शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

हिमकर श्याम की कविता - वह अभागन!

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वह अभागन !

सरकारी अस्पताल के
बाहरी फुटपाथ पर
अजब था नजारा
चल रहा हो जैसे
किसी मदारी का
खेल-तमाशा
अर्धनग्न हालात में
तड़प रही थी
वह अभागन माँ
जन्मा था नवजात
वहां फुटपाथ पर
भिनभिना रही थीं
चारों ओर मक्खियाँ
तमाम मर्यादाओं की
उड़ रहीं थीं धज्जियाँ
मंडरा रहे थे आस-पास
लावारिश कुत्ते और
पत्थर दिल इंसान

मेला वहां जुट गया
कुछ पीछे छूट गया
खून से लथपथ
बेबस और स्तब्घ
वह अभागन माँ
भूल प्रसव की पीड़ा
जार-जार आंखों से
कोसती हालात को
निहारती नवजात को
कभी आँचल से छिपाती
aअपने तन-बदन को
कभी कांपते हथेलियों से
ढांपती नन्हीं जान को

सामने था भीड़ का
अमानवीय चेहरा
कोई अपलक घूरता
कोई मुंह फेर लेता 
सब कर चुके थे पार
शर्म-हया की दहलीज
गर्म हुआ चर्चा का बाजार
मानवता हुई शर्मसार
कैद हो रही थी कैमरे में
बेबसी की तस्वीर
हाय रे तकदीर
जिन्दगी का तमाशा
चलता रहता बार-बार
शहर के फुटपाथ पर
बनते हैं सैकड़ों लोग
तमाशे का मूकगवाह
शहर की चकाचौंध में
कहीं खो गए हमारे
सामाजिक सरोकार
मीडिया, एनजीओ, सरकार
कोई सुनता नहीं गुहार।

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हिमकर श्याम
द्वारा : एन. पी. श्रीवास्तव
५, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची, ८ झारखंड।

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(चित्र- अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना  की कलाकृति)

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  1. अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक! इस सार्थक प्रस्तुति के लिए आपको बधाई.

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