बुधवार, 28 सितंबर 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - मुर्गा

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मुर्गा

रामू ने देखा कि उसके पूर्व सहपाठी राघव और रमेश उसके कालेज कैम्पस में घूम रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व की यादें ताजा हो गईं। उसने पुकारा- “राघव ! राघव” ! राघव और रमेश ने रामू को मुड़कर देखा और एक दूसरे को पहचानते देर न लगी।

उन लोगों ने बताया कि लेखपाल के पोस्ट का विज्ञापन निकला हुआ है। जो तहसील से मिलेगा और वही जमा भी होगा। इसी सिलसिले में यहाँ आए हैं। इस कॉलेज का बहुत नाम सुना था, तो सोचा चलो कॉलेज भी देख लेते हैं। अब यहाँ से तहसील जायेंगे। रास्ता भी नहीं मालूम है, पूछते हुए जाना पड़ेगा।

रामू बोला उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि यहाँ रहते हुए तीन साल से अधिक हो गया है। सारे रास्ते मालूम है। चलो चलते हैं। लेकिन वहाँ जाने से पहले चलो कुछ खा-पी लेते हैं। तुम लोगों के भी भूख लगी होगी। पूरे अस्सी किलोमीटर चल के आये हो।

रामू ने उन लोगों के मना करने पर भी होटल में खाना खिलाया। और एक रिक्शे पर तीनों लोग सवार होकर चल दिए। रास्ते में रमेश ने राघव के कान में धीरे से कहा। चलो अच्छा मुर्गा मिल गया। कोई दिक्कत नहीं हुई।

रामू का मन खिन्न हो गया। वह आगे कुछ बोल न सका। केवल यही सोचता रहा कि जिन्हें मैं अपना सहपाठी-दोस्त समझ रहा था। जिनके लिए मैंने मिश्रा सर की क्लास छोड़ दिया, जो हफ्ते में केवल दो लेक्चर पढ़ाने के लिए आते हैं। जिन्हें पास में शेष बचे तीन सो रूपये में से खाना खिलाया और रिक्शा करके तहसील लेकर जा रहा हूँ। वे लोग ही मुझे मुर्गा समझ रहे हैं।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.)।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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(चित्र - अमरेन्द्र, { aryanartist@gmail.com } फतुहा, पटना की कलाकृति)

3 blogger-facebook:

  1. paande ji mera bhaarat desh mahaan hai, agar vah unako hi murga bana deta to fir ve kayaa bol paate "achchaa murga mil gaya". ATI SUNDAR BYANG HAI !

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  2. swarthy mansikta ko bakhoobi prastut karti rachna...

    उत्तर देंहटाएं

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