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November 2011
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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कर्म का पथ

सूरज पूरब में उगकर

पश्‍चिम में होता अस्‍त है,

 

सुख-दुख का अटल नियम,

इससे ही होता सत्‍य है,

 

सूर्योदय ही भाग्‍योदय है

भाग्‍योदय ही सूर्योदय है,

 

जो भाग्‍य के सहारे जीते हैं

जीवन में कुछ न पाते हैं,

 

तरह-तरह की इच्‍छायें

मन में रखे रह जाते हैं,

 

इसीलिए हे प्‍यारे बच्‍चों

मन में दृढ़ विश्‍वास जगाओ,

 

छोड़ सभी निराशाओं को

कर्मवीरों सा पथ अपनाओ।

 

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर 242401 उप्र

डॉ. अमिता कौंडल
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तुम्हारे दादा ने लगाया था कभी
हरा भरा बागीचा
पिता ने दे पानी और खाद
की थी इसकी परवरिश
इसकी डालियों पर झूल कर
तुम सब बड़े हुए
इसके फल खा,
छुपन छुपाई खेल
पले तुम्हारे बच्चे
पर घर का बटवारा क्या हुआ
जमीन जायदाद क्या बंटी
तुमने इसे भी बाँट डाला
इसका हर इक पेड़ काट डाला
और बना ली चारों भाईयों ने
बड़ी बड़ी कोठियाँ
अब निशानी के तोर पर
बचा है यह इक आम का पेड़
जिसे रो रो कर बचा लिया था
तुम्हारे बच्चों ने
और आज इसके लिए भी
तुम सब लड़ते हो
इस पर बराबर का हक
समझते हो
तुम सब तो संग न रह सके और
तन्हा कर दिया यह पेड़
जो आज भी तुम्हें
फल,फूल और छाया दे
सीखा रहा है धैर्य, त्याग
और परमार्थ का सबक
अब भी कुछ सीख सकते हो
तो सीखो इससे..................
Amita Kaundal (Ph.D)
 

जनार्दन जी एक दिन अपने बाललीला के दिनों को याद करते-करते रामलीला को याद करने लगे. कहने लगे, जब रामलीला के दिन आते तो बड़े उत्साह के साथ छोटे, बड़े और मझले, बड़े, बूढ़े और जवान, बच्चे, बच्चियां और महिलायें, दादी, अम्मा, बुआ, चाची और बहनें सभी को रामलीला अच्छा लगता था, सभी जाते थे. घरों के लडके और बड़े रामायण के अलग-अलग पात्रों के रूप में अभिनय करते थे. लड़कों में से ही राम, लक्ष्मण के अलावा सीता की भूमिका भी कोई लड़का ही करता था, दशरथ, जनक, रावण, हनुमान, अंगद भी लोग बनते थे. बंदरों की सेना में बच्चों को आनंद आता था. एक मंडली रामायण की चौपाइयों का गायन करता था और उसी के अनुसार कथानक और पात्रों के संवाद आगे बढ़ते थे. जनार्दन जी के गाँव के मास्टर साहब रिहर्सल पर पूरा ध्यान देते थे और स्टेज पर परदे के पीछे से पात्रों को संवादों को बोलने के लिए प्रोम्प्टिंग भी करते थे. क्या दिन थे, जनार्दन जी भी औरों की तरह रात को खाने-पीने से निवृत्त होकर रामलीला देखने जाते और भोर होने से पहले घर लौटते थे. जनार्दन जी से ही यह भी जानकारी मिली कि वे जब कभी रामलीला के दिनों में अपने ननिहाल में होते तो रामनगर की रामलीला देखने का सौभाग्य मिलता.

अपने बचपन में रामलीला देखने के दिनों को याद करते-करते वे अब और आज की दुनिया में आ गए. कहने लगे कि अगर रामानानद सागर नहीं होते, उनकी रामायण नहीं होती, दूरदर्शन के जगह-जगह एलपीटी टावर्स नहीं होते तो राम और रामायण से हमारे बच्चे कैसे परिचित हो पाते. सबका भला हो कि जो रामलीला देखने कभी नहीं गए, रामलीला के पात्रों को देखा नहीं, उनके संवादों को सुना नहीं वे भी रामलीला का मतलब जानते और समझते हैं.

जनार्दन जी की मान्यता है कि जिस तरह रामायण ने, रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने और उसके दूसरे पात्रों-चरित्रों ने भारतीय समाज को दिशा और प्रेरणा दी वह हमारे लिए बहुमूल्य है. हमारे राष्ट्रपिता ने उन्हीं राम के आदर्शों के अनुरूप रामराज्य की परिकल्पना की थी. उनका यह भी मत है कि उन्हीं राम और उनकी अयोध्या ने हमारे देश के सत्ताकांक्षी लोगों को राज्याभिषेक का सुअवसर और सौभाग्य प्रदान किया. जनार्दन जी को इस बात का मलाल और खेद है कि सत्तासीन होकर रामराज्य का सपना दिखाने वाले हमारे रहनुमा रामराज्य की एक झलक भी नहीं दिखा सके. यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है कि रामनामी नारे और झंडे को लेकर चलने वालों में कुछ रावणनामी लक्षण और गुण उभरने लगे और अब तो बस सत्ता के लिए लोग बेचैन और बेहाल रहने लगे है.

जनार्दन जी के स्वर से अब करुणा और वेदना टपकने लगी थी. वे कह रहे थे, ' अब न तो रामायण धारावाहिक है न रामलीला. ‘राम’ और ‘राम के अयोध्या’ वाले भी अब सुविधा और राज भोगी हो गए है. सन्यासियों को तो अब सत्ता में या सत्ता के करीब ही परम आनंद की अनुभूति होने लगी है. मुझे जनार्दन जी के विचारों और भावनाओं से कटुता की गंध आ रही थी. यह कटुता किसी व्यक्ति या व्यवस्था के प्रति न होकर इस बात के लिए थी कि जिनसे थोड़ी आस थी और जिन पर थोड़ा भरोसा था वे ही न काम कर पाए और न ही किसी काम के रहे. जनार्दन जी की ही तरह मैं भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सका था कि भरोसे लायक तो कोई भी नहीं रहा पर इनमे से ही किसी से काम चलाने की मजबूरी है.

इस बीच मेरे मन एक हार्दिक इच्छा पनपने लगी थी कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जनार्दन जी ही कोई हल या समाधान निकालें तो ठीक होगा. कोई हल या समाधान निकालने से पहले ही वे इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि रामलीला होता न होता, अगर रामलीला मैदान न होता तो क्या होता. अपने जिन नतीजों का खुलासा उन्होंने मुझसे करने की ज़हमत उठायी थी उनमे पहला तो यही था कि छोटे बड़े शहरों और राजधानियों में यदि इस तरह के मैदान न होते तो हमारा लोकतंत्र कैसे फलता-फूलता, हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों का प्रदर्शन कैसे और कहाँ होता. आखिर ऐसे मौकों पर जुटने वाले तमाशबीन और तमाशाइयों के लिए अपनी ताक़त और औकात दिखाने के लिए भरपूर जगह और फिर किसी मुसीबत के आने या ढाए जाने पर अफरा-तफरी और भागम-भाग के खुली जगह की भी दरकार तो होती ही है.

जनार्दन जी द्वारा जिस दूसरे नतीजे की बात मैं जान सका वह यह था कि हर किसी को अपने-अपने प्रदर्शन के लिए अपने-अपने ग्राउंड बनाने और अपने नाम से पंजीकृत कराने की लोकतांत्रिक छूट तो दी नहीं जा सकते थी इसलिए रामलीला मैदान और ऐसे दूसरे स्थल तो हमें वरदान स्वरुप मिले समझे जाने चाहिए. उनके इस निष्कर्ष का ठोस कारण यह भी था कि सब अपने-अपने मैदान बनाते तो कोई कॉंग्रेसी, कोई समाजवादी, कोई मार्क्सवादी, कोई जनसंघी मैदान आदि के नाम से जाने और पुकारे जाते. जिनके अपने नहीं होते वे किराए पर लेकर काम चलाते.

एक तीसरे नतीजे पर जनार्दन जी बहुत सोच-विचार के बाद पहुंचे थे कि जन लोकपाल बिल के पारित हो जाने पर रामलीला मैदान का नामांतरण और लोकार्पण जन लोकपाल मैदान के रूप में कर देना चाहिए. इसेसे जुडी दो और बातों पर जनार्दन जी ने स्पष्ट संकेत दिया था कि अब बाबाओं और संतों के लिए भी मैदानों का स्थायी आवंटन कर दिया जाना चाहिए क्योंकि अब उनकी गतिविधिधियाँ लगभग स्थायी और भारतीय लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य लगने लगी हैं.

