शनिवार, 17 सितंबर 2011

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की रचनाएँ


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दोहे


                यह जीवन बहुरूपिया
            

रात-दिवस, पूनम-अमा, सुख-दुःख, छाया-धूप।
यह जीवन बहुरूपिया, बदले कितने रूप॥

समय बदलता देख कर, कोयल है चुपचाप।
पतझड़ में बेकार है, कुहू- कुहू का जाप॥

हंसों को कहने लगे, आँख दिखाकर काग।
अब बहुमत का दौर है, छोड़ो सच के राग॥

अपमानित है आदमी, गोदी में है स्‍वान।
मानवता को दे रहे, हम कैसी पहचान॥

मोती कितना कीमती, दो कौड़ी की सीप।
पथ की माटी ने दिये, जगमग करते दीप॥

लेने देने का रहा, इस जग में व्‍यवहार।
जो देगा सो पायेगा, इतना ही है सार॥

इस दुनिया में हर तरफ, बरस रहा आनन्‍द ।
वह कैसे भीगे, सखे! जो ताले में बन्‍द॥

जीवन कागज की तरह, स्‍याही जैसे काम।
जो चाहो लिखते रहो, हर दिन सुबहो-शाम॥

नयी पीढ़ियों के लिए, जो बन जाते खाद।
युगों युगों तक सभ्‍यता, रखती उनको याद॥

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दोहे 


                अपनेपन की गन्‍ध 
           

कहने को कहते रहें, सब ही इसे असार।
सदा सारगर्भित रहा, यह सुन्‍दर संसार॥

द्रवित हो गये देखकर, जो औरों की पीर।
वंदनीय वह दे सके, जो परमार्थ शरीर॥

लेने की वारी रहा, कितना रस, सुख चैन।
देने में क्‍यों हो गये, लाल तुम्‍हारे नैन॥

स्‍वार्थ के अवलम्‍ब पर, जीवित हो सम्‍बन्‍ध।
जीवन भर नही आयेगी, अपनेपन की गन्‍ध॥

रे मन, पतझड़ को यहां, रूकना है दिन चार।
जीवन में आ जायेगी, फिर से नयी बहार॥

मन की शक्‍ति से सदा, चलता यह संसार।
टूट गया मन तो समझ, निश्चित अपनी हार॥

भेषज बहु बाधा हरे, कितने मिले प्रमाण।
पर जीवन भर भेदते, कटु वाणी के बाण॥

कठिन काम कोई नहीं, जारी रखो प्रयास।
आ जायेगी एक दिन, स्‍वंय सफलता पास॥

कभी नहीं कम हो सके, जग में खिलते फूल।
कमी तुम्‍हारी ही रही, रहे बीनते शूल॥

कौन महत्‍तम, कौन लघु, सब का अपना सत्‍व।
सदा जरूरत के समय, मालूम पड़ा महत्‍व॥

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दोहे 


                विष से भरी बयार 
          

किस से अपना दुःख कहें, कलियाँ लहूलुहान।
माली सोया बाग में, अपनी चादर तान॥

कपट भरे हैं आदमी, विष से भरी बयार।
कितने मुश्किल हो गये, जीवन के दिन चार॥

खो बैठा है गाँव भी, रिश्तों की पहचान।
जिस दिन से महँगे हुए, गेहूँ, मकई, धान॥

खुशियाँ मिली न हाट में, खाली मिली दुकान।
हानि-लाभ के जोड़ में, उलझ रहे दिनमान॥

चौराहे पर आदमी, जाये वह किस ओर।
खड़े हुए हैं हर तरफ, पथ में आदमखोर॥

जीवन के इस गणित का, किसे सुनायें हाल।
कहीं स्‍वर्ण के ढे़र हैं, कहीं न मिलती दाल॥

सीख सुहानी आज तक, उन्‍हें न आयी रास।
तार तार होता रहा, बया तुम्‍हारा वास॥

घर रखवाली के लिए, जिसे रखा था पाल।
वही चल रहा आज कल, टेढ़ी मेढ़ी चाल॥

द्वारे द्वारे घूमकर, आखिर थके कबीर।
किसको समझायें यहाँ, मरा आँख का नीर॥

शेर सो रहे मांद में, बुझे हुए अंगार।
इस सुषुप्त माहौल में, कुछ तू ही कर यार॥

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नवगीत


गांव तरसते हैं
त्रिलोक सिंह ठकुरेला

सुविधाओं के लिए अभी भी गांव तरसते हैं।
सब कहते इस लोकतन्‍त्र में
शासन तेरा है,
फिर भी ‘होरी’ की कुटिया में
घना अंधेरा है,
अभी उजाले महाजनों के घर में बसते हैं।

अभी व्‍यवस्‍था
दुःशासन को पाले पोसे है,
अभी द्रौपदी की लज्‍जा
भगवान - भरोसे है,
अपमानों के दंश अभी सीता को डसते हैं।

फसल मुनाफाखोर खा गये
केवल कर्ज बचा,
श्रम में घुलती गयी जिन्‍दगी
बढ़ता मर्ज बचा,
कृषक सूद के इन्‍द्रजाल में अब भी फँसते हैं।

रोजी - रोटी की खातिर
वह अब तक आकुल है,
युवा बहिन का मन
घर की हालत से व्‍याकुल है,
वृद्ध पिता माता के रह रह नेत्र बरसते हैं।
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- बंगला संख्‍या- एल 99,
रेलवे चिकित्‍सालय के सामने,
आबूरोड़ - 307026 (राज.)

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त्रिलोक सिंह ठकुरेला

(संक्षिप्‍त परिचय)

जन्‍म तिथि ः 01-10-1966

जन्‍म स्‍थान ः नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्‍तर प्रदेश

पिता का नाम ः श्री खमानी सिंह

माता का नाम ः श्रीमती देवी

साहित्‍य सृजन ः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में, कविता, दोहे,

गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्‍डलियां, बालगीत,

लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित

प्रकाशित कृति ः नया सवेरा (बालगीत संग्रह)

प्रकाशक - राजस्‍थानी ग्रंथागार, जोधपुर

संकलन ः सृजन संगी, निर्झर, कारवां, फूल खिलते रहेंगे,

देशभक्‍ति की कविताएं (काव्‍य संकलन)

नवगीत ः नई दस्‍तकें (नवगीत संकलन)

हाइकु-2009 (हाइकु संकलन)

राजस्‍थान के लघुकथाकार, चमत्‍कारवाद,

देश विदेश की लघुकथाएं,

लघुकथा संसार ः मां के आस-पास

(लघुकथा संकलन)

जतन से ओढ़ी चदरिया (विशिष्‍ट संकलन)

भारतीय लघुकथा संसार (संदर्भ ग्रंथ)

सम्‍मान ः 1) आबू समाचार के दशाब्‍दि समारोह पर

राजस्‍थान के माननीय शिक्षा मंत्री द्वारा

सम्‍मानित

2) हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन प्रयाग द्वारा

वाग्‍विदांवर सम्‍मान

3) पंजाब कला साहित्‍य अकादमी, जालंधर

द्वारा विश्‍ोष अकादमी सम्‍मान,

4) विक्रमशिला हिन्‍दी विद्यापीठ भागलपुर

(बिहार) द्वारा विद्या वाचस्‍पति

संप्रति ः उत्‍तर पश्‍चिम रेलवे में इंजीनियर

सम्‍पर्क ः बंगला संख्‍या - एल - 99

रेलवे चिकित्‍सालय के सामने,

आबूरोड -307026 (राजस्‍थान)

ई-मेल ः trilokthakurela@gmail.com

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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