मंगलवार, 27 सितंबर 2011

व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र की कविता - ख्वाब

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ख्वाब

अकसर सिहर जाते हैं नफरतों के साए में .

परख नहीं कर पाते अपने और  पराये में .

रंजिशों की तपन में जलते हैं साथ  मेरे , 

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के..

 

दुनिया कसर नहीं छोड़ती अधूरा करने में.

ये  छोड़ देते  है  पसीना खुद  को पूरा करने में.

खुद के लिए दुनिया बदलते हैं साथ मेरे,

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के..

 

वह टूटना नहीं जानते हैं तोड़ दिए जाते हैं

मंजिलों से कुछ दूर पहले छोड़ दिए जाते हैं

निकल कर आँखों से बहते हैं साथ मेरे ,

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के ........

 

     ( व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र  )

भरजुना, सतना  (मध्य प्रदेश )

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(चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } , फतुहा, पटना की कलाकृति.)

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