जनार्दन जी के नतीजों और संकेतों से मैं कत्तई सहमत नहीं था. इसकी वजह यह थी कि एक ही टीम में रहकर भी जब लोग एक दूसरे से सहमत नहीं हो सकते तो मेरा भी जनार्दन जी से सहमत या असहमत होना मेरे लिए ज़्यादा और उनके लिए कम अहमियत रखता है.

जनार्दन जी का चौथा और अंतिम निष्कर्ष यह था कि इन मैदानों और स्थलों को लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए. इन सार्वजनिक स्थलों की गरिमा को बनाए रखना और मजबूत करना सभी की सोच होनी चाहिए. जनार्दन जी के इन नतीजों और निष्कर्षों से मैं अपना एक अलग से निष्कर्ष निकालना चाहता था. लेकिन मैं कई बातों को लेकर अपने को शंकाग्रस्त महसूस कर रहा था. इनमे से एक तो यह ही थी कि रामलीला मैदान की धरोहर तो नेताओं, संतों, बाबाओं और समाज सुधारको के काम तो आती रहेगी पर बच्चों के लिए खेल के मैदान बिल्डरों और रियल स्टेट के खेल में बचेंगे भी या नहीं. दूसरी निराधार और निर्मूल आशंका यह थी कि कहीं कालान्तर में आने वाली पीढियां राम, रामायण और रामलीला मैदान को बिस्मृत न कर दें. एक और बेतुका और बेहूदा आशंका यह भी हो रही थी कि कहीं इन मैदानों के नाम रामलीला मैदान से बदलकर अन्ना मैदान, बाबा मैदान वगैरह वगैरह न कर दिए जाय.

तत्काल मेरा ध्यान इस बात की और गया कि मेरी सारी शंकाएं अकारण और असंभव थीं. इससे मुझे बहुत बड़ी राहत मिली. मन को मैंने श्री राम की और मोड़ा. मैं अपने अंतर्मन से प्रभु से यह कामना करने लगा कि वे हमें सद्बुद्धि दें. वे उन्हें भी सद्बुद्धि दें जो मेरे और अन्ना के घोषित समर्थकों की तरह शंकाग्रस्त हैं. प्रेम से प्रेम और विश्वास से ही विश्वास मिलता है. महाप्रभु उनको भी राह दिखाए जो ह्रदय और अध्यात्म की बातों से ज़्यादा लोक और लोकाचार की ओर मुड़ने लगे हैं. ईश्वर हमारे अन्दर बुराइयों से लड़ने की ताक़त दे. हम नेताओं, बाबाओं और संतों की लीला से दूर राम की लीला देखें और धन्य हों.

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विशाखापटनम की   हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ एवं रंगमंच को समर्पि‍त संस्‍था “सृजन” ने दि‍नांक 27 नवंबर 2011 को द्वारकानगर स्‍थि‍त ग्रंथालय के प्रथम तल पर श्रीमति पारनंदी निर्मला की तीन अनूदित एवं एक मौलिक पुस्तक का विमोचन तथा हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य चर्चा का आयोजन कि‍या।
कार्यक्रम की अध्‍यक्षता सृजन के अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने। डॉ. टी महादेव राव, सचि‍व,  सृजन ने  संचालन कि‍या । स्‍वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम एवं सृजन संबंधी वि‍वरण प्रस्‍तुत कि‍या सृजन के संयुक्‍त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्‍स ने।


पुस्तकों का विमोचन करते हुये नीरव कुमार वर्मा ने कहा की क्षेत्र की जानी मानी लेखिका के चार पुस्तकों का एक साथ विमोचन सृजन के लिए और हिन्दी साहित्य के क्षेत्र के लिए एक उपलब्धि है। उन्होंने पुस्तकों के विषय में विवरण देते हुये बताया की एक मौलिक पुसता खुला आकाश में पारनंदी निर्मला जी  की समस्त रचनाएँ हैं, जबकि तीन अन्य पुस्तकों में दो में तेलुगू की चुनी हुयी और चर्चित कहानियों का अनुवाद है और एक पुस्तक में तेलुगू की मानक लघुकथावोन का अनुवाद है।
श्रीमति पारनंदी निर्मला ने सृजन संस्था को धन्यवाद देते हुये कहा पिछले नौ वर्षों से सृजन हिन्दी साहित्य को इस हिंदीतर नगर में पुष्पित पल्लवित करने में पूरे मनोयोग से जुटी हुई है। दूसरी बार सृजन के तत्वावधान में पुस्तक विमोचन होना मेरे लिए हर्ष का विषय है।

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इसके बाद हिन्दी साहित्य चर्चा कार्यक्रम में सबसे पहले श्रीमति पारनंदी निर्मला ने  अपनी लघुकथा “थप्पड़” सुनाया जिसमें बच्चों में झूठ न बोलने और बड़ों की झूठ का उन पर प्रभाव  पर ताना बाना बुना गया था। श्रीमति  सीमा वर्मा ने अन्ना हज़ारे के मौन को बिम्ब बनाकर कविता सुनाई – मौन  शीर्षक से जिसमें मौन और उसके बाद के तूफान के पहले के सन्नाटे का प्रतीकात्मक प्रस्तुति थी।  श्रीमती मीना गुप्‍ता ने पुराने संप्रदाय और मानवीय मूल्यों को केंद्र में रख कर लिखा गया अपना “संस्मरण” सुनाया। डॉ एम सूर्यकुमारी ने “कल का जवान” आज की अभाव्ग्र्स्त युवा पीढ़ी की व्यथा पेश की जिसमें बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी  का जीवंत चित्रण था।  श्रीमती सीमा शेखर  ने दो कवितायें “कवि हृदय “ और “आधुनिकता” शीर्षक से प्रस्तुत की जिनमे जीवन के विविध पहलुओं को देखने वाली कवि की दृष्टि और आधुनिकता में लिपटे मनुष्यों में घटते मानव मूल्यों के प्रति चिंता थी।  “कविता” शीर्षक रचना में बी.एस. मूर्ति‍ ने वर्तमान में मानव जीवन की वि‍डंबना पर बिम्बात्मक रूप से प्रस्तुत हुये।  अपनी व्‍यंग्‍य शेरों और गीत लेकर प्रस्‍तुत हुए जी. अप्‍पाराव ‘राज’ जि‍समें जीवन की अनेक विविधताओं  का बखान था।


श्री जी. ईश्‍वर वर्मा द्वारा “दो मिनट की मन की शांति” कविता में एकाकी होते मानवीय संबंध और उनमें लुप्त होती प्यार की नमी से श्रोताओं को झकझोरा।  लक्ष्मी नारायण दोदका ने “ ज़िंदगी और मौत” कविता में मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक चलते और पतित होते मानवीय मूल्यों का खुलासा किया। 
अशोक गुप्ता ने अपनी कविता “ शुक्रिया” में  मानव के द्वारा अलग अलग स्थितियों में अपने आभारी होने की स्थितियों का वर्णन प्रभावी ढंग से किया। इसी क्रम में रामप्रसाद यादव ने “तुम्हें देखा ” कवि‍ता पढी जि‍समें प्राकृतिक बिंबों, अनुभूतियों, संवेदनाओं के साथ साथ आज के कठोर समय को प्रतीक बनाकर एक कविता चित्रा सा प्रस्तुत किया। एस वी आर नायुडु अपनी हास्य कविता “दम की बात” में अच्छा हास्याओत्पादक वातावरण सृजित किया। 

मानवीय सम्‍बंधों में घटती आत्‍मीयता एवं बढते भौति‍कवाद के बावजूद अपनी राह हिम्मत के साथ चलते रहने की बात बताई श्रीमति भारती शर्मा ने अपनी कविता   “हारना नही है” में। वर्तमान समाज, मानव-मूल्य, सम्बन्धों में एकाकीपन को अपनी कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया डॉ संतोष अलेक्स ने अपनी कविता  “ना जाने कबसे” में! वर्तमान भ्रष्टाचारी परिवेश में पतन  और जुगाड़ की स्थितियों से भारी लघुकथा “इंद्रजाल” सुनाई डॉ टी महादेव राव ने! 


