बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

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शून्य   


 
हृदय की शून्यता को 
अंकों का आलिंगन करने दो
भर लो चितवन में तरंगें
लहरों सा उन्मुक्त मचलने दो
क्यों विरह में तपती हो
खुद को खुद से मिलने दो
अपरिचित हो जिस स्पर्श से
उस का सम्मोहन भरने दो
आज बहने दौ आँसुओं को
धुल जाने दो काजल की कालिमा
सूनी सूनी निगहों में
उम्मीद का दीप जलने दो
आने दो मिलन की बैला
उन्माद की लहरें बहने दो
 
  
   
   

नर  नारी    


 
कौन सर्वश्रेष्ठ है 
कौन जान पाया है
अनुसंधान कहाँ हो पाया है
एक के पास अनुराग
एक के पास त्याग है
एक के पास मादक चितवन
एक के पास पुरूषार्थ है
एक के पास आमंत्रण
एक के पास समर्पण है
एक के पास मधु सी मिठास है
एक के पास सुनहरा प्रभात है
जब दोनों का मिलन होता है
तभी सृष्टि का निर्माण है
प्रभात का सूर्य तभी होता है
जब रात का अंधकार है
ऋतुओं का आगमन तभी सम्भव है
जब वर्ष का आगाज होता है
दोनों एक दूजे के बिना अधूरे हैं 
तो दोनों मिलकर ही पूर्ण होते हैं
 
 

विस्मित   


फूलों पर गिरती बून्दें
विस्मित हो उठती हैं
अंजानी गंध से जब वो
आत्मसात होती हैं 
और आ मिलती हैं धरती से
मुग्ध वैसे ही रश्मी होती है
जब सितारों जडी चुनरी
और अंधकार से मिलती है
बून्दों की सखी वर्षा जब
अम्बर से धरती पर आती है
इंद्रधनुषी मुकुट पहनकर
कैसी कैसी इतराती है
आलिंगन हवाएं जैसे
पर्वत को करती हैं
अस्तित्व खोकर अपना
नया इतिहास रचती है
बेसुध हो लहरें सागर से
मिलने को आतुर हो जाती है
रहस्यों से जाने कितने
पर्दे जब वो उठाती है
यही मिलन का उन्माद ही तो
देता है सृष्टि को आकार है
 

आधार


मैं लघु आकार हूं
तुम मेरा आधार
तुम में होकर लीन मैं
बनना चाहती हूं सम्पूर्ण
कर समर्पण अहं को 
स्वीकार है तुम्हारा आलिंगन 
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