बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

आर पी साही की कविता - गरीबी की लछमन रेखा...

image

पीढ़ी दर पीढ़ी, से एक रेखा है,

जो  लछमन ने सत्ता और सामाजिक  धनुष से खींची,

दादा , दादी ,बाबू, माई सबको ललचाते ,

पार जाने के ललक को भी मैंने देखा है..

 

सर पर बोझ लिए, कातर आँखों से ,

रेखा से घिरे हम देखा करते हैं..

 

अरे, राम ,लखन

तुम तो सबरी के बेर चख के भी महान बनते हो,

पर सबरी बेर कैसे बीन पायेगी,

उस जंगल के पेड़ को ही हड़प लेते हो,

---

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com की कलाकृति)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------