इस कार्यक्रम में डॉ जीवी वी सत्यनारायणा , डॉ बी वेंकट राव, डॉ डी लक्ष्मण राव , सी एच ईश्‍वर राव आदि‍ ने सक्रि‍य हि‍स्‍सा लि‍या। पढी गई प्रत्‍येक रचना पर चर्चा हुई जि‍से सभी ने सराहा। सभी का मत था कि‍ इस तरह के कार्यक्रमों से लि‍खने के लि‍ए प्रोत्‍साहन एवं प्रेरणा मि‍लती है। डॉ. सन्‍तोष अलेक्‍स के धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्‍न हुआ। 

-    डॉ. टी. महादेव राव
सचि‍व – सृजन 

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बाबू राम लाल जी की रिटायरमेंट में अभी एक वर्ष था कि अचानक उनकी पत्‍नी की ह्रदयघात मृत्‍यु हो गई। बाबू को अभी इकलोते पुत्र का विवाह करना था जो पत्‍नी ने अपने जीवन काल में ही निश्‍चित कर दिया था। लगभग एक वर्ष में पुत्र का विवाह तथा बाबू राम लाल की रिटायरमेंट हो गई। जीवन साथी के अचानक यूं चले जाने से एक बार तो उन्‍हें गहरा आघात लगा था लेकिन इन व्‍यस्‍तताओं के चलते यह बात उनके मानस पटल से मानो विस्‍मृत सी हो गई थी।

सब ठीक ठाक चल रहा था फिर कुछ समय बाद न जाने क्‍यों बाबू के मन में पुनर्विवाह का भूत सवार हो गया और उपयुक्‍त वधु की तलाश में कभी यहां तो कभी वहां भटकने लगे। बने बनाये घर के टूटने के भय से आशंकित जवान पुत्रियों तथा शादी शुदा पुत्र ने पिता को समझाने के अथक प्रयास किए, बच्‍चों ने लगभग आठ वर्ष तक अपने बूढे़ पिता को पुनर्विवाह से रोके रखा लेकिन नियती के आगे भला किसकी चलती है। आखिर बाबू राम लाल को पुनर्विवाह करने पर ही शान्‍तिं मिली।

इस बात से खिन्‍न पुत्र ने पिता को जी भर खरी खोटी तो सुनाई ही साथ ही मां को खोने का गम सीने में दफनाए पुत्र, पिता के खोने के भय से आशंकित, और परेशान हो उठा। पुत्र लगभग डिप्रेशन का शिकार होने को था कि गांव का एक रिटायर्ड बुजुर्ग घर पर आया जो इस सारी दुर्घटना से वाकिफ था। ''बेटा परेशान होने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं, जो होना था हो गया, अच्‍छा! क्‍या तुम जानते हो आदमी को पत्‍नी की सबसे अधिक जरुरत कब होती है ? .......................

जब वह रिटायर हो जाता है! क्‍योंकि उस समय उसके पास न तो कोई बैठने वाला होता है और न ही उसकी बात सूनने वाला। काम कुच्‍छ होता नहीं है इसलिए तनहाई काटने को दोड़ती है।'' बुजुर्ग ने समझाते हूए कहा। ''जी चाचा जी'' परेशान पुत्र बस इतना ही कह पाया, चाचा की सीख ने जाने क्‍या जादू किया कि सारी परेशानी दूर हो गई और पुत्र ने हालात से खुशी खुशी समझोता कर लिया।

अनन्‍त आलोक

anant alok1@gmail.com

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा पटना की कलाकृति)

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फल और डालियाँ

जब से

फलों से लदी हुई डालियों ने

झुकने से मना कर दिया

फलों ने

झुकी हुई डालियों पर लगना शुरू कर दिया

अब कहावत बदल चुकी है

आजकल जो डाल

जितना ज्यादा झुकती है

वो उतना ही ज्यादा फलती है
सादर
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धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा पटना की कलाकृति)

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बालक के व्‍यक्‍तित्‍व निर्माण में समाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। बालक की अभिरुचियों, कौशलों, आवश्‍यकताओं को प्रभावित करने वाले बाल साहित्‍य सर्जक को बालक के सामाजिक परिवेश को समझकर ही बाल साहित्‍य सृजन की ओर उन्‍मुख होना चाहिए। वातावरण की सहायता से नेताजी सुभाष, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर, वीर शिवाजी को राष्‍ट्रीय चेतना से युक्‍त क्रांतिकारी बनाने में समर्थ हुए। भले ही उनकी अपनी माताओं का भी हाथ रहा हो। समाज से जुड़ा कल्‍पनायुुक्‍त साहित्‍य हो या ऐतिहासिक कथानक। अगर उसमें वातावरण का ध्‍यान रखा गया है तो अवश्‍य ही बालक को अपनी ओर खींचकर उस पर अपना अमिट प्रभाव डालता है। जिससे ही विष्‍णु शर्मा की पंचतंत्र की काल्‍पनिक कथाएं अमर शक्‍ति के तीन मूर्ख पुत्रों को विद्वान नीति निपुण बनाने में समर्थ होती हैं। यही नहीं पिछले वर्षों हैरी पाटर की रातों रात आठ लाख प्रतियां बिक गई। निश्‍चय ही इन सबके पीछे काल्‍पनिकता के बाद भी बच्‍चों के लिए आकर्षण ही रहा है जो उन्‍हें अपनी ओर खींचने में समर्थ हुआ है।

इसके विपरीत बाधक वातावरण की बात करें तो कितने ही बालक शक्‍तिमान बनने के चक्‍कर में हाथ-पैर तुड़ा बैठे। कुछ विज्ञापनों की दुनियां में अपनी सांवली छोटी बहन को सफेद करने के लिए वाशिंग मशीन में डालने की कोशिश करते देखे गए अथवा भूत-प्रेत की कहानियों के प्रभाव में सोते-सोते जाग गए या चीखने लगे। कहने का तात्‍पर्य यह है कि कल्‍पना शीलता होना अनुचित नहीं कहा जा सकता है, लेकिन वह बालक को सृजन की ओर ले जाए। उसमें सोचने-समझने, निर्णय लेने की शक्‍ति विकसित करे। उसकी जिज्ञासा का हल स्‍वस्थ रूप से करे, न कि भय उत्‍पन्‍न कर अथवा हाथ-पैर तुड़वा कर।

कुछ लोगों का माना है कि बालक पढ़ते ही नहीं। उनके पास समय नहीं है। रुचि भी नहीं है। यदि बालसाहित्‍य बालक को पढ़ने के लिए दिया जाए तो निश्‍चित है कि बच्‍चे उसमें रुचि लेंगे। यही नहीं बार-बार पढ़ेंगे। हो सकता है कि पुस्‍तकों-पत्रिकाओं के लिए छीना-झपटी भी करें। उदाहरण स्‍वरूप सरकारी विद्यालयों में मीना की कहानियों की बारह पुस्‍तकों को लिया जा सकता है। हमें दो, हमें दो कहकर पुस्‍तकों के लिए बच्‍चे झगड़ते है।

समस्‍या पढ़ने से अधिक पुस्‍तकों-पत्रिकाओं के बच्‍चों तक पहुंचने की है। अधिकांश बच्‍चों के पास अपने पाठ्‌यक्रम के अतिरिक्‍त दूसरी पुस्‍तक ही नहीं है। वह पढ़े तो क्‍या? मैंने कई ऐसे बच्‍चे देखें हैं जो ऐसी स्‍थिति के कारण ही हाथ में आ जाने वाली किसी भी पुस्‍तक को पढ़ने लगते हैं। भले ही वह उनके आयु वर्ग की हो अथवा नहीं। इसका समाधान गांव-गांव में छोटे-छोटे पुस्‍तकालयों की स्‍थापना से हो सकता है। जिसके लिए गांव की संस्‍थाएं विशेषकर विद्यालयी घटक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जहां न केवल बालकों को पढ़ने के लिए विविध विषयों की रुचि पूर्ण ज्ञानवर्धक पुस्‍तकें-पत्रिकायें मिलें, बल्‍कि वह उन पर चर्चा भी करें।

वर्तमान समय में आधुनिकता के बोझ से दबा वातावरण पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति की नकल करते परिवार, शिक्षा, वैज्ञानिक उपलब्‍धियां, इलैक्‍ट्रानिक माध्‍यम आदि बालक को प्रभावित कर रहे हैं। जिसके संदर्भ में कहना चाहूंगा कि श्रेष्‍ठ मानव का निर्माण श्रेष्‍ठ बालसाहित्‍य कर सकता है। विद्यालयों में बालसाहित्‍य सृजन के कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित करना सार्थक सिद्ध होगा। इनका दीवार पत्रिका, स्‍मारिका व वार्षिक पत्रिका आदि में भी उपयोग किया जा सकता है। इसमें प्रेरणा प्रोत्‍साहन व सम्‍मान पुरस्‍कार के कार्यक्रम जोड़कर और अधिक उत्‍साह वर्धन किया जा सकता है।

