शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - एक सरकार का सवाल है बाबा

इस गरीब देश को एक सरकार चाहिए। सरकार कैसी भी हो, लेकिन चले, काम करे और जरुरत के समय आम आदमी की मदद करे। इस देश का हर मतदाता एक स्‍थायी, टिकाउू और मजबूत सरकार चाहता है, मजबूर सरकार नहीं। आखिर कब तक देश सरकार विहीन रहेगा। अगर सरकार नहीं होगी तो देश कैसे चलेगा। देश को चलाना है तो सरकार चाहिए। चुनाव-दर चुनाव आये और गये मगर देश को सरकार नहीं मिली। कभी मिली तो चली नहीं। चली तो किसी ने टांग खींच कर गिरा दिया। लंगड़ी हो गयी सरकार। कभी बैसाखियों के सहारे चली सरकार, कभी बाहर के समर्थन से हिली सरकार। जो सरकार गिर-गिर के चली और चल-चल के गिरी। उस सरकार को क्‍या कहे। भाई साहब, गोरी हो या काली, लूली हो या लंगड़ी इस देश को एक सरकार चाहिए। गरीब देश को एक अमीर सरकार चाहिए। अमीर देश को गरीब सरकार चाहिए सरकार।

देशी सरकार हो तो ठीक न हो तो विदेशी दे दीजिए। महंगी न हो तो सस्‍ती दे दीजिए मगर इस देश को एक सरकार दीजिए। सुनो भाग्‍यविधाताओं, क्‍या मेरी आवाज आप तक पहुंचती है?

मेरा मित्र झपकलाल जो देश और सरकार के बारे में अपने मौलिक विचार रखता है, का कहना है कि सरकार किसी की भी हो, सत्‍ता का चेहरा और चरित्र हमेशा एक ही रहता है। सत्‍ता और सरकार के चरित्र में उसे कभी कोई परिवर्तन नजर नहीं आता।

मैंने पूछा, यार सरकार चलाना बहुत मुश्‍किल है क्‍या ?

वो बोला, तुम चलाने की बात करते हो। सरकार चलाने से ज्‍यादा मुश्‍किल काम है, सरकार बनाना। बड़े-बड़े लोगों को सरकार बनाने में पसीना आ जाता है, पार्टियां खून पसीना एक कर देता हैं, मगर उनसे सरकार नहीं बनती है। येन केन प्रकारेण बन जाती है तो चल नहीं पाती। कोई-न-कोई पीछे से लत्‍ती मार देता हैऔर बेचारी सरकार गिर जाती है। फिर चुनाव होते हैं और भाग्‍यविधाताओं से ज्‍यादा होशियार जनता फिर दलों को चौराहे पर खड़ा कर देती है और सांझे की हाण्‍डी हमेशा चौराहे पर फूटती है।

लेकिन फिर भी देश को सरकार चाहिए। बिना सरकार सब सून। सरकार बने तो देश चले, फाइलें चलें, निर्णय हो, गरीब को रोटी मिले, अमीर को मिल मिले। हर आम-ओ-खास आदमी को एक अदद सरकार चाहिए। लेकिन सरकार है कि दूर-दूर जा रही है। कभी इस दल के पास, कभी उस दल के पास। कभी इस ओर, कभी उस ओर। बहुमत के लिए तरसते दल और सरकार के लिए तरसती जनता।

है कोई जो देश की जरुरत को समझे, हमें एक अदद सरकार दे दे।

मैं सोचता हूं कि सरकार की जरुरत पर सभी दल अपने-अपने स्‍वार्थों से उपर उठ जाये ंतो कैसा रहे। क्‍या इस गरीब देश को चुनावों से बचाने के लिए एक सस्‍ती, सुन्‍दर, टिकाउ और मजबूत सरकार मिल सकेगी ?

लेकिन मेरे सोचने से क्‍या होता है। देश के भाग्‍यविधाता सोचें तब न ! सब मिल बैठ कर तय कर लें तो क्‍या सौ करोड़ के देश में पांच सौ बयालीस ईमानदार आदमी नहीं ढूढ़ सकते। मगर ईमानदारों को पूछता कौन है ? तमाम कोशिशों के बावजूद हम वहीं पहुंच गये, जहां से चले थे। चौराहे पर खड़ी है एक नई सदी और देश को चौराहे से रास्‍ता दिखाने वाला सिपाही चाहिए जो देश को हांक सके। मगर अन्‍धों के गांव में सुरमें की दुकान लगाने से क्‍या होता है।

आखिर सरकार की तलाश कहां जाकर खत्‍म होगी। हम कब तक अंधेरे में भटकते रहेंगे। और अन्‍धेरे बन्‍द कमरों में कब तक सरकार बनने के क्रम चलते रहेंगे।

कब तक आखिर कब तक ?

देश को संक्रमण से बचाने की जरुरत है। देश को चाहिए, पीने को पानी, रोटी और कपड़ा। मगर जब तक सरकार नहीं होगी, कुछ नहीं होगा। हारो या जीतो या जुड़ो या टूटो मगर सरकार दो, सरकार जो चले, सरकार जो काम करे, सरकार जो सभी के लिए कुछ-न-कुछ करे।

सत्‍ता की चरित्रहीनता के बावजूद एक सरकार तो चाहिए न प्रभु। जो सरकार न दे सके वे कैसे भाग्‍यविधाता हैं।

आओ सब मिलकर एक सरकार के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करें और हम सब कर ही क्‍या सकते हैं ? सब मिल कर एक ऐसी सरकार की कल्‍पना करें जो राम राज्‍य की ओर ले चले या फिर एक ऐसी सरकार जो हमें स्‍वर्ग-सा सुख दे और देश को स्‍वर्ग बना दे, मगर देश को स्‍वर्ग बनाने का यह मतलब नहीं कि सभी देशवासियों को स्‍वर्गवासी समझ लिया जाये।

ये लोग जो दिल्‍ली में सरकार बनाने का खेल खेल रहे हैं उन्‍हें अब खेल बन्‍द कर सरकार बनानी चाहिए, नहीं तो देश का मतदाता अगली बार और ज्‍यादा कठिन परिस्‍थिति पैदा कर देगा।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2

फोन - 2670596

म․उंपस प्‍क्‍ ․ लाावजींतप3/हउंपसण्‍बवउ

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