बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री का नवगीत

नवगीत

याद रहे

आसमां तले

ऐसे जियो

एक सादगी

एक ठहराव

जी भर कर पियो

ग्‍हमागहमी

वली चहल पहल

सुलगते सवालों के न पूछे जवाब?

 

आक्रमणकारियों के

न हो अब वार्तालाप

शान्‍ति सिर्फ न बने ख्‍वाब

इधर उधर

फैला न रहे

कब्रों का गर्द का गुबार

जंग के बीच

फैले सिर्फ फैले

हमदर्दी और प्‍यार

बैचैनी की विचित्रता

न करे व्‍याकुल

गली कूचे घर बाहर

काली घटाटोप न हो साकुल

 

याद रहे

उस वक्‍त वे

कैसे दिन रहे होंगे

फिरंगियों के खिलाफ

जब बंदेमातरम गाते होंगे

जान हथेली पर रखकर

जब पहली बार सड़क पर निकले होंगे

गांधी नेहरु सुभाष की

बेचैनी के क्‍या कहने होंगे

आजाद भगत की आँखों से

नींद के झोंके कैसे गायब हुए होंगे

मातृभूमि की स्‍वतंत्रता के

सपने जब पहली बार जिन्‍दा हुए होंगे

---

 

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

‘राजसदन' 120/132

बेलदारी लेन, लालबाग,

लखनऊ

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------