कभी अज्ञेय ने बच्‍चों की दुनिया के बारे में कहा था-‘‘ कि भले ही बच्‍चा दुनिया का सर्वाधिक संवेदनशील यंत्र नहीं है पर वह चेतन शील प्राणी है और अपने परिवेश का समर्थ सर्जक भी। वह स्वयं स्‍वतंत्र क्रियाशील है एवं अपनी अंतः प्रेरणा से कार्य करने वाला है। जो कि अधिक स्‍थायी होता है।'' इससे स्‍पष्‍ट होता है कि बालक से जुड़ने के लिए उसके समाज से जुड़ा जाए। समाज के सरोकारों को जानकर बालसाहित्‍य सृजन की ओर उन्‍मुख हुआ जाए। यही श्रेष्‍ठ दायित्‍व व प्रभावपूर्ण कार्य भी होगा।

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर

जनार्दन जी की स्वीकृति और आशीर्वचन मिलने के बाद से मैं अपनी गिनती स्वयंभू लेखकों में करने लगा हूँ . लेखकीय वाइरस से संक्रमित होने के कारन व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लेख में थोड़ा-थोड़ा हाथ पैर मारने के बाद अब उपन्यास में हाथ आज़माना चाहता हूँ . मुझे इस मामले में अपनी औकात का भरपूर अंदाजा है फिर भी स्वयं को मैं झोला-छाप साहित्यकारों की श्रेणी में रखने को कत्तई तैयार नहीं हूँ . जनार्दन जी जीवट और उत्साह से ओतप्रोत हैं ही और उनके संगत में मुझे भी इसे अपने साथ रखने की प्रेरणा मिलती रहती है . सचमुच बड़े भाग्य से किसी को अपने गुणों को पहचानने वाला मिलता है. मेरे गुणों को पहचानने वाला उनके जैसा गुणग्राहक कहाँ मिलेगा, इस बात से मैं शत-प्रतिशत आश्वस्त हो गया हूँ.

जनार्दन जी के पास मैं अपने ज़हन में अपने भावी उपन्यास के लिए पल रहे पात्रों के बारे में सलाह-मशविरा करने गया तो देखा कि वे बहुत ही उत्साहित मुद्रा में विराजमान हैं. दरअसल, उनके गंभीर और संजीदे हाव-भाव के मुकाबले उनकी यह मुद्रा मुझे अच्छी लग रही थी परिणामतः मैं भी उत्साहित महसूस करने लगा. कुछ देर हम दोनों इसी हाल में रहते पर वे स्वयं बीच में आ गए और पूछने के अंदाज़ में बोले- 'आप के शहर में कितना बड़ा इवेंट होने जा रहा है, आप भी कुछ अता-पता रखते हैं.' इस सिलसिले में कुछ भी मालूम न होते हुए भी मैंने पूरे अदब से कहा कि हमारे अदब और तहजीब के शहर में रैलियों और प्रदर्शनों के अलावा अक्सर ही जलसे, महफ़िलें, मुशायरे, महोत्सव और दीगर इवेंट्स होते ही रहते हैं.

जनार्दन जी को मुझसे अपेक्षित जानकारी नहीं मिली तो वे कहने लगे कि 'यह तो ठीक है कि हमारे शहर में चहल-पहल और गहमा-गहमी का माहौल बना ही रहता है पर किसी भी इवेंट के छोटे या बड़े, भारी या हलके, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्टार के होने से उतना फर्क नहीं पड़ता जितना इस बात से कि ऐसे आयोजनों के पीछे की भावना और आगे की संभावित उपलब्धियां क्या हो सकती हैं. वैसे मैं उन आयोजनों को बड़ा और भारी मानने लगा हूँ जिसमे भारी और बड़े लोग जुड़े हों, भारी धन लगा हों और भारी भीड़ जुटी हो. जो जितना हिलाए, जितना बहलाए और जितना सहलाए उतना ही वजनदार होगा,

जनार्दन जी ने वजनदार की चर्चा की तो मैंने भी अपने दिमाग पर हल्का-सा वजन डालने की सोचने लगा. मेरे सोच की प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुयी थी कि जनार्दन जी ने एक नए आयोजन के होने की जानकारी से पर्दा उठाया और बताने लगे कि कुछ स्वनामधन्य और बहुत सारे आप जैसे स्वयंभू साहित्यकारों का एक डेलिगेशन सरकार से मिलने और अपनी मांगे रखने की योजना बना रहा है. इन लोगों की यह भी योजना है कि सरकार के सामने एक प्रस्ताव यह भी रखा जा सकता है कि आईपीएल की तरह आई.डब्लू.एल (इंडियन राइटर्स लीग) का गठन और संचालन किया जाय जिसके अंतर्गत लेखकों और कवियों की खरीद और नीलामी की जाय और इनकी प्रतिभा का इस्तेमाल देश के स्वर्गस्थ और मृत्युलोक के समकालीन राजनेताओं को समर्पित अभिनन्दन ग्रन्थ, महात्म्य, शतक, काण्ड, विरदावली, रासो, चालीसा और ग्रंथमाला आदि रचने के लिए किया जाय.

खरीद और नीलामी की बात पर मन थोड़ा उचाट और खट्टा इस बात के लिए हुआ कि चाहे क्रिकेटर हो या लेखक, स्टार हो या सारिकाएँ सभी हैं तो इंसान हैं और इनकी खरीद और बिक्री कहाँ तक जायज़ है. 'साहित्यकार भी बिक सकता है' सोचकर वितृष्णा से मन भरने लगा. फिर ज़हन ने इसे जायज़ ठहराने की कोशिश की कि हमारे कई पर कुछ नेता भी तो आदमी ही होते हैं और बिकने को भी तैयार होते हैं. फिर मैंने सोचा कि मैं इस झमेले में क्यों पडूं. रही बात साहित्यकारों की तो बिकने या नीलामी होने के बजाय बोंड या कान्ट्रेक्ट के ज़रिये भी उन्हें इंगेज किया जाता है तो भी वे बंधुआ कहलायेंगे ही.

जो भी हो मुझे यह सोच और स्कीम दोनों ही धांसू लग रहे थे क्योकि कहीं मेरे फिट होने का रास्ता निकाला जा सकता था. इतने में जनार्दन जी ने दूसरा खुलासा किया और बताया कि एक योजना यह भी है कि सरकार काश्मीर, उत्तरपूर्व, बुंदेलखंड को मिलने वाले पॅकेज की तरह किसी पॅकेज का ही एलान करे और संस्थानों द्वारा दिए जा रहे सम्मानों और पुरस्कारों से वंचित और उपेक्षित (मेरे जैसे) राइटर्स के सुख सुविधा का भी सरकार ध्यान रखे.

जनार्दन जी यह अच्छी तरह समझ रहे थे कि उनकी बातों से मैं आल्हादित होने की स्थिति में आने लगा हूँ. वे नहीं चाहते थे कि अभी कुछ देर तक ही सही मैं इस मनोदशा से बाहर आऊं. लगे हाथ उन्होंने यह भी संभावना जताई कि हो सकता है कि सरकार इस यज्ञ के लिए टेंडर प्रणाली का सहारा ले और इसमे पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह सारी प्रक्रिया 'ऑनलाइन' की जाय. डर और आशंका इस बात को लेकर भी मन में घर करने लगी थी कि नीलामी की योजना का हश्र कही 'टूजी' और ‘थ्रीजी’ स्पेक्ट्रम वाला न हो जाय. मेरे मन को इस बात से खुशी हो रही थी कि संभव है कि हमारे जैसे लोग प्रकाशकों की दादागीरी और तिरस्कार-शोषण-दोहन की सांसत से बच जांय.

इस सब के आगे अब मैं स्कीमों और योजनाओं के बारे में जानने और सुनने के बजाय इस बात में रूचि लेने की सोचने लगा कि इनमे से मेरे हाथ क्या लग सकती है या मैं क्या हथियाने की जुगाड़ कर सकता हूँ. मैंने सोचा कि लगे हाथ जनार्दन जी से यह भी जान लूँ कि किन विषयों अथवा विभूतियों को ये सारे लेखन समर्पित होंगे. मेरी बेताबी बढ़ने लगी थी. इतना उतावलापन मैंने कभी भी नहीं महसूस किया था. लेखकों-कवियों के लिए किसी पॅकेज या अनुदान योजना आदि में मेरी कोई दिलचस्पी नही थी. मेरी मन में इकलौती हसरत घर कर चुकी थी कि मुझे कोई खरीदे और मैं किसी के हाथ बिकू. मैं बिक जाने के बाद भी स्वान्तःसुखाय कुछ ऐसा रच जाना चाहता था जिससे आने वाली सात-सात पीढियां मुझे याद रखती. तत्काल मैंने दंडवत की मुद्रा में जनार्दन जी से आग्रह किया कि वे उन ग्रंथों, महात्म्यों, और विरदावालियों से मुझे अवगत कराएं जिसमे से दो-चार पर अपना हक जमाने की कोशिश कर सकूँ.

