सीमा ‘स्‍मृति’ की तीन कविताएँ

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1- जीवन चक्र

काट दिए जाते पेड़

जरूरत पड़ने पर

वर्षों पश्‍चात्

जमीन में बहुत गहरे तक

दबी जडें

कभी कभी

उचित हवा पानी ऊर्जा पाकर

फूट पड़ती हैं लेकर कोमल कोंपलें ।

वो कहते हैं

मैं

वो कटा पेड़ हूँ

जिसकी जड़ों को भी जलाया गया

वक्‍त की जरूरत के नाम पर धू- धू करके

और

उसी क्षण

नया एक वृक्ष तभी लगाया था

नयी हरियाली के नाम पर ।

क्‍यों जड़ें तुम्‍हारी याद करती हैं

क्‍यों जडें उम्‍मीद करती हैं

सूखी जली जड़ों में

फूट पडेंगी कोंपलें।

यही है जीवन चक्र

वर्तमान में हरियाली देता है

वो नया पेड़

जीवन संगीत बना

वो पेड़

समझो, या ना समझो !

-0-

 

2-‘संघर्ष’

अन्‍धकार से लड़ने की परिभाषा से दूर,

रोशनी से आवरित उस भीड़ में,

जिसकी चकाचौंध में मिचमिचाने लगी है आँखें,

धुँधलाने लगे हैं रास्‍ते,

खो गई है शक्‍ति,

पस्‍त हो गई है सारी धारणाएँ,

‘संघर्ष’ सामर्थ्‍य और चेतना के संग

मन मतवाला

निकल पड़ा है

किसी नये सेतु के सहारे

उस पार

समकालीन जीवन -मं‍‍‍‍‍थन करने ।

 

3 -'प्रवाह'

नई मुलाकात ने दी

दस्‍तक

जीवन -प्रवाह की

धारा तो बहती है

खामोश कहती है

थाम लो हाथ

मुसाफिरों

मैं रुख बदलने को हूँ।

-0-

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा, पटना की कलाकृति)

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3 टिप्पणियाँ "सीमा ‘स्‍मृति’ की तीन कविताएँ"

  1. कम शब्दों में बह्त सारा अनुभूत सत्य पिरो दिया है । बहुत सुन्दर !

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  2. बेहतरीन प्रस्तुती.....

    उत्तर देंहटाएं

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