प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत - रसगुल्लों की चाहत ने बंद लड़ाई करवा दी

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एक है गुल्ली एक है टुल्ली
दोनों ऊधम करती हैं
कितना भी डाँटो समझाओ
नहीं किसी से डरतीं हैं

टुल्ली है चुलबुल थोड़ी सी
गुल्ली सीधी सादी है
अक्सर चाय और बिस्कुट
देती उनको दादी है

आपस में दोनों लड़ती हैं
बाल खींचतीं आपस में
उनमें समझौता करवाना
नहीं किसी के था बस में|

मम्मी ने रसगुल्ले लाकर
रखे एक कटोरी में
भरकर लाई चाकलेट वह
एक छोटी सी बोरी में|

मम्मी बोली अब तुम दोनों
कभी न लड़ना आपस में
वरना चाकलेट रसगुल्ले
कर आऊंगी वापस मैं|

रसगुल्लों की चाहत ने
बंद लड़ाई करवा दी
चाकलेट रसगुल्लों से
दोनों की मुट्ठी भरवा दी|

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2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत - रसगुल्लों की चाहत ने बंद लड़ाई करवा दी"

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