जनार्दन जी मेरी पीड़ा समझ रहे थे, मेरी मेधा और प्रतिभा का अनुमान उन्हें था ही. उन्होंने सबसे पहले लेडीज़ फ़र्स्ट को दृष्टिगत रखते हुए उन महिला विदुषियों का उल्लेख किया जिन पर महात्म्य की रचना की जा सकती थी. इस श्रेणी में सोनिया, सुषमा, ममता, जयललिता, माया, उमा, मीरा, वृंदा का नाम आया तो मुझे लगा कि देवियों के लिए समर्पित की जाने वाली रचनाएँ महात्म्य के रूप में ही उपयुक्त लगेंगी. इसके बाद बारी आयी विरदावालियों की तो जिसके लिए अटल, आडवाणी , मनमोहन, प्रणव, सोमनाथ, ज्योति, फारुख, शरद, रामविलास जैसे नामों पर सहमति बनती लग रही थी. मुझे कुछ और वीरों और धुरंधरों की याद आ रही थी कि इस बीच जनार्दन जी बोल पड़े कि कुछ चालीसा और पचीसी टाइप साहित्य की भी रचना की जा सकती है और इसके लिए लालू, मुलायम, नायडू, बादल, चौटाला, नितीश आदि को लिया जा सकता है. जैसे-जैसे शीर्ष और शिखर भद्र पुरुषों और महिलाओं की सूची जनार्दन जी मेरे सामने रखते जा रहे थे उससे मेरे मन में एक भय और शंशय पलने लगा था कि कही कोई नाम उनसे छूट या रह गया तो कही लेने के देने न पड़ जाय हालाँकि मेरे ऊपर कोई बात आने के बजाय संभवतः उन्ही के पल्ले पड़ती. मुझे लगा कि जोर्ज और एनडी की अनदेखी सही नहीं होगी. तभी मेरा ध्यान छोटे भाई की और गया और उनके लिए अमर-रहस्य-पुराण का रचा जाना ज़रूरी लगा.

मैं चाहता था कि कुछ और विकल्प सामने आये तो उनमे से दो-चार का वरण करूँ. मैं मौन रहा तो जनार्दन जी ने सूची आगे बढ़ाई. अब वे पुराणों पर आते हुए बताने लगे कि वैसे तो एक पुराण 'भ्रष्टाचार पुराण' में कईयों को समेटा और लपेटा जा सकता है पर इससे लेखकों-कवियों के लिए उपलब्ध ऑप्शन कम और सीमित हो जायेंगे अतः अलग-अलग विभूतियों के लिए पुराणों को रचने के अलावा एक 'महा भ्रष्टाचार पुराण' का सृजन किया जा सकता है जिसे काल-खंडो में और प्रसंगों के अनुसार बांटा जा सकता है. जनार्दन जी शंकाग्रस्त इस बात को लेकर हुए कि काल-खण्डों और प्रसंगों की बात मेरे समझ में नहीं आने वाली है इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचवर्षीय कालखंड के रूप में घोटालों का वर्णन करने के साथ-साथ इनसे जुड़े विषयों जैसे बोफोर्स, पशुपालन, हवाला, दूरसंचार, चारा, बराक मिसाइल, तहलका, ताज कोरीडोर , तेल के बदले अनाज, कैश फ़ॉर वोट, सत्यम, आदर्श सोसाइटी, राष्ट्रमंडल खेल और टूजी स्पेक्ट्रम, मनरेगा, स्वास्थ्य मिशन आदि को कवर किया जा सकता है. मुझे आभास हो रहा था कि भले ही इन्हें घटित होने में बीस-बाईस साल ही लगे हों पर उन पर किसी महापुराण लिखने में तो सदियाँ लग जायेंगी.

इस आभास के साथ मेरा यह अहसास भी मेरे ज़हन से बाहर आने लगा कि जनार्दन जी से कुछ विषय अथवा प्रसंग अनजाने ही छूट रहे थे. पर जनार्दन जी से कुछ छूट या रह जाय ऐसा तो हो ही नहीं सकता था इसलिए उन्होंने फ़ौरन अपनी अब तक की बात में आगे यह जोड़ ही दिया कि हर्षद मेहता, केतन पारेख, तेलगी, सुखराम, राजा, सुरेश, मधु कौड़ा, मोदी(ललित) पर तो अलग-अलग प्रसंग या एपिसोड लिखे जा सकते हैं. मैंने जनार्दन जी से अत्यंत विनम्र भाव से पूछा कि क्या रासो के लिए भी कुछ सख्सियतों का चयन किया गया है. उन्होंने मुझसे भी ज़्यादा विनम्र और सविनय स्वरों में बताया कि विनय, उद्धव, राज आदि पर रासो रचे जाने पर विचार किया जा सकता है. उन्हें संभवतः यह महसूस हुआ कि इसके लिए राहुल का नाम भी लिया जा सकता है तो उन्होंने राहुल के साथ ही अखिलेश, उमर आदि को रासो लिखे जाने की सूची में रख ही लिया.

अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि केवल सियासी लोगों को ही इस योजना के अंतर्गत शामिल किया जा रहा है लेकिन तभी अन्ना की हुंकार, रामदेव की चेतावनी और श्री श्री के सत्संग की लहर का स्मरण होते ही जनार्दन जी अपराध बोध से ग्रस्त होते लग रहे थे क्योंकि राजनीति में इनके हस्तक्षेपरहित रूचि की बात जगजाहिर हो रही थी. इसीलिये उन्होंने अन्ना के लिए वांग्मय, बाबा के लिए अभिनन्दन-ग्रन्थ और संत और मनीषी के लिए विरदावली के सृजन का प्रस्ताव रखा.

यकायक जनार्दन जी गंभीर हो गए. इस परिवर्तन का सबब जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि किंचित विभूतियों का उल्लेख संभवतः छूट या रह गया हो पर ऐसा सायास रहा हो ऐसी बात नहीं है और फिर अंत में 'भूल चूक लेनी देनी' का प्रावधान तो होता ही है. मुझे लगने लगा कि इस मुहर का प्रयोग वे अपनी बात के समापन के लिए कर रहे है पर ऐसा नहीं था. उन्होंने मुझसे यह बात पूरे बलपूर्वक कहा कि दिवंगत और स्वर्गस्थ देशरत्नों के लिए विशिष्ट श्रद्धांजलि विशेषांक की रचना देश के मूर्धन्य साहित्यकारों के पैनल द्वारा कराया जाएगा.

मैं मन ही मन स्वर्गीय महान आत्माओं के बारे में सोचने लगा और फिर यह भी लगने लगा कि उनके नामों की चर्चा तभी की जायेगी जब यह योजना आगे बढ़ेगी. जनार्दन जी ने इस बारे में अपनी जो मंशा बतायी वह मेरी सोच की प्रमाणित सत्य प्रतिलिपि ही थी. जनार्दन जी अब कुछ आगे कहते या बताते अथवा मैं अपनी कोई जिज्ञासा या शंका उनके सामने प्रस्तुत करता इससे पहले ही मेरा ह्रदय परिवर्तन होने लगा था. देश के कर्णधारों और खेवनहारों की प्रशंसा और यशगान राष्ट्रद्रोह न होकर परम पुनीत राष्ट्रीय दायित्व है इसलिए उन पर ग्रन्थ, पुराण, महात्म्य, चालीसा और चरित सार आदि लिखना सौभाग्य ही कहा जा सकता है. मेरा मन अब इस सौभाग्य से वंचित रह जाने के प्रति आकर्षित होने लगा तो क्षण भर के लिए मुझे अपने ऊपर अचम्भा होने लगा और फिर मन उचाट और खिन्न इस बात को लेकर होने लगा कि स्वयंभू अथवा झोलाछाप लेखक ही सही परन्तु क्या एक साहित्यकार होते हुए मैं किसी खरीद-फरोख्त या नीलामी का हिस्सा होकर अपनी बिरादरी के नाम पर कलंक का कारण कभी बनाना चाहूँगा. मेरे स्वयं से पूछे गए इस प्रश्न का त्वरित उत्तर मेरे अंतस ने दिया. वह इसके लिए रंच मात्र भी तैयार नहीं था. समय रहते ही मेरे अंतःकरण ने मुझे सही दिशा और सही राह दिखा दिया, इस बात से मैं अभिभूत था. मन की मन में समेटे मैं जनार्दन जी से अलविदा कहते हुए अपनी राह पकड़ ली.

