शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

रामदीन के हास्य व्यंग्य दोहे - सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग। डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग।

अर्ध्‍य-सत्‍य

भ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत, क्‍यों ना करते लालाली।

भारी हो गई भू तिहाड़ की, सोचा कभी है लालाजी।

 

मंहगाई काबू से बाहर, कैसे हो गई लालाजी।

हर चौथे दिन मूल्‍य वृद्धि पर, चुप क्‍यों रहते लालाजी।

 

सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग।

डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग।

 

भरत मिलाप देख मेले में, भोला बहुत ही रोया।

पर, तनिक बात पर सगे बन्‍धु को, सरे आम लठियाया।

 

बहुत काम करने को सिर पर, मत तरसाओं लालाजी।

फटे हाल हो गये गिरधारी, कमर टूट गई लालाजी।

 

बैंको की फिर ब्‍याज बढ़ गई, रूकी न कीमत लालाजी।

एक साल में सात करोड़ी, कैसे हो गये लालाजी।

 

बोझ तिहाड़ का कम करवाओं, पित्रपक्ष है लालाजी।

सबके पुरखों की आत्‍माएं, भटक रही है लालाजी।

 

जेल में चक्‍की अब नाही हैं, मिले सभी कुछ लालाजी।

आज किसी घर से भी ज्‍यादा, सुखी हैं जेलें लालाजी।

 

कर्णधार ये न्‍याय बदल लें, अपने ढंग का लालाजी।

अफसर और व्‍यवस्‍था बदलें, अपने सुख को लालाजी।

 

पर, नहीं बदलते कुछ ईमानी होते जिद्‌दी, लालाजी।

रावहजारे, जय प्रकाश से होते हैं, कुछ लालाजी।

 

भ्रष्‍टों पर हँसने की ताकत, छिपी है इनमें लालाजी।

सजा अदालत से ज्‍यादा है, हँसी में इनकी लालाजी।

 

मानों या न मानो लेकिन, यही सही है लालाजी।

भ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत अब दिखलाओ लालाजी।

 

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-रामदीन,

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णानगर, लखनऊ-23

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