गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

अदिति मजूमदार की कविता - शहर के एकांत में

शहर के एकांत वीराने में

बैठी हूँ तुम्हारे इंतज़ार में

पतझड़ की सुबह सी मैं

इंतज़ार है हरियाली का

फूलों का फलों का

एकांत में कर रही इंतज़ार मैं

पिया तुम भूल कैसे गए मुझे

फूलों की खुशबू सी थी मैं

मैं शीलता, कोमलता थी

एकांत छोड़ चले गए मुझे?

कमरों की खाली दीवारें

पुकार रही है तुम्हें

चोरी से ही सही

तोड़ जाते एकांत की जंजीरें

शहर के इस भीड़ में

ढूंढ़ती फिरूं तुम्हें मैं

शहर के एकांत वीराने में

बैठी हूँ तुम्हारे इंतज़ार में

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अदिति मजूमदार

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