मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

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महंगाई

सिलेन्डर की दुकान पर लगा है यारों मेला
गेहूँ शक्कर तेल का देखो आज झमेला
गेहूँ कहे मैं हर घर का पाया
शक्कर कहे मैं लम्बी माया
दादा कैरोसीन हाथ ना आये
आम जनता जिस के पीछे भागे
तेल खाने का खा ना पायें
घी भला हम कहाँ से लायें


मूगँ—दाल और तूर दाल के
भाव है जो हमें चिढायें
पत्ती चाय की अँगूठा दिखाये
जिस के बिना हम से रहा ना जाये
दूध कहाँ हम उस में डालें
४० रूपए लिटर से जो आये
काँग्रेस हो या जनता पार्टी
यहाँ ना कोई टिक पायेगा
मँहगाई जो कम करेगा
वही जनता पर राज करेगा

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वक्त भाग रहा है


एक समय था जब सतयुग था
राम राज कहलाया जाता था
तब वक्त की रफ्तार सामान्य थी
वक्त को वहाँ से निकलने की
कदापि जल्दी नहीं थी, वक्त
राम राज्य मैं शान्ति से रह रहा था
क्योंकि तब वक्त की कद्र थी
तब वक्त ठहरा हुआ रहता था


फिर आया कलियुग और
वक्त ने करवट बदली देखा
तो सब उससे तेज चल रहे हैं
वक्त से पहले सभी को कही
ना कहीं पहुँच ने की जल्दी थी
तब वक्त को लगा के ऐसे तो
मैं सब से पीछे रह जाउँगा
सब उस से आगे निकल जायेंगे
और कलयुग मुझे पीछे छोड़ देगा
तब से वक्त तेज—तेज चलने लगा


फिर आया महा कलियुग
वक्त ने बिना मुड़े ही देख लिया
महा-कलियुग दौड़ कर उस से
आगे निकल जाना चाहता है
पर वक्त भी ये कैसे होने देता
क्योंकि वक्त भी अब दौड़ का
प्रतियोगी बन गया था
इस लिए वक्त को भी भागना पड़ा
अब तो इतनी तेज रफ्तार हो गयी
बस वक्त भाग रहा बस भाग रहा है

कुछ भी घट जाता है


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कभी भी कहीं भी कुछ भी घट जाता है
आतंक वाद का शोला भडकता है
लाखों बेगुनाह लोगों की जाने जाती है
अकाल पड़ता है किसान लोग
अपने हाथों से अपना गला घोंट लेते हैं
बाढ आती है ना जाने कितने लोग
घर से बेघर हो जाते हैं
भूकंम्प आता है ना जाने देश का
कितना नुकसान होता है


रेल पटरी से उतर जाती है
इन्सान बमौत मारा जाता है
कभी बेगुनाहों पर लाठी चार्ज कर
प्रशासन गुनाहगारों के करतूतों
पर पर्दा डाल कर खानापूर्ति कर देती है
बडे अपराधी बच जाते है आम
इनसान फँस जाता है


प्रशासन क्या करता है
कुछ भी कारण बता कर बस
कागजी खानापूर्ती करता है
बस बैठा बैठा अपनी जेबें भरता है
ईन्सानी शवों पर खडा होकर
अपनी तिजोरीयाँ और,और भरता है
कुछ भी घटना को अन्जाम देकर
प्रकृति पर इल्जाम लगाता है
कभी भी कहीं भी कुछ भी घट जाता है

ईश्वर और इनसान


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ईश्वर ने जब इनसान बनाया
बहुत गर्वित हुआ होगा
सोचा होग अपने अस्तित्व का
ई निकाल कर इन्सानों की
एक दुनिया बनाऊँगा
नाम उसका इनसान रखूंगा
पृथ्वी पर एक स्वर्ग और बनाऊँगा
जिस का कर्ता—धर्ता इनसान होगा


इन्सानियत को ईश्वर मान कर
मानवता का धर्म निभायेगा
भाईचारे और प्रेम का विस्तार करेगा
पर मानव ने तो हिंसा का विस्तार की
अणु,प्रमाण, आतंकवाद को ईश्वर का
वरदान समझ कर मानवता का हास किया
स्वर्ग जैसी इस धरा को नर्क का आकार दिया


धरती—आकाश—पाताल सभी पर
असुरों जैसे विनाश किया
किसी ने नेता बन कर वतन बेचा
किसी ने संन्यासी बन कर
शैतानियत का खेल रचा
किसी ने देश का हितैषी बनकर
दुश्मनों जैसा काम किया
आज जब ईश्वर देखता होगा
अपनी रची दुनिया तो
अफसोस से हाथ मलता होगा

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कवीयत्री मिनाक्षी भालेराव सचिव (प्रशासन )
हिन्दी आंदोलन पूणे

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3 टिप्पणियाँ "मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ"

  1. आजकल के समय पर बिलकुल सटीक रचनाएं

    हिन्‍दी गालियों की परिभाषा

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  2. सच को दिखाती सार्थक रचनाये.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. sunder rachnay yatharth ko bayan karti rachnay..........bahut khoob..... badhai.

    उत्तर देंहटाएं

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