rahe hain,
    kangresi anna hajaare ke aandolan se dar rahe hain !

    उत्तर देंहटाएं

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