प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बालगीत - पाकिट खर्च बढ़ा दो पापा

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पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी

पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी

पाकिट खर्च बढ़ा दो पापा

एक रुपये में तो पापाजी

अब बाज़ार में कुछ न आता।

 

एक रुपये में तो मम्मीजी

चाकलेट तक न मिल पाती

इतने से थोड़े पैसे में

भुने चने में कैसे लाती।

 

ब्रेड मिल रही है पंद्रह में

और कुरकुरे दस में आते

एक रुपये की क्या कीमत है

पापाजी क्यों समझ न पाते।

 

पिज्जा है इतना मेंहगा कि

तीस रुपये में आ पाता है

एक रुपया रखकर पाकिट में

मेरा तन मन शर्माता है।

 

आलू चिप्स पाँच में आते

और बिस्कुट पेकिट दस में

अब तो ज्यादा चुप रह जाना

रहा नहीं मेरे बस में।

 

न अमरूद मिले इतने में

न ही जामुन मिल पाये

एक रुपये में प्रिय मम्मीजी

आप बता दो क्या लायें।

 

मुझको खाना आज जलेबी

मुझको खाना रसगुल्ला

इतने से पैसों में बोलो

क्या मिल पाये आज भला।

 

तुम्हीं बता दो अब मम्मीजी

कैसे पाकिट खर्च चले

समझा दो थोड़ा पापाको

उधर न मेरी दाल गले

कम से कम दस करवा दें

इतने से काम चला लेंगे

एक साल तक प्रिय मम्मीजी

कष्ट आपको न देंगे।

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2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बालगीत - पाकिट खर्च बढ़ा दो पापा"

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