प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - भटा गकड़ियों के दिन आये

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फूल हंसे पत्ते मुस्काये
भटा गकड़ियों के दिन आये।

आंगन बीचों बीच शुष्क‌
कंडे मां ने सुलगाये
बड़े बड़े बैंगन फिर
अंगारों के बीच दबाये
एक पटे पर बैठी चाची
बाटी गोल बनाती
उसका क्या भूगोल और‌
क्या है इतिहास बताती
बाल मंडली फिल्मी गाने
ताक धिना धिन गाये।

धूप हल्दिया सिर पर ओढ़े
बैठे जेठे स्याने
झूम झूम कर नाच दिखाया
काकी और कक्का ने
अपने अपने हुनर और‌
हथ कंडे सभी बताते
और बन गये पात्र अचानक‌
जैसे परी कथा के
न जाने क्यों छोटी भौजी
झुका नज़र शरमाये।

घी से भरे कटोरों में जब
गोल बाटियां नाचीं
हृदय हुआ फुटबाल उछलकर‌
बात सौ टका सांची
लड्डू बने चूरमा वाले
कितने मीठे मीठे
सबने दो दो चार उतारे
मधुर कंठ के नीचे
खाने वाले पता नहीं
क्यों फिर भी नहीं अघाये।

भटा गकड़ियां दाल चूरमा
कितना भला भला था
इनके कण कण रग रग में
बस मां का प्यार मिला था
दादा दादी चाची चाचा नॆ
स्नेह मिलाया
मौसम जैसे फूल बन गया
ताजा खिला खिलाया
सूरज छुपा छुपौअल खेले
बदली स्वांग रचाये।

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6 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - भटा गकड़ियों के दिन आये"

  1. बहुत कोमल सी कविता- बड़ों को भी मोहे

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  2. बेनामी6:55 pm

    Bahut acchi kavita
    Rudra Shrivastava Indore

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन मन भावन रचना,सुंदर पोस्ट,मुझे पसंद आई.बधाई...

    दीपावली की शुभकामनाये.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. man lalcha diya aapne,kavita se bhi aur vyanjano se bhi.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी3:00 pm

    Dhanyavad for comments
    Prabhudayal

    उत्तर देंहटाएं

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