शंकर लाल कुमावत की दीपावली विशेष कविता

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चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार

अपनी मुंडेर पर तो दिया जलाते है हर बार

मगर जिन्होंने कभी नहीं देखी है रोशनी

क्यों ना उनके घरों में चिराग जलायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

अपने घरों में तो रोज बनती है मिठाई

मगर जो भूखे ही सो रहे हैं कई दिनों से

क्यों ना उनको भी एक निवाला खिलाएं इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

बड़े-बड़े लोगों से तो मिलते हैं हर रोज

मगर जिनको वर्षों से छुआ नहीं किसी ने

क्यों ना उस सबरी से

राम बनकर हम ही मिल आये इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

फुलझड़ी फटाके तो हम जलाते हैं हरबार

मगर जो दिलों में बैठा है अहंकार का रावण

क्यों ना उसे भी जलायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

दीप तो जलाते ही हैं हर बार

मगर उसका खुद को जलाकर भी

दूसरों को रौशन करने का हुनर

क्यों ना हम भी सीख जायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

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शंकर लाल, इंदौर ,मध्यप्रदेश

ईमेल :Shankar_kumawat@rediffmail.com

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1 टिप्पणी "शंकर लाल कुमावत की दीपावली विशेष कविता"

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