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गीत

शृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

मैन सोलह किया श्रृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कजरारे नैनों में काजल लगाया

घुंघराले बालों पे गजरा लगाया

महक उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कानों में मैंने पहनी थी बाली

नाक में मैंने नथनी सजाई

झूम उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

सौतन के घर थे तुम

या सहेली के घर थे

जिया जलाया सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

दिल

सवा लाख का दिल था मेरा

खो गया बीच बाजार

सैंया कारण तोरे

 

बीच सड़क पर नैन मिले तो

मैं हो गयी बदनाम

सैंया कारण तोरे

 

लाज से मोरी झुक गयी अँखियाँ

होंट थरथर कांपे

मुझ को सब निहारे

जैसे मैं कोई अजूबा

सैंया कारण तोरे

 

दिल में मेरे हलचल हो गयी

मन मोरा घबराए

बात करूं तो छूटे पसीना

बोल ना मैं कुछ पाऊं

सैंया कारण तोरे

बलमा कारण तोरे

 

प्यासी

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे

तेरे प्रीत की प्यास मनमा

आधी रह गयी रे

 

एक बार तू आकर मिलजा

सीने में बस एक धडकन

बाकी रह गयी रे

 

सांसें मेरी मद्धम हो गयी

अब ना मैं जी पाऊँगी

दिल में एक फाँस अटकी रे

मुझ को तू छोड़ गया

सौतन संग तूने

प्रीत की तूने रीत निभाई रे

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे  

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कविताएँ

स्वरूप

आकारों में उपस्थित नहीं है

पूरी धरती ईश्वर का रूप है

फिर क्यों हम सब ईश्वर को

मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारे,चर्चों

में ढूंढते फिरते है ईश्वर को

उस परमात्मा

को जो निराकार है

वो आकर का मोहताज नहीं है

वो भाषा और जाति का भी

मोहताज नहीं है वो तो बस

प्रेम और समर्पण को समझता है

अगर पाना है उस को तो

उसके स्वरूप से नहीं

उस के दिखाए मार्ग पर चलना होगा

इंसानियत और इन्सान से

प्रेम करना होगा

 

जान लेती महंगाई

आंधी और तूफान भला क्या

बिगाड़ पायेगा

भूकंप और बाढ़ भला क्या

प्रलय ला पायेगा

आंतकवाद और गोला बारूद क्या

नर संहार कर पायेगा

इन सब से कहीं-कहीं

नर कंकाल गिरा जायेगें

पर ये जो महंगाई का रावण है

सारी दुनिया में हाकाहार मचाएगा

प्रेमचंद की पचहत्‍तरवीं पुण्‍यतिथि (8 अक्तूबर 1936) पर विशेष आलेख
इक्‍कीसवीं सदी में प्रेमचंद की ज़रूरत
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प्रेमचंद को पढ़ना उन चुनौतियों को प्रत्‍यक्ष अनुभूत करना है, जिन्‍हें भारतीय समाज बीते काफी समय से झेलता आया है और आज भी उन चूनौतियों का हल नहीं ढूँढ पाया है। दलित, स्‍त्री, मजदूर, किसान, ऋणग्रस्‍तता, रिश्‍वतखोरी, विधवाएँ, बेमेल विवाह, धार्मिक पाखण्‍ड, मानव मूल्‍यों की दरकन, जेनरेशन गैप, ग्रामीण जीवन की सहजता के मुकाबले नगरीय जीवन की स्‍वार्थ लोलुपता आदि ऐसे ही यक्षप्रश्‍न हैं। आज प्रेमचंद को गए पूरे पचहत्‍तर वर्ष बीत गए हैं, लेकिन उनके द्वारा साहित्‍य में वर्णित चुनौतियाँ इक्‍कीसवीं सदी में अपना चोला बदलकर और अधिक गम्‍भीर चुनौतियों के साथ हमसे रूबरू हैं। उदाहरण के लिए - गोदान के गोबर और पण्‍डित मातादीन आज भी आपको गाँवों में घूमते मिल जाएंगे। यदि हम उनकी अमर कहानी कफन को ध्‍यानपूर्वक देखें तो पाए्रगे कि यह कथा मात्र घीसू-माधव की काहिलता को ही बयान नहीं करती, अपितु इसमें स्‍त्री शोषण, पेट की आग शान्‍त करने के लिए आदमी का रिश्‍तों को तार-तार कर देना तथा गरीब का दुख में भी सुख की खोज करने का प्रयत्‍न जैसे आयाम स्‍वतः ही देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार मंत्र कहानी में डॉक्‍टर साहब की संवेदनहीनता और बूढ़े अपढ़ ग्रामीण की निश्‍छल परोपकारिता सहज ही मन को रससिक्‍त कर देती हैं।

अब प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या आज इक्‍कीसवीं सदी में प्रेमचंद की वाकई हमें ज़रूरत है? ऐसे ही प्रश्‍न गाँधीजी की प्रासंगिकता को लेकर भी अक्‍सर उठाए जाते रहे हैं।लेकिन अभी चौहत्‍तर वर्ष के वयोवृद्ध गाँधीवादी अन्‍ना हजारे ने भ्रष्‍टाचार और जनलोकपाल के मुद्‌दे पर गाँधी जी के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए पूरे देश को आन्‍दोलित कर दिया और वे रातों-रात हमारे युवाओं के रोल मॉडल बन गए। जगह -जगह पिकेट (मंत्रियों-सांसदों के घरों पर धरना प्रदर्शन) करने का उनका गाँधीवादी रास्‍ता प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्‍यम से हमें दिखाते हैं, लेकिन आज कुछ लोग प्रेमचंद की प्रासंगिकता को सवालों के घेरे में खड़ा करने लगे हैं और उन पर तथा उनकी रचनाओं पर मिथ्‍या दोषारोपण करने लगे हैं।

प्रेमचंद को समझने के लिए हमें देश के सामाजिक तन्‍तुओं की जटिलता का अवलोकन करना होगा, जिनके आसपास से उन्‍होंने अपनी कहानियाँ बुनी हैं। इक्‍कीसवीं सदी के पहले दशक के बीत जाने के बावजूद ये जटिलताएँ कम नहीं हुई है, बल्‍कि इनमें हो रहे उभार का प्रत्‍यक्ष अनुभव किया जा सकता है। प्रेमचंद सन्‌ 1910 से 1936 के बीच के अपने रचनाकाल में भारतीय समाज में किसानी को दोयम दर्जे का काम समझे जाने को रेखांकित कर रहे थे और मजदूरी को उससे बेहतर समझे जाने की मानसिकता दिखा रहे थे । पूस की रात का हल्‍कू तथा गोदान का गोबर इसी मानसिकता में डूब-उतरा रहे थे। क्‍या आज भी गोबर जैसे युवा नहीं हैं, जो किसानी को हेय समझते हुए घर-बार, गाँव जवार यहाँ तक कि अपना देस तक छोड़कर मोटे पैकेज के लालच में फ़ैक्‍ट्री (इक्‍कीसवीं सदी में इसे बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी पढ़ें) में काम करना नहीं पसंद कर रहे हैं? क्‍या आज भी युवाओं का इन तथाकथित फ़ैक्‍ट्रियों में शोषण नहीं हो रहा है? क्रेडिट कार्ड और प्‍लास्‍टिक मनी के इस युग में गबन का नायक अपनी पत्‍नी जालपा के मोह में पड़़कर आज भी ऋण जाल में फँसने को अभिशप्‍त है। ‘महाजनी सभ्‍यता‘ निबन्‍ध में भी वे इस ओर बार-बार संकेत करते हैं। मंत्र के स्‍वार्थी और संवेदनहीन डॉक्‍टर साहब आपको हर गली कूचे में मिल जाएंगे। आज भी दलित ‘सद्‌गति‘ के लिए अभिशप्‍त हैं और आज दलित कितने ही महत्त्वपूर्ण क्‍यों न हो गए हों, ‘ठाकुर का कुँआ‘ आज भी उनके लिए ‘मृगतृष्‍णा‘ ही है। आज जिस प्रकार विदर्भ और बुंदेलखण्‍ड के किसान आत्‍महत्‍या करने को विवश हैं, उसकी बानगी वे ‘बलिदान' कहानी में दे चुके थे। उस समय भूमाफिया आज की भाँति सशक्‍त भले न रहा हो, लेकिन इस कहानी के तुलसी और मंगल आज के भूमाफियाओं का स्‍मरण कराने के लिए पर्याप्‍त हैं।

