शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

शंकर लाल की कविता - रावण क्यों जलाएँ

चलो रावण जलाये

मैदान में जमघट छाया है

आज फिर दशहरा आया है

अधर्म को खत्म कर

धर्म का परचम फहराने को

नवदुर्गा का आशीष लेकर

श्रीराम जी का रथ आया है

अभी राम का बाण चलेगा

ये पापी रावण धूं-धूं कर जलेगा |

 

यो तो हर बार दशहरा आता है

हर बार रावण को जलाया भी जाता है

फिर भी वह यही खड़ा नजर आता है

लगता है शायद

केवल उसका पुतला जलता है

अक्स मगर

यही हमारे समाज में पल रहा है

फिर कभी भ्रष्टाचारी बनकर

तो कभी दंगाई बनकर

कभी आतंकी बनकर

तो कभी अत्याचारी बनकर

इंसानियत को चर रहा है

और इसलिए ही शायद

इसका आकार बड़ी रफ्तार से

हर साल बढ़ रहा है |

 

केवल पुतला जलाने रावण नहीं मरता

इसलिए, चलो प्रण करते है

इस बार दशहरे पर पुतले के साथ-साथ

अपने अन्दर के रावण को भी जलायेंगे

फिर से भाईचारे और सद्भाव के

दीपक जलाकर हर दिन

खुशियों की दीवाली मनाएंगे |

--

----शंकर लाल, इंदौर, मध्यप्रदेश

Email :shankar_kumawat@rediffmail.com

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