बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - मँहगू का अँधेर राज

 

मँहगू ने दो दिन पहले रात में स्वप्न देखा कि अँधेर राज आने वाला है। तबसे उसने यह सोचकर कि अँधेर राज  में मरने से बेहतर है पहले ही मर जाऊँ। खाना पीना ही छोड़ दिया । यह बात जब धीरे- धीरे फैली तो उसके जैसे सभी किसानों व अन्य मजदूरों के पांवों तले की जमीन खिसक गयी। जो किसी तरह मजदूरी मेहनत करके शाम को रूखे-सूखे का जुगाड़ कर भी लेते थे चिंता के कारण वह उतना भी न कर सके। जो उसने स्वप्न देखा उसका सार रूप नीचे दिया जा रहा है।

चिम्मनलाल जी की सरकार एक अलग कानून बनाने का निर्णय ले चुकी है। सभी राजनीतिक दल सारे मतभेद भुला कर उनसे सहमत हो गये हैं। इस कानून के तहत सभी गरीबों, पिछड़ों व मजदूरों तथा किसानों को सदियों से सरकार के साथ सहयोग न करने के आरोप में कटघरे में खड़ा करके उचित कार्यवाई की जाएगी। इसके अंतर्गत इन्हें अपनी जमीन-जायदाद से हाथ भी धोना पड़ सकता है तथा  साथ ही आजीवन जेल का भी प्रावधान किया गया है। सभी के जमीन-जायदाद की नीलामी कर दी जाएगी। जिनके पास जमीन-जायदाद नहीं होगी उन्हें आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई जाएगी।

चिम्मनलालजी का कहना है कि मेरी पार्टी के द्वारा बनाई गयी सरकारों का कहना ही क्या है  ?  सभी राजनीतिक पार्टियों ने इन लोगों के विकास के लिए क्या नहीं किया ? कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई। लेकिन ये लोग जहाँ के तहाँ हैं। बिल्कुल शिवजी के धनुष की तरह। उठना तो दूर टस से मस तक नहीं होते। सभी पार्टियाँ सदैव ऐसा ही बजट लाती रहीं जिससे आम आदमी को लाभ हो। जो किसानों के हित में हो । जिससे गरीबों और मजदूरों की स्थित सुधरे। लेकिन ये लोग सदा अपने ही धुन में मस्त रहे। किसी भी सरकार के साथ सहयोग नहीं किया। कसम खा रखे हैं । सरकार की इच्छाओं के प्रतिकूल चलने और रहने की।

हम चाहते रहे कि इनका जीवन स्तर सुधरे। ये लोग गरीबी रेखा के ऊपर उठें। लेकिन ये सब सारे प्रयासों पर सदा पानी फेरते रहे। गरीबी रेखा से ऐसे चिपके रहे कि लाख कोशिश के बाद भी वर्षों से वहीं के वहीं हैं। जबकि सभी पार्टियाँ इन्हें जी जान से धकेलती रहीं। आखिर क्या समझ रखा है सरकार को ? सरकार से सहयोग न करना कोई मजाक थोड़े है। विद्रोह है। आखिर हम कबतक बख्शते। हर चीज की एक सीमा होती है। तमाम प्रयासों के बाद भी सरकार को नीचा दिखाने के लिए किसान लोग आत्महत्या करते रहे। क्या समझते हैं कि हमलोग डर जायेंगे ?  मरना है तो शौक से मरो ,  कोई रोक थोड़े रहा है।  देश में वैसे ही जनसंख्या विस्फोट होने को है।  लेकिन सरकार को काहे बदनाम करते हो ?

