सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

विजय वर्मा की ग़ज़ल - रंग-ए-जिंदगानी

रंग-ए-जिंदगानी.

रंग-ए-जिंदगानी यूँ अनमना क्यूँ है ?

आखिर तू मेरी महफ़िल से फ़ना क्यूँ है?

 

माना विपथगमन की होगी कोई वाइस

मत पूछ दामन अश्कों से सना क्यूँ है?

 

गुरूर के पेड़ों पर कभी फल नहीं लगते.

वो शख्स आखिर इस कदर तना क्यूँ है?

 

दुआ-सलाम ही तो की है,रुसवा नहीं की

तेरे शहर में खैरियत पूछना मना क्यूँ है?

 

उजाला तो हो,बर्क मेरे नशेमन पे गिरे

सब परेशां है,अँधेरा इतना घना क्यूँ है?

 

दर्द अगर तेरा हो जाए तेज से तेजतर

बाँट लो आकर, ये 'विजय' बना क्यूँ है?

--

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO

vijayvermavijay560@gmail.com

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