सोमवार, 19 सितंबर 2011

नजीर अकबराबादी की हास्य कविता - बरसात की बहारें

बरसात की बहारें


कीचड़ से हो रही है जिस जा जमीं फिसलनी
मुश्किल हुई है वां से हर इक को राह चलनी
फिसला जो पांव पगड़ी मुश्किल है फिर संभलनी
जूती गिरी तो वाँ से क्या ताब फिर निकलनी
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें

कितने तो कीचड़ों की दलदल में फंस रहे हैं
कपड़े तमाम गंदे दलदल में बस रहे हैं
कितने उठे हैं मर मर कितने उकस रहे हैं
वो दुख में फंस रहे हैं और लोग हंस रहे हैं
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें

गिर कर किसी के कपड़े दलदल में हैं मुअत्तर
फिसला कोई किसी का कीचड़ में मुंह गया भर
इक दो नहीं फिसलते कुछ इस में आन अकसर
होते हैं सैकड़ों के सर नीचे पाँव ऊपर
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें

ये रुत वो है कि जिस में खुर्दो कबीर खुश हैं
मदना दारीब मुफलिस शाहो वजीर खुश हैं
माशूक शादो खुर्रम आशिक असीर खुश हैं
जितने हैं अब जहां में सब ऐ नजीरर खुश हैं
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहारें

बरसात का जहान में लश्कर फिसल पड़ा
बादल भी हर तरफ से हवा पर फिसल पड़ा
भाड़ियों का मेह भी आके सरासर फिसल पड़ा
छत्ता किसी का शोर मचा कर फिसल पड़ा
कोठा झुका अटारी गिरी दर फिसल पड़ा

जिन के नए नए थे मकाँ और महल सरा
उन की छतें टपकती है छलनी हो जा बजा
दीवारें बैठती हैं छलों का है गुल मचा
लाठी को टेक कर जो सुतूं है खड़ा किया
छज्जा गिरा मुँडेरी का पत्थर फिसल पड़ा

याँ तक हर इक मकान की फिसलने को है जमीं
निकले जो घर से उस को फिसलने का है यकीं
मुफलिस गरीब पर हो ये मौकूफ कुछ नहीं
क्या फ़ील का सवार है क्या पालकी नशीं
आया जो इस जमीन के ऊपर फिसल पड़ा

देखो जिधर उधर को यही गुल पुकार है
कोई फंसा है और कोई कीचड़ में सवार है
प्यादा उठा जो मर के तो पिछड़ा सवार है
गिरने की धूमधाम ये कुछ बेशुमार है
जो हाथी रपटा ऊँट गिरा खर फिसल पड़ा

चिकनी जमी पे याँ तई कीचड़ है बे शुमार
कैसा ही होशियार पर फिसले है एक बार
नौकर का बस कुछ इसमें न आका का इख्तियार
कूचे गली में हम ने तो देखा है कितने बार
आक़ा जो डगमगाए तो नौकर फिसल पड़ा

कूचे में कोई और कोई बाजार में गिरा
कोई गली में गिर के है कीचड़ में लोटता
रस्ते के बीच पाँव किसी का रपट गया
इस सब जग्ह के गिरने से आया जो बच बचा
वो अपने धर के सेहन में आकर फिसल पड़ा

दलदल जो हो रही है हर इक जा पे रस मसी
मर मर उठा है मर्द तो औरत रही फँसी
क्या सख्त मुश्किलात है क्या सख्त बेकसी
उस की बड़ी खराबी हुई और बड़ी हंसी
जो अपने जाजरूर के अंदर फिसल पड़ा

करती है गरचे सब को फिसलनी जमीन ख्वार
आशिक को पर दिखाती है कुछ और ही बहार
आया जो सामने कोई महबूब गुल अजार
गिरने का मक्र कर के उछल कूद एक बार
उस शोख गुल बदन से लिपट कर फिसल पड़ा
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