इनके गांवों में बिजली आज तक नहीं पंहुच पाई है। इन्हें न खाने को ठीक से भोजन मिलता है और न ही पीने को पानी। इनके लिए सड़के नहीं है। यदि कोई सरकार सड़क बनवा भी दे तो छ महीने से जादा चल नहीं सकती। आखिर कहाँ तक हम सड़कें बनाते फिरें। छोटे-छोटे कस्बे आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए। शहर महानगर हो गये। लेकिन इनका गाँव अभी भी वहीं का वहीं है। शहरों में ऊँची-ऊँची बहुमंजिला इमारतें बन गईं लेकिन ये लोग अब भी कच्चे मकान व  झुग्गी-झोपड़ियों में ही रहते आ रहे हैं। यह अक्षम्य है।

अगर एक अपराध हो तो गिनाया भी जाय। जब अनेकों हैं तब कहाँ तक हम लोग बताते फिरेंगे। जब जेल में चक्की पीसेंगे तब दिमांग अपने आप ठिकाने लगेगा। सरकार ने सबके लिए उचित कैलोरी के भोजन का मापदंड तैयार कर रखा है। किसको कितने कैलोरी का भोजन लेना आवश्यक है। यह स्वास्थ्य केन्द्रों, किताबों, तथा समय-समय पर दूरदर्शन के द्वारा भी बताया जाता रहता है। लेकिन कभी इन लोगों ने इसे अमल में नहीं लाया। काम तो करेंगे छाती फाड़कर और रहेंगे भूंखे अथवा आधा पेट खायेंगे। या रूखा-सूखा खाकर ठंढा पानी पीकर रहेंगे। पौष्टिक भोजन से इन्हें नफरत है क्योंकि सरकार इसे जरूरी बताती है।

उचित भोजन के साथ फल खाने की भी आवश्यकता रहती है। लेकिन इन्हें फल भी नहीं भाता। इसी से इनसे फल रूठा रहता है और इन्हें इनके परिश्रम का भी फल नहीं मिल पाता। हम लोग फल खाते हैं। मुसम्मी का जूस पीते हैं। जवान दिखने के लिए चूजे तक का रस पी जाते हैं। लेकिन इन्हें चीनी तक का रस महरूम है। क्योंकि पचास रूपये किलो जो है। खाने-पीने की जरूरी चीजें जैसे दाल, सब्जी और दूध आदि इनकी जरूरत से भी कम पैदा होने पर सबसे पहले उसे बेचते हैं। क्योंकि पैसा चाहिये इन्हें। फिर भी इनकी आवश्यक आवश्यकताएं भी  कभी पूरी नहीं होती।

जहाँ एक ओर हमारे देशी-बैंक खातों में जगह नहीं रहने से हमें बिदेशी बैंको की मदद लेनी पड़ती है। वहीं दूसरी ओर इनके अगर खाता हो भी तो न्यूनतम जमा राशि से उसमें कभी अधिक होने ही नहीं देते। अगर अधिक हो जाये तो बिना निकाले इन्हें चैन ही नहीं आता। ऊपर से कर्जा लेने के आदी हो चुके हैं। ये लोग कर्ज में ही पैदा होते हैं और कर्ज में ही  मर -खप जाते हैं।

कहाँ तक बताएं। हमारे बच्चे तो विदेश में पढ़ते हैं। लेकिन इनके बच्चे देश में भी नहीं पढ़ पाते। यह इनकी साजिश है कि देश कहीं पूर्ण साक्षर न हो जाये।

देश में अनेकों प्रायवेट अस्पताल हैं। अनेकों सरकारी अस्पताल हैं। दवा नहीं मिलती वह दूसरी बात है। डॉक्टर समय से न मिलें यह भी हो सकता है। लेकिन ये और इनके परिवार वाले रोग पाले रहते हैं। घुल-घुल कर जीते-मरते हैं। जहाँ तक हो सकेगा अस्पताल नहीं जायेंगे। पहुंच भी गये तो यदि दस दिन का दवा लेना है तो पाँच दिन का ही लेंगे। थोड़ी राहत क्या मिली दुबारा दिखाने नहीं आयेंगे। कारण हम चाहते हैं कि सब निरोगित रहें लेकिन ये रोगी बने रहना चाहते हैं। उपरोक्त सभी पहलुओं पर विचार किया जाय तो ये लोग देश के विकास में बाधक हैं।

