रविवार, 11 सितंबर 2011

परितोष मालवीय का व्यंग्य - पूँछ

 

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पूँछ

मानव विकास विज्ञानियों के अनुसार प्रकृति के उद्भव काल से लेकर अब तक इसमें निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं। प्रकृतिवादियों के अनुसार प्रकृति की व्यवस्था संपूर्ण व निर्दोष है एवं इसमें जो भी परिवर्तन होते हैं वो इसे बेहतर बनाने के लिये ही होते हैं, जैसे बंदर से इंसान का विकास होना। पर यह जरूरी नहीं कि प्रकृति द्वारा किया गया हर परिवर्तन सही ही हो। ऐसा माना जाता है कि समय के साथ - साथ मनुष्य के अनुपयोगी अंग विलुप्त हो गये। पर मेरा मानना है कि विकास की इस दौड़ में अनुपयोगी अंगों के साथ - साथ कुछ उपयोगी अंग भी विलुप्त हो गये। मैं अपने पक्ष के समर्थन में मनुष्य की उस महत्त्वपूर्ण चीज़ का ज़िक्र कर रहा हूँ जो असमय ही काल का ग्रास बन गई अन्यथा आज की परिस्थितियों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती। वह है - पूँछ!

वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध है कि मनुष्य का विकास बंदर की ही एक प्रजाति से हुआ। निस्संदेह प्रारंभ में पूँछ मनुष्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग रही होगी। पर न जाने क्यों प्रकृति को मनुष्य तन में इसका अस्तित्व नागवार गुजरा जो इसे विलुप्त कर दिया। यदि प्रकृति की सत्ता संपूर्ण है तो उसे मनुष्य के शरीर पर ही नहीं उसके अंतर्तम पर भी ध्यान देना चाहिये था। पूँछ को मनुष्य से जुदा करते हुये प्रकृति ने एक पल भी नहीं सोचा कि ऐसे चापलूस बाबुओं और मातहतों का क्या होगा जो जुबान से मक्खन नहीं लगा पाते फलस्वरूप वांछित प्रसाद पाने से रह जाते हैं। यदि पूँछ होती तो पालतू कुत्ते की तरह पूँछ मटकाकर अपनी भावनायें तो बता देते।

दो व्यक्तियों के मध्य झगड़े का परिणाम मुँह से निकली हुई गालियों और झूठे रौब से न होकर पूँछ की अवस्थिति से होता। जिसकी पूँछ उन्नत नजर आये वो विजयी और निडर एवं जिसकी पूँछ दोनों पैरों के मध्य दबी नजर आये वो परास्त और घबराया हुआ। और तो और पीठ के मध्य भाग को खुजाने और रात को सोते समय मच्छर भगाने जैसे दुष्कर कार्य आसानी से पूँछ के हवाले किये जा सकते थे। वक्त पड़ने पर या दोनों हाथ व्यस्त होने पर पूँछ से कुछ ऐसे काम भी कराये जा सकते थे जिनमें अभी किसी अन्य व्यक्ति की मदद लेनी पड़ती है। कंप्यूटर की-बोर्ड पर टाइप करते समय माउस का संचालन पूँछ द्वारा आसानी से किया जा सकता था। रस्सी की कमी भी कुछ हद तक पूरी हो जाती। मारपीट तथा आत्मरक्षा के लिये एक और अंग मिल जाता। और ऐसे ही जाने कितने लाभ .........

पूँछ होती तो स्टाइल स्टेटमेंट भी बन सकती थी। लंबी पूँछ, छोटी पूँछ, मोटी पूँछ, पतली पूँछ, घुँघराली पूँछ, कम बालों वाली पूँछ, काली पूँछ, भूरी पूँछ, तरह - तरह के रंगों से डाई की हुई हरी-नीली-पीली पूँछ इत्यादि..........। कौन जाने पूँछ सज्जा भी एक फैशन हो जाता जिसका विज्ञापन अभिनेता और खिलाड़ी करते फिरते।

माना पतलून पहनने और उतारने में संघर्ष करना पड़ता पर उसकी व्यवस्था की जा सकती थी। एक चेन पीछे भी सही। जब बार - बार कमर से नीचे सरकती हुई दमघोंटू चुस्त जींस पहन कर भी हम यह शिकायत नहीं करते कि शरीर बेड़ियों में जकड़ा हुआ सा लग रहा है तो हम पूँछ के अस्तित्व से होने वाली कठिनाई को भी आसानी से स्वीकार कर लेते। पूँछ की आवश्यकता और उसके ब्राँड अम्बेस्डर का फैसला आप पर छोड़ता हूँ।.......

- डॉ. परितोष मालवीय

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी10:02 am

    RACHANAKAR PAR CHHAPE PURUSHOTTAM VISHVKARMA KE "HUM PRANI BIN POONCHH"VYANGYA LEKH MAI BAHUT KUCHH PALHLE HI CHHAP CHUKA HAI SO ISAKO PADHKAR KOI KHAS MAZA NANI AYAA

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