शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

सदा बिहारी साहु की कविता - हे! पर्वत

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कविता
हे पर्वत
डॉ. सदा बिहारी साहु
प्रबंधक, सिडबी, लखनऊ


तुम कैलाश हो, तुम हो नियमगिरि
और तुम गोवर्धन
धरती पर विराजमान, तुम ही तुम
तुम वर्णित हो, युगों-युगों से लेखकों के लेख में
कालिदास के काव्य में
या कभी बच्चों के चित्रांकन में


तुम पूज्य हो, तुम्हें नमन
हे कैलाश, हे गोवर्धन
तुम श्रेष्ठ हो, तुम सुदृढ़
और तुम महान
तुम हो संजीवनी, जीवन के संग
हो तुम प्रकृति का बड़ा अवदान
पर आज तुम लुट चुके हो
खो चुके हो अपना सम्मान
मानव के कुचक्र संग,
आज तुम छिन्न-भिन्न


भुला कर तुम्हारा बलिदान
करता है तुम्हारा खनन
विकास की झूठी आड़ में
करता है वार शरीर पर
भ्रमित हो चुका मानव
तोड़ चुका है गिरिमान
फैलता गया सागर का तन

आदिवासी के मन में जागे है प्रश्न
कैसे जिएगा अपना जीवन
सुनीता नारायण, मेधा पाटेकर कर रहीं आह्वान
कर लो आत्म मंथन
शीघ्र समझ लो प्रकृति का नियम
बचा लो पर्वतों को, कर लो प्रण
नहीं तो ...
मिट जाएगी यह धरती
न रहोगे तुम न बचेंगे हम

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