नगर की तुलना में ग्रामों के निश्‍छल जीवन की झांकी प्रेमचंद ने प्रायः अधिकांश रचनाओं में दिखाई है। वास्‍तव में ग्रामों का चित्रण करने में उनका मन अधिक रमा है। इक्‍कीसवीं सदी में आज गाँव कितने ही बदल गए हों, लेकिन गाँवों की यह निश्‍छलता आज भी कहीं न कहीं बरकरार है।

प्रेमचंद को भारतीय समाज के दाम्‍पत्‍य जीवन की विविधताओं की गहरी परख थी। होरी-धनिया के बहाने वे अभावग्रस्‍त दाम्‍पत्‍य में निहित प्रेमांकुरों का सुन्‍दर वर्णन कर जाते हैं। होरी धनिया को गुस्‍से में आकर मारता-पीटता है, तो थोड़ी देर बाद ही उसे पश्‍चाताप का भी अनुभव होता है। यहीं आकर पुनः प्रेम सम्‍बन्‍ध ऊष्‍मायित हो जाते हैं। इसके ठीक विपरीत वे ‘कफन' कहानी में स्‍वार्थ की पराकाष्‍ठा का वर्णन उतनी ही सहजता से कर जाते हैं।घीसू और माधव का प्रसव के दर्द से कराहती बुधिया के पास इस कारण से न जाना कि एक यदि चला गया तो दूसरा उसके आलुओं पर हाथ साफ कर जाएगा, अपने पेट की आग शान्‍त करने के लिए मनुष्‍यता को भूल जाने की हद तक चले जाने का परिचायक है। उल्‍लेखनीय बात यह है कि प्रेमचंद ने कफन और गोदान दोनों को अपने जीवन के अन्‍तिम वर्ष अर्थात्‌ सन्‌ 1936 में लिखा था। ये दोनों रचनाएँ उनकी समाज पर पैनी नज़र की परिचायक हैं।

आज प्रेमचंद को गए पूरे पचहत्‍तर वर्ष बीत जाने के बावजूद भारतीय समाज की समस्‍याओं में परिवर्तन न आना या तो प्रेमचंद की सामाजिक संवेदनाओं की नब्‍ज़्‍ पर गहरी पकड़ का परिचायक है या फिर विश्‍व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बन जाने के बावजूद भारत के काले अंग्रेज़ों द्वारा देश की वास्‍तविक समस्‍याओं के प्रति संवेदनहीनता का परिचायक है। आज आवश्‍यकता इस बात की है कि हम प्रेमचंद के पात्रों की समस्‍याओं को अपने समाज से विमुक्‍त करने का प्रयास करें और तब शायद हम सिर उठाकर कह सकेंगे कि हमने वास्‍तविक आज़ादी हासिल कर ली है।
(चित्र - विकिपीडिया से साभार)
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लेखक परिचय
डॉ. पुनीत बिसारिया
पिता का नाम - श्री प्रकाश शंकर बिसारिया
जन्‍म तिथि - 17.04.1974
सम्‍प्रति - वरिष्‍ठ प्राध्‍यापक, हिन्‍दी विभाग, नेह- स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, ललितपुर,
- 284 403ए उ.प्र.
- सह अध्‍येता, भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान, राष्‍ट्रपति निवास, शिमला
- आमंत्रित व्‍याख्‍याता, महात्‍मा गाँधी अन्‍तरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्वविद्यालय, वर्धा
- जनसूचना अधिकारी, नेह- स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालयए ललितपुर, 284 403, उ.प्र
- काउंसिलर, इन्‍दिरा गाँधी राष्‍ट्रीय मुक्‍त विश्‍वविद्यालय, नयी दिल्‍ली
- अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा विभिन्‍न समितियों में नामित
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पता - साहित्‍य संस्‍कृति 8, राधा एनक्‍लेव, इलाइट चौराहा,
- टाटा मोटर्स के पीछे, झाँसी रोड, ललितपुर, 284 403 m-ç-
Blog/URL : http://www.drpuneetbisaria.blogspot.com
E-Mail : puneetdeep@yahoo.co.in,puneetdeep@indiatimes.com, puneetbisaria8@gmail.com

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चण्‍डीगढ़ ः भारतीय साहित्‍य परिषद (रजि0), मोहाली द्वारा तथा साहित्‍यिक संस्‍था मंथन', चण्‍डीगढ़ के सहयोग से सर्वेंट पीपल्‍स सोसाइटी', सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ के तत्‍वाधान में अमर शहीद लाला लाजपत राय जी की याद में आज 20/11/11 को एक त्रिभाषी कवि सम्‍मेलन का आयोजन लाला लाजपत राय भवन, सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ में किया गया, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में सुप्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब शम्‍स तबरेज़ी विराजमान रहे और कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ साहित्‍यकार जय गोपाल अश्‍क' ने की। मंच संचालन श्रीमती अर्चना देवी ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में महान्‌ शहीद लाला लाजपत जी को पुष्‍प भेंट कर श्रदांजलि अर्पित की गई। तत्‍पश्‍चात जयगोपाल अश्‍क' अमृतसरी ने महान शहीद लाला लाजपत राय के जीवन व उनकी शहादत पर प्रकाश डालते हुए कहा ‘‘लाला जी ने साइर्मन कमीशन' के विरोध में आंदोलन खड़ा कर आज़ादी की जंग में एक अहम्‌ भूमिका अदा व उनकी शहादत की बदौलत ही हम आज आज़ादी में साँस ले रहे हैं।'' शहीदों के प्रति समर्पित नज़्‍म में उन्‍होंने कहा, ‘लाजपत आए लाज पत खातिर, जान हिन्‍द तों कर कुर्बान गए'

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कवि सम्‍मेलन की शुरुआत बेबी जिज्ञासा की कविता रोती दुनिया रोता देश' से हुई, तदुपरान्‍त ग़ज़लकार सुशील हसरत नरेलवी ने अमर शहीदों को समर्पित ग़ज़ल में कहा कि ‘‘छोड़ जाते हैं जहां में कुछ बशर ऐसे निशां/सदियाँ जिनके नक्‍श्‍ो-पा को चूमते थकती नहीं'', दीपक खेतरपाल ने कविता श्रद्धांजलि' में कहा कि सूखी आँखों, मौन श्रद्धांजलि, एक स्‍मारक व कुछ तस्‍वीरें', एस0 एल कौशल ने शहीदान को समर्पित अपनी नज़्‍म में शहीदों को याद किया, रश्‍मि खरबंदा ने ‘‘ एक चदरिया नेह की बुन लूँ, हों जिसमें रिश्‍तों के ताने-बाने'', मुसव्‍विर फिरोज़पुरी ने ‘‘फूल मुरझाने से क्‍या खुशबू मरती है'', पवन बतरा ने ‘‘आज़ादी मिल कुर्बानियों से'', विजय कपूर ने कविताओं के माध्‍यम से आज़ादी के तीन रूपों को बखान किया तो राजेश पंकज ने कविता घर' में कहा कि ‘‘मैं रहता था तेरे घर/तेरा घर था मेरा घर''। इन सभी कवियों की रचनाओं को भरपूर तालियों से नवाज़ा गया।

तत्‍पश्‍चात कवयित्री उर्मिला कौशिक सखी' ने अपनी कविता के ज़रिये कुछ यूँ भाव व्‍यक्‍त किए ‘‘क़लम से हथेली पर बनाकर चाँद/बिटिया ने उतार दिया मेरे आँगन ब्रहाण्‍ड'', कवि अश्‍विनी ने ‘‘चाँद में नज़र कल आई माँ'', सन्‍नी चंदेल ने कविता अभी-अभी', राहुल चौधरी ने ‘‘शमअ भी जलती है परवाना भी', सुभाष शर्मा ने पंजाबी कविता अंतर', अमरजीत अमर' ने ग़ज़ल ‘‘हमको जीवन में हमेशा इम्‍तिहां मिलते रहे/आसमां से भी परे आसमां मिलते रहे'', बलबीर बाहरी तन्‍हा ने ग़ज़ल ‘‘तस्‍कीन से जीना है तो खारों का मज़ा ले'', जयगोपाल अश्‍क़' ने ‘‘ग़मज़दा तो था मगर यूँ खुद से बेगाना न था/मैं तेरी महफ़िल में जब पहुँचा था दीवाना न था'' तो शम्‍स तबरेज़ी ने ग़ज़ल का मतला कुछ यूँ ‘‘न जाने कौन सी पगडण्‍डियों पे चलते हैं/कैसे वो लोग हैं जो सूखे में भी फिसलते हैं'' कहकर खूब वाह-वाही बटोरी।

