रविवार, 11 सितंबर 2011

शंकर लाल की 2 कविताएँ

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एक पिता का पत्र

मेरे प्यारे बच्चे

प्यार तो तुमसे अभी करता हूँ

मगर और भी किया होता

यदि तूने

मेरे लड़खड़ाते हुए कदमों को

तनिक सहारा दिया होता ।

 

मैंने तुम्हे पाला

अपनी जवानी के सपने बेच कर

रखा तुम्हारी हर चाहत को सहेज कर

सोचा था, बुढ़ापे में तुम रखोगे मुझे सहेज कर ।

 

लेकिन लगता है तुम्हारा रुख देखकर

की शायद में अब तुम से सम्भलता नहीं हूँ

बूढ़ा हो चला हूँ इसलिए शायद

तुम्हारी गृहस्थी में चलता नहीं हूँ ।

 

तब सोचता हूँ काश मैंने भी

तुम्हे बचपन में सहारा ना दिया होता

यूँ ही सड़क पर, तुम्हारी तरह छोड़ दिया होता

पैदा होते ही गला तुम्हारा घोट दिया होता

तो शायद, मैं आज

यूँ बेघर तो नहीं हुआ होता ।

 

प्यार तो तुमसे अभी करता हूँ

मगर और भी किया होता

यदि तूने

मेरे लड़खड़ाते हुए कदमों को

तनिक सहारा दिया होता ।

 

तुम्हारा अभागा बाप।

वर्तमान पता: अनजान सड़क

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वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है

तंग आ गया हूँ इस शहरी जिंदगी से

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

दम घुटने लगा है इन धुल भरी तंग गलियों में

अब गाँव कि उस ताज़ी हवा में

फिर से खुलकर साँस लेने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

थकने लगा हूँ गाडियों में सफर करते –करते

अब दो कदम खेत कि और

फिर से पैदल चलने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

उकताने लगा हूँ होटलों में खाना खाते-खाते

अब फिर से वो ठंडी बाजरे की रोटी

प्याज और छाछ के साथ खाने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

बहुत लुट चूका हूँ मॉल से शॉपिंग करते-करते

अब फिर से गाँव के हाट में

खरीददारी करने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

बोर होने लगा हूँ मनोरंजन के नाम पर

सिनेमा के फूहड़ नाच-गान देखते-देखते

अब फिर से वो गाँव की रामलीला

देखने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

आया था यहाँ गाँव से

खेती-बाड़ी छोडकर, पैसे कमाने के लिए

लेकिन दौड़ता हूँ रात-दिन यहाँ

दो जून की रोटी के लिए

ना वक्त पे सोता हूँ ना जगता हूँ

पता नहीं यहाँ कब सवेरा कब रात होती है

में तो बस भागता हूँ सुबह से शाम तक काम पाने के लिए

और खपा चुका हूँ पूरी जिंदगी यहाँ एक आसियाने के लिए |

घबराने लगा हूँ इस मशीनी जीवन से

अब वापस इंसान बनकर

दो पल सुस्ताने को जी चाहता है

अब वापस गाँव लौट जाने को जी चाहता है |

--

द्वारा – शंकर लाल

इंदौर-मध्यप्रदेश

Email: Shankar_kumawat@rediffmail.com

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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