बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री का नवगीत

नवगीत

याद रहे

आसमां तले

ऐसे जियो

एक सादगी

एक ठहराव

जी भर कर पियो

ग्‍हमागहमी

वली चहल पहल

सुलगते सवालों के न पूछे जवाब?

 

आक्रमणकारियों के

न हो अब वार्तालाप

शान्‍ति सिर्फ न बने ख्‍वाब

इधर उधर

फैला न रहे

कब्रों का गर्द का गुबार

जंग के बीच

फैले सिर्फ फैले

हमदर्दी और प्‍यार

बैचैनी की विचित्रता

न करे व्‍याकुल

गली कूचे घर बाहर

काली घटाटोप न हो साकुल

 

याद रहे

उस वक्‍त वे

कैसे दिन रहे होंगे

फिरंगियों के खिलाफ

जब बंदेमातरम गाते होंगे

जान हथेली पर रखकर

जब पहली बार सड़क पर निकले होंगे

गांधी नेहरु सुभाष की

बेचैनी के क्‍या कहने होंगे

आजाद भगत की आँखों से

नींद के झोंके कैसे गायब हुए होंगे

मातृभूमि की स्‍वतंत्रता के

सपने जब पहली बार जिन्‍दा हुए होंगे

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-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

‘राजसदन' 120/132

बेलदारी लेन, लालबाग,

लखनऊ

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