सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

शशांक मिश्र भारती की कविता - गांधी तुमको मेरा प्रणाम!

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तुम भारत के श्रद्धा नाम

गांधी तुमको मेरा प्रणाम,

तुम हो देश के राष्‍ट्रपिता

पथदर्शक तुमको मेरा प्रणाम।

 

भारत जन को सन्‍देश दिया

सन्‍मार्ग पर डाल दिया,

अहिंसा का पथ अपनाकर

कर्मकरो यह ज्ञान दिया।

 

जिसका तुमने त्‍याग किया

सबने उसको त्‍याग दिया,

तुम्‍हारे कदमों पर चलने का

सभी ने था मन बना लिया।

 

हे देश के पूज्‍य महापुरूष

गांधी तुमको मेरा प्रणाम,

तुमने जो पथ अपना लिया

सभी ने उस पर ढाल दिया।

 

तुम जन हित के रक्षक थे

पिता तुम्‍हीं को मान लिया,

हे देश भक्‍त युग पुरूष

गांधी तुमको मेरा प्रणाम,

तुम ही देश के गौरव नाम

गांधी तुमको मेरा प्रणाम।

 

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भाषा दिवस पर विशेषः-

अंग्रेजीपन

 

सर्दियों तक गुलाम रहने के बाद

दूसरों के हाथों का खिलौना बनने के बाद

अंग्रेजों से शोषित होने के बाद

स्‍वतंत्र हुआ देश

क्‍या भुलाएं जायेंगे वह दिवस

जे भी आए

हमें चूसते चले गए

अपनी भाषा-संस्‍कृति

हम पर थोपते चले गए

 

हमने प्रण किया

उन्‍हें देश से भगाने का

आखिरकार-

संघर्ष करते हुए

कुर्बानियां देते हुए

हम स्‍वतंत्र हुए

किन्‍तु-

आज भी मुक्‍त न हो सके

हालात हैं ज्‍यों के त्‍यों

 

अंग्रेज तो चले गए

लेकिन-

देश में छोड़ गये अंग्रेजियत

जिसकी आराधना में

लगे हुए हैं देश के सभी नेतागण।

 

आजादी के बाद

कई दशक बीत जाने के बाद

हिन्‍दी को न मिल पाया

उचित सम्‍मान,

आखिर-

कब तक जारी रहेगा

देश मे-

यह अंग्रेजियत।

 

हिन्‍दी सदन बड़ागांव

शाहजहांपुर-242401 उ.प्र.

ईमेल- shashank.misra73@rediffmail.com

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