बुधवार, 28 सितंबर 2011

संजय दानी की ग़जल - जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है, मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं...

अब इश्क़ की गली में कोई पारसा नहीं,
सुख, त्याग के सफ़र कोई जानता नहीं।

ये दौर है हवस का सभी अपना सोचते,
रिश्तों की अहमियत से कोई वास्ता नहीं।

जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है,
मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं।

मंझधार कश्तियों की मदद करनी चाहे पर,
मगरूर साहिलों का कहीं कुछ पता नहीं।

ये वक़्त है कारखानों का खेती क्यूं करें,
मजबूरी की ये इन्तहा है इब्तिदा नहीं।

मंदिर की शिक्षा बदले की,मस्जिद में वार का
अब धर्म ओ ग़ुनाह में कुछ फ़ासला नहीं।

फुटपाथ पर ग़रीबी ठिठुरती सी बैठी है,,
ज़रदारे शह्र अब किसी की सोचता नहीं।

वे क़िस्से लैला मजनूं के सुन के करेंगे क्या,
आदेश हिज्र का कोई जब मानता  नहीं।

दिल के चराग़ों को जला, सदियों से बैठा हूं,
कैसे कहूं हवा-ए-सनम में वफ़ा नहीं।


( पारसा-- पवित्र,   ज़रदार- धनवान,  हिज्र- विरह)

5 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर ग़ज़ल|
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं|

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ||
    माँ की कृपा बनी रहे ||

    http://dcgpthravikar.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html

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  3. बहुत खूब !...... हरेक शेर लाज़वाब..

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  4. बहुत सुंदर एवं सार्थक अभिव्यक्तियाँ | बधाईयां

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