प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत : क्या बोलूं और किसे छुपा लूं

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बचपन में तो आम चुराते

कई कई बार गये पकड़े

जरा ठीक से याद करो तो

और किये थे क्या लफड़े ।

 

दादी की धोती खींची थी

और दादा की परदनिया

घोली थी मटके के जल में

हल्दी नमक और धनिया ।

 

टीचर का कार्टून बनाकर‌

ब्लेक बोर्ड रंग डाला था

बड़े गुरूजी ने डंडे से

कैसे फिर धुन डाला था ।

 

नाव चलाने की बातें तो

बचपन की सब करते हैं

नाक चाटते थे कितनी

यह कहने से क्यों डरते हैं ।

 

कच्ची दीवारों की मिट्टी

चाट चाट कितनी खाई

बच्चों पर लिखने वाले कवि

कुछ तो बतलाओ भाई ।

 

बचपन का खट्टा मीठापन‌

करूं याद मन मुस्काता

क्या बोलूं और किसे छुपा लूं

यह कुछ समझ नहीं आता ।

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2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत : क्या बोलूं और किसे छुपा लूं"

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