इतना ही नहीं पर्यावरण को भी इन लोगों से बहुत नुकसान पहुँचता है। हीटर, रेडिएटर, एयरकंडीशनर का प्रयोग नहीं करते। ठंडी में बड़े-बड़े अलाव जलाकर तापते हैं। जिससे बड़े पैमाने पर कार्बनडाईऑकसाइड का उत्सर्जन होता है। रसोई में रसोई गैस का प्रयोग नहीं करते। जिससे भी पर्यावरण की क्षति होती  है। अस्थमा अलग से पनपता है। जहाँ-तहाँ गंदगी फैलाते हैं। ठंडी में इन्हें निमोनिया, गर्मी में हैजा व मलेरिया होता है। बरसात में भीगते हैं। बाढ़ में बहते हैं। आंधी में केवल इन्हीं के घर उजड़ते हैं। इन्हें कभी चैन नहीं मिलता। सारी समस्याएं इन्हें ही घेरती हैं।

इतना सब होने पर भी ये जिन्दा रहते हैं। लेकिन इन तमाम अपराधों को देखते हुए इन्हें इस तरह भी जीने नहीं दिया जायेगा। इन्हें सजा अवश्य दी जायेगी। इन्हें इनके परिश्रमों का उचित फल भले ही कभी न मिला हो। लेकिन अपराधों का उचित फल मिलेगा। इनके जमीन-जायदाद से जो धन मिलेगा। नेता लोग उसका उचित इस्तेमाल करेंगे। जब सारे पिछड़े, गरीब, मजदूर और किसान नहीं रहेंगे तो देश की बहुत सारी समस्याएं अपने आप समाप्त  हो जाएँगी। गरीबी, पिछड़ापन, निरक्षरता, कच्चे मकान, झुग्गी-झोपडी आदि सब गायब। वर्षों का टंटा समाप्त हो जायेगा। देश के तरक्की का और कोई दूसरा आसान तरीका नहीं है।

यही मँहगू का अँधेर राज है। अब उसकी स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि किसी भी तरह से समझाने के बाद भी उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वह बड़बड़ाता रहता है कि कुछ भी हो सकता है। सरकार से हम लोगों का विश्वास उठ चुका है। सरकार कुछ करेगी। इस बात का ख्याल तो हम पहले ही छोड़ चुके हैं। लेकिन अब अँधेर राज आएगा। हमें कमाने-खाने भी नहीं दिया जायेगा। हमारे पास जो थोड़ी बहुत जमीन-जायदाद है। उसे हडपने की यह साजिश है। घोर अन्याय है। हम लोगों का कोई अपराध नहीं है।

नेताओं पर हमने सदा विश्वास किया। वे बोले वोट दो। हमने उन्हें वोट दिया। हमें न सही नेताओं को नोट मिला। बदले में हमें केवल चोट मिली। हम जी-जान से अपना खून-पसीना बहाकर कमाते खाते आये। सदा अभावों की जिंदिगी जिये। सबसे ज्यादा मेहनत हम करते हैं और सबसे जादा अभावग्रस्त भी हम ही लोग रहते हैं। क्या बिडंबना है ? 

अभी तक धीरे-धीरे चोट मिलती रही। तो तड़फ-तड़फ के जीते रहे। इतनी बड़ी चोट से तो मरना तय है। इस चोट को सहने की सामर्थ्य नहीं है। इससे पहले ही मर-खप जाएँ तो अच्छा है। कोई लाख जाकर मंहगू से कहे कि सपने तो बहुत देखे जाते है लेकिन सभी सपने कहाँ सच होते हैं। वह भी  किसानों और मजदूरों के लेकिन नहीं मानता। कुछ भी कहो कि प्रजातंत्र में ऐसा बिल्कुल संभव नहीं है। सभी पार्टियाँ तो आप लोगों के साथ होने की बात करती हैं। उनका हाथ आपके साथ रहे या न रहे। आप लोगों के भी भगवान का दिया हुआ हाथ जन्म से ही है। जिससे आप अपनी रोजी-रोटी कमाते रहे हैं। वह हाथ आप से कोई छीन नहीं सकता। एक बात और है सभी पार्टियाँ किसी भी मुद्दे पर एक मत हो ही नहीं सकती। कभी हुई हैं क्या ?  इससे ये सपना अपने आप गलत साबित हो जाता है। लेकिन वह कुछ भी नहीं सुनता।

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    -डॉ एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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