सोमवार, 19 सितंबर 2011

दीप्ति परमार की कविताएँ

आम आदमी


आम आदमी का जीवन
आम आदमी की जरूरत
आम आदमी का भविष्य
आम आदमी की योजना
आम आदमी का जनादेश

आम आदमी के लिए रोजगार
आम आदमी के लिए सुविधाएँ
आम आदमी के लिए भविष्यनिधि
आम आदमी के लिए योजनाएँ
आम आदमी के लिए आम चुनाव

अब चर्चा में है आम आदमी
पर, आम आदमी से
आदमी निकल कर
रह गया है सिर्फ ' आम '
चारों - आम !

अब वह
न गिरता है
न उठता है
लटका हुआ है ठूँठ पर
चारों - आम !!!

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जीवन समुद्र

घहराता लहराता
पल-पल रंग बदलता
क्षण-क्षण रूप बदलता
गहरा खारा जीवन समुद्र ।

कभी शीतल कभी शांत
कभी उठाये अनंत तूफान
गहरा खारा जीवन समुद्र ।

कभी नीला तो कभी सुनहरा
कभी जैसे काला स्याह
गहरा खारा जीवन समुद्र ।

कभी दे जाये अमूल्य निधि
कभी विलीन कर दे जग सारा
गहरा खारा जीवन समुद्र ।

कभी न स्थिर रहता
परिस्थितियों की, नियति की लहरें उठाता
कभी जकड़ता कभी छोड़ता
गहरा खारा जीवन समुद्र ।

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डॉ ़ दीप्ति बी ़ परमार , एसोसिएट प्रोफेसर , हिन्दी-विभाग
आर ़ आर ़ पटेल महाविद्यालय , राजकोट

4 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर कविताएँ पढ़वाने के लिए धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  2. jeevan ke bahut kareeb dono bahut achchi kavitayen.aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  3. खुबसूरत कविताएं.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. विज्ञान और औद्यौगिकरण ने बहुत कुछ बदल दिया है, अगर कुछ नहीं बदला तो वह आम आदमी की जिंदगी है । दीप्तिजी ने आम आदमी की मनोवेदना, पीडा और विवशता की मार्मिक व्‍यंजना की है । 'जीवन समुद्र' में समुद्र के समान मानव जीवन की परिवर्तनशीलता और अकल्‍पनीयता को दर्शाकर मानव मन की नित-नित बदलती स्थितियों की अनुभूति समुद्र के परिप्रेक्ष्‍य में वर्णित कर गहन गंभीर चिंतन के लिए बाध्‍य किया है । सहज और सरल शब्‍दों में अभिव्‍यक्ति के लिए बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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