सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

दामादर लाल ‘जांगिड़' की ग़ज़ल - संसद में खुंर्रांट वकीलों की जब से तादाद बढ़ी, तब से सच इंसाफ की खातिर हफ्‍तों अनशन करती है...

ग़ज़ल

image

एक क़लम बेखौफ हुई हैं हरदम आग उगलती हैं।

क़लम एक अंदर ही अंदर क्‍यों दिन रात सुलगती है॥

 

सोच समझ कर कहने वाले कब पूरा सच कहते हैं,

दिल की बात लबों पर आती हैं जब जुबां फिसलती है।

 

शब्‍द जाल कैसे भी बुनलो, घुमा फिरा कर बात कहो,

समझदार हैं दुनिया सारी जो भोली सी बनती है।

 

संसद में खुंर्रांट वकीलों की जब से तादाद बढ़ी,

तब से सच इंसाफ की खातिर हफ्‍तों अनशन करती है।

 

बिकी बिकायी क़लमों पर लिखने की जहमत कौन करे,

अपनी बदनामी के डर से हर इक क़लम झिझकती है।

 

कब लिखने बैठा था इसको,ग़ज़ल मुकम्‍मल आज हुई,

कहा दौर ने ‘जांगिड़' तेरी बात पुरानी लगती है।

--

दामादर लाल ‘जांगिड़'

लादड़िया नागौर राज.

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति)

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------