संजय दानी की ग़ज़ल - कब से बैठा हूं तेरे वादों की छत पे, गर्दिशें जब उड़तीं तेरी याद आती।

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जब हवायें चलतीं तेरी याद आती,
बारिशें जब होतीं तेरी याद आती।

इक तसव्वुर ही सहारा है मेरा अब,
यादें जब जब थकतीं तेरी याद आती।

दिन तो जैसे तैसे कट जाता है हमदम,
रातें पर ना कटतीं तेरी याद आती।

कब से बैठा हूं तेरे वादों की छत पे,
गर्दिशें जब उड़तीं तेरी याद आती।

पैरों के छालों का मुझे ग़म नहीं,
धड़कनें जब बढ्तीं तेरी याद आती।

बेवफ़ाओं की ज़ुबां का क्या भरोसा,
दुनिया जब ये कहतीं तेरी याद आती।

कब से तेरी दीद की करता प्रतीक्षा,
भीड़ जब जब बढती तेरी याद आती।

बदलों से चांद को डर लगता है पर,
चांदनी जब हंसती तेरी याद आती।

ओढे बैठे हो लबादा झूठ का तुम,
जब सचाई मरतीं तेरी याद आती।
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1 टिप्पणी "संजय दानी की ग़ज़ल - कब से बैठा हूं तेरे वादों की छत पे, गर्दिशें जब उड़तीं तेरी याद आती।"

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