शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

ब्रजेश मिश्र की कविता - जंगल के कानून

जंगल के कानून

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राजनीति में शुचिता की मत बात करो,

जंगल के कानून तुम्हें मालूम नहीं

नैतिकता मर्यादा और उसूलों के,

बदल गये मज़मून तुम्हें मालूम नहीं

शासन का सिद्धान्‍त सदा से है यह ही,

मांसाहारी ही राजा हो पाता है

घास फूस खाने वाला हाथी गैंडा,

है विशाल पर कब वनराज कहाता है

इसमें सत्‍ता उसको ही मिलती जिसके

तेज दांत नाखून तुम्हें मालूम नहीं॥1॥

 

नैसर्गिक अधिकार प्रजा पर राजा का,

जिसको भी जैसे चाहे मारे खाये

पानी पीते हुए निरीह मेमने के

तर्क भेड़िये के आगे कब चल पाये

स्‍वाभिमान को छोड़ हिलाते दुम अपनी

पाते वही सुकून तुम्हें मालूम नहीं ॥2॥

 

सदियों से निर्बल शोषित होते आये,

चिडियों के बच्‍चे अजगर खा जाता है

मधुमक्‍खी का श्रम से जोडा़ हुआ शहद

कोई भालू आकर चट कर जाता है

ख़रगोशों भेंड़ो़ के बालों खालों से

बनता चमड़ा उन तुम्हें मालूम नहीं॥3॥

 

सबके अपने झुण्‍ड, झुण्‍ड के नेता हैं

जो ताकतवर वह नेता बन पाता है

फिर वह जो भी करे उसे है क्षम्‍य सभी

जो करता विरोध वह मारा जाता है

सत्‍ता पर अपना अधिकार जमाने को

बहता कितना खून तुम्हें मालूम नहीं॥4॥

 

लगती भी है आग दरख्‍़त नहीं जलते

जलता खरपतवार झाड़ियां जलती हैं

कुछ दिन रहती तपिस बाद वर्षा ऋतु के

यही वनस्‍पति दूनी गति से फलती है

डूब गया वह उलटी धार तैरने का

जिस पर चढ़ा जुनून तुम्‍हें मालूम नहीं॥5॥

 

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ब्रजेश मिश्र

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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