सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की ग़ज़लें - तड़पा है मन प्यार के लिए ऐसे , जैसे बच्चे से कोई खिलौना ले ले।

(१)

अब ना कोई मेरे ज़ज्बातों से खेले।

शहर क़ातिलों का है यहाँ कैसे चले।

 

लोगों ने अपना कर ऐसे ठुकराया,

जैसे कोई जलते अंगार को छू ले।

 

तड़पा है मन प्यार के लिए ऐसे ,

जैसे बच्चे से कोई खिलौना ले ले।

 

चारों तरफ भीड़ है कोलाहल है,

और हसरतें अपनी रह गयी अकेले।

 

साथी न सही,अजनबी की तरह चलते,

लोग तो ना कहते कि हम है अकेले।

 

(२)

क्या कहूँ, तकदीर कितनी बेरुख़ी होती है।

मिलते है जब दो दिल चैन से सोती है।

 

दवा ना दे सको तो दर्द ही दे देना,

सुना है दर्द में दर्द दवा होती है।

 

मुझे खाक समझ कर उड़ा ना देना,

आँख में ये पड़़े तो मुश्किल होती है।

 

तुम्हारी आग में मैं जल तो नहीं सकता,

मगर दिल ग़मजदा है और आँख रोती है।

 

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ए रामानन्द नगर ,अल्लापुर इलाहाबाद

4 blogger-facebook:

  1. kamal hai sir...m moved by ur words...

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  2. Bahut saral shabd, par bahut gahan arth

    उत्तर देंहटाएं
  3. अगर आप इस तरह कि कविताएं पढ़ना चाहते है तो आप मेरे ब्लोग पर आ सकते है--http://sambhavnazindagiki.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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