शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

उमेश कुमार चौरसिया की तीन लघुकथाएँ

संवेदना

आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगे मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र।

रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण श्रीवास्‍तव जी की दोनों लड़कियां कैरियर के लिए आवश्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रैक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रैक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशान है।

आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढ़ोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। टी.वी. पर यह सब दृश्‍य देखकर लगता है शायद मानवीय संवेदना कहीं खो गई है।

पुण्‍य

सेठजी अपनी कोठी में यज्ञ-पूजा करवा रहे हैं। इक्‍यावन संभ्रान्‍त पंड़ितों को बुलाया गया। सबने मिलकर सेठजी की सुख-शांति के लिए यज्ञ किया और फिर विविध स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों का भरपेट सेवन किया। अंत में सेठजी ने उन्‍हें कीमती शॉल, धोती-कुर्ता, चांदी का सिक्‍का और सुन्‍दर लिफाफे में ग्‍यारह सौ एक रूपये भेंट दिए। पंड़ितों ने प्रसन्‍न होकर आशीर्वाद देते हुए सेठजी से कहा-‘सेठजी, आज आपने बड़े पुण्‍य का काम किया है।‘

कोठी से कुछ दूर ही एक अनाथालय है, जिसमें मूक-बधिर व विमंदित बच्‍चे रहते हैं। वहां एक भिखारी बच्‍चों को कपड़े और खाने-पीने की वस्‍तुएं दे रहा था। बच्‍चे उस भिखारी के साथ बहुत प्रसन्‍न थे। पता लगा कि वह भिखारी लगभग प्रत्‍येक माह वहां आता है। जगह-जगह घूमकर उसे भीख में जो कपड़े और रूपये-पैसे मिलते हैं, उसमें से वह अपने उपयोग के लिए जरूरी कपड़े रखता, अपनी बीमार पत्‍नि के इलाज के लिए गांव में पैसे भेजता और फिर शेष कपड़े यहां बच्‍चों में बांट देता। जो पैसे उसके पास बचे रहते उससे बच्‍चों के लिए खाने-पीने की वस्‍तुएं और किताबें ले आता। कहता-‘इन बच्‍चों को खुश देखकर मुझे बड़ी शांति और सुकून मिलता है। लगता है जैसे कई जन्‍मों का पुण्‍य मिल गया।‘

 

क्‍यों ?

पत्‍नी के साथ बैठकर अखबार पढ़ रहा था। मुखपृष्‍ठ पर छपी खबर ने चौंका दिया। आदिवासी गांव में एक स्‍त्री को चुड़ैल मानकर उसे पेड़ से बांधकर पीटा गया। खबर के साथ छपे चित्र में पेड़ से बंधी विवश स्‍त्री बिलख रही थी और तमाम ग्रामीण पुरूष उसे घेरे डण्‍डों से पीट रहे थे।

‘‘उफ! इक्‍कीसवीं सदी में ये सब ................. ! इसे अंधविश्‍वास कहूं या अत्‍याचार।............. आश्‍चर्य इस बात का है कि जहां मीडिया पहुंच गया, वहां कानून क्‍यूं नहीं पहुंच पाता।‘‘

पत्‍नि ने याद दिलाया-‘‘अभी पिछले महीने भी तो किसी गांव में एक विधवा स्‍त्री को डायन बताकर निर्वस्‍त्र कर घुमाया गया और फिर तपती सलाखों से दागा गया था...।‘‘

यह सब सुन रही मेरी 15 वर्षीया पुत्री ने बीच में ही प्रश्‍न किया-‘‘पापा, यह सब केवल स्‍त्रियों के साथ ही क्‍यूं होता है............... किसी पुरूष के साथ क्‍यूं नहीं ?‘‘

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