पुस्तक समीक्षा- धरती और मनुष्य को सुन्दर बनाने का शिव संकल्प : पत्थरों के शहर में

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समीक्षक- डॉ.वेद प्रकाश अमिताभ

डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़-202001

समीक्ष्य कृति-

पत्थरों के शहर में ,

गजलकार-

नीरज शास्त्री

प्रकाशक- जवाहर पुस्तकालय मथुरा

पृष्ठ-अस्सी ,

मूल्य- एक सौ पचास रुपये मात्र

''अपनी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए'' दुष्यन्त कुमार की यह अवधारणा नीरज शास्त्री के गजल संग्रह 'पत्थरों के शहर में' की रचनाओं में ध्वनित है। रचनाकार का स्पष्ट उद्घोष है-'देश की हालत बदलना चाहता हूँ।'परिवेश की भयावहता, चतुर्दिक अवमूल्यन और अमानीयकरण की स्थितियाँ कवि के दृष्टिपथ में हैं, जो-'

'चारों आर छाया हुआ तम का कहर है।'

''''

'चौतरफ जब हवा मजहबी चलने लगी'

''''

'दौलत की चाह में सभी मतलबी हुए'

आदि अवतरणों में केन्द्रस्थ हैं। ऐसे में नीरजशास्त्री की एकमात्र आशा ईमानदार हाथों की कलम है, जिससे उनका निवेदन है-

'लेखनी ! तू कातिलों के नाम लिख दे।'

''''

'जालिमों के जुल्म का अंजाम लिख दे।'

भगीरथ,राधा, द्रोपदी आदि मिथकों की सहायता से यथार्थ उद्घाटन के साथ-साथ अपनी दृष्टि का संकेत देने में कई स्थलों पर नीरज शास्त्री सफल रहे हैं। उनका एक शेर है-

'इस जहाँ में प्रेम की गंगा बहाने को

क्या बन भगीरथ आज कोई आ सकेगा?'

नीरज शास्त्री की गजलों में वैचारिक ऊर्जा का प्रतिशत अधिक है, संवेदनात्मक आर्द्रता अपेक्षाकृत कम है। श्री मदन मोहन उपेन्द्र ने भूमिका में सही लिखा है कि कवि की वाणी में आक्रोश एवं विद्रोह के स्वर मुखर हैं परन्तु कुछ शेर बहुत मार्मिक बन पड़े हैं-

'बेटों के मुहताज हुए तो, हो गये जिन्दा लाश पिताजी।'

कैसा भी सन्दर्भ हो, उसे व्यक्त करने में सक्षम भाषा रचनाकार के पास है उसी के माध्यम से वह अपने संकल्प को दूसरों तक संप्रेषित कर सका है-

'इस धरा पर आज सुन्दर स्वर्ग लाने के लिए

संकल्प लो! ऐसे ही लड़ते रहेंगे आमरण।'

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प्रेषित- डॉ.दिनेश पाठक 'शशि' मथुरा

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