सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

संजय दानी की ग़ज़ल - वो समझती है वफ़ा का अर्थ ,ये बेवफ़ाई उसकी इक नादानी है।

ठहरा ठहरा सा रगों का पानी है,

शौक की कश्ती मगर दीवानी है।

 

हुस्न की लह्रें हुईं हरजाई बेश,

अब मुहब्बत का सफ़र बेमानी है।

 

देखा जब से महजबीं का पाक रुख,

जाने क्यूं इस दिल में बेईमानी है।

 

सब्र की बुनियाद जर्जर हो चुकी,

बस हवस की राह में आसानी है।

 

वो समझती है वफ़ा का अर्थ ,ये

बेवफ़ाई उसकी इक नादानी है।

 

चेहरे से वो सख्त लगती है मगर,

उसकी सीरत की गली गुड़धानी है।

 

गो बड़े शहरों में पैसा है बहुत,

पैसों की तकदीर पर, उरियानी है। ( उरियानी-- नंगापन)

 

मर्द राहे इश्क़ से गो डरते हैं,

सोच ,औरत की बहुत मर्दानी है।

 

दानी की सरकारें संग्या शून्य हैं,

जनता की तकलीफ़ बढते जानी है।

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