बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

आर पी साही की कविता - गरीबी की लछमन रेखा...

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पीढ़ी दर पीढ़ी, से एक रेखा है,

जो  लछमन ने सत्ता और सामाजिक  धनुष से खींची,

दादा , दादी ,बाबू, माई सबको ललचाते ,

पार जाने के ललक को भी मैंने देखा है..

 

सर पर बोझ लिए, कातर आँखों से ,

रेखा से घिरे हम देखा करते हैं..

 

अरे, राम ,लखन

तुम तो सबरी के बेर चख के भी महान बनते हो,

पर सबरी बेर कैसे बीन पायेगी,

उस जंगल के पेड़ को ही हड़प लेते हो,

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com की कलाकृति)

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