समारोह के मुख्‍यातिथि जनाब शम्‍स तबरेज़ी ने अपने उद्‌गार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि ‘‘आज के युग में साहित्‍य से जुड़ने की बहुत ज़रूरत है क्‍योंकि हम अपनी जड़ों व जीवन मूल्‍यों से दूर होते जा रहे हैं। उन्‍होंने ज़ोर देकर यह भी कहा कि हमें शहीदों को याद करने के साथ्‍-साथ शहीदों द्वारा दिखाए व बतलाये गये मार्ग पर भी चलना होगा अगर आज़ादी को सही मानी में बरक़रार रखना है तो।'' अन्‍त में पधारे हुए मुख्‍यातिथि व अध्‍यक्ष महोदय, सभी साहित्‍यकार महानुभावों व साहित्‍य प्रेमी श्रोताओं का धन्‍यवाद आयोजक संस्‍थाओं की ओर से सुशील हसरत' नरेलवी ने किया।

सुशील हसरत' नरेलवी

संस्‍थापक अध्‍यक्ष मंथन', चण्‍डीगढ़ (अवैतनिक)

1461-बी, सैक्‍टर 37-बी,

चण्‍डीगढ़ ।

मो009216501966

 

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इन्‍द्र धनुष

(बच्‍चों की 7 कविताएँ)

प्रार्थना

जो है एक और नाम हज़ार,

जिसकी महिमा अपरम्‍पार,

जिसको कहते हैं ईश्‍वर,

जिसको कहते हैं करतार।

जिसने बनाये ये सागर,

जिसने बनाये ये पर्वत शिखर,

जिसने बनायी ये धरती,

जिसने बनाया ये अम्‍बर।

सृष्‍टि कर्ता जो है जग का,

जो है पालन कर्ता,

करता है जो जग का संहार,

उस ईश्‍वर को नमस्‍कार।

फूल

बगिया को महकाते फूल,

रंग बिरंगे प्‍यारे फूल।

तनिक हवा का मिले इशारा,

इधर उधर लहराते फूल।

कॉँटों में भी रह मुसकाना,

हमको हैं सिखलाते फूल।

सबके मन को रिझा रिझा कर,

हमको हैं सिखलाते फूल।

सबके प्‍यारे तुम बन जाना

मुख से मीठी बोली बोल।

तितली

ना जाने किस देश से आती,

ना जाने किस देश को जाती।

रंग बिरंगी प्‍यारी तितली,

तू है सबके मन को भाती।

इक छोटी सी परी तू लगती,

करती रहती है मनमानी।

तुझे बुलाते देख कर बच्‍चे,

आ जा, आ जा तितली रानी।

हरकारे' पंछी

दूर देश से आते पंछी,

सबका मन बहलाते पंछी।

अपनी मीठी आवाज़ों में,

ना जाने क्‍या गाते पंछी।

देश देश का हाल बताते,

दिन भर इधर उधर मँंडराते,

आसमान में उड़ने वाले,

लगते हैं ‘हरकारे' पंछी।

प्रातः काल

कितने सुन्‍दर फूल खिले हैं,

देखो बच्‍चों बगिया में,

गुन-गुन करते भौंरे उन पर

मँडराते हैं बगिया मेंं।

चिड़ियों ने खोली हैं आँखें,

कलियाँ बदलीं फूलों में,

फैल गया है प्रकाश सूर्य का,

इस अँधियारी दुनियॉँ में।

तारे

सुबह होते ही ये सब तारे,

छिपने कहाँ चले जाते हैं।

रात होते ही फिर ये तारे,

चले कहॉँ से आते हैं।

हमें है लगता ये सब तारे,

सूरज से घबराते हैं।

रात समय ये चंदा से आ,

अपनी व्‍यथा सुनाते हैं।

सरिता

देखो कितनी सुन्‍दर लगती,

सरिता की है धार धवल।

कल कल का संगीत सुनाती,

बहती रहती है अविरल।

कल कल की ध्‍वनि में है इसकी,

जीवन का संगीत बसा।

मानो कहती आगे बढ़ना,
बढ़ते रहना, कभी न रुकना।

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-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

मो. ः 9415694329

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संक्षिप्‍त परिचय

नाम ः अनुराग तिवारी

पिता का नाम ः स्‍व. राम प्‍यारे तिवारी

माता का नाम ः स्‍व. सुशीला देवी

जन्‍म तिथि ः 09.05.1970

जन्‍म स्‍थान ः हमीरपुर, उ.प्र.

शिक्षा ः शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से बी. काम. उत्‍तीर्ण

करने के बाद चार्टर्ड एकाउन्‍टेन्‍सी की परीक्षा उत्‍तीर्ण की और तब से बतौर सी. ए. प्रैक्‍टिस कर रहा हूँ।

लेखन ः साहित्‍य के प्रति मेरी रुचि बचपन से ही रही है और तभी से कविताएँ लिखता आ रहा हूँ। मेरी कविताएँ कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

किस्सा दुग्ध चोर उर्फ कल्कि अवतार का

सुबह-सुबह ‘गिरगिट’ मेरे पास दौड़ा-दौड़ा आया और बोला, अमायार! अब तो हद ही हो गई। लोग दूध चुराने लगे। अगर इस पर जल्द रोक नहीं लगी तो कल को कोई मेरी बकरी भी दुह ले जा सकता है।

द्वापर में भगवान कृष्ण माखन चुराया करते थे। हमारे समाजवादी मित्र कहते हैं कि वे समाज में बराबरी लाने के उद्देश्य से ऐसा करते थे। हो न हो कलियुग में भी कृष्णावतार का यह नया रूप हो, जिसमें वे दूध चोर की भूमिका निभा रहे हैं।

सुना है कि मुंबई की झोपड़पट्टियों के तमाम बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। लगता है उन्हीं के पोषण के लिए यह कलियुगी कृष्णावतार है।

अगर महँगाई की सुरसा इसी तरह मुँह बाए रही तो मनमोहन को लौकी, गोभी, आलू, हरी मिर्च और धनिया को भी चुरा-चुराकर गरीबों में बाँटना पड़ेगा।

आगे चलकर आलू-टमाटर कोल्ड स्टोरों में नहीं बैंक के लॉकरों में रखे जाएँगे। लोग सोने के बजाय आलू, प्याज, टमाटर और लहसुन में निवेश करेंगे। शेयर मार्केट सोने-चाँदी या तेल से नहीं आलू-प्याज, टमाटर और गोभी से निर्देशित होंगे। सीएनबीसी या ऐसे ही अन्य व्यावसायिक चैनलों पर विशेषज्ञ लहसुन शेयर, टमाटर शेयर या आलू शेयर खरीदे-बेचेंगे। रेलवे स्टेशन से लेकर मुय बाजारों पर बड़ी-बड़ी विज्ञापन पट्टियों पर यही खबरें तैरेंगी कि लहसुनिया शेयर लुढ़का या पियाजी शेयर हुआ सुर्ख। लौकी ढेर। तेजपत्ता उड़ा। पातगोभी के शेयरों ने छुआ आसमान। सारे देश की देशी दुद्धी पर मुकेश अबानी का कजा।

ऐसा भी हो सकता है कि लिकर-सरदार माल्या आसमान के पाँचों एकड़ में बोएं हरी मिर्च और धनिया। इसका कारण यह होगा कि शुरू-शुरू में धनिया-मिर्च के तस्करों के पास वायुयान अफोर्ड करने की क्षमता तो होगी नहीं। संभव यह भी है कि अंबानीज अपने आलीशान महल की छत पर बोएँ लौकी और कद्दू।

मेरी राय में तो दूध चोरी के प्रसंग पर हमारे धर्माचार्यों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। हो न हो धर्म के पतन और अधर्म के उत्थान के इस कलिकाल में दूध-चोर के रूप में कल्कि अवतार हो चुका हो। पुलिस वालों को भी प्रभु की इस लीला को सिर-माथे लगाना चाहिए और लीला-पुरुषोत्तम दुग्ध चोर को यही सोचकर मुक्त कर देना चाहिए कि-

‘जब-जब होहिं धरम की हानी,

बाढ़इँ असुर अधम अभिमानी।

तब-तब धरि प्रभु मनुज शरीरा,

आइ चोरवइँ ककरी, खीरा...।।’

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ओम जय उल्लू देवा

दीपावली का पर्व मुख्यतः लक्ष्मी जी का पर्व माना जाता है। इनको पाने के लिए भक्त तरह-तरह के उपक्रम करते हैं।

इंदौर के जंगलों में भटकते भक्तों को देखकर मुझे तो केवल हैरानी हुई लेकिन गिरगिट तो पगला ही गया कि देवी-देवताओं के लिए प्रयोग की जाने वाली आरती अब उल्लू को अर्पित की जाने लगी है। उसके अनुसार अब कलयुग का नाश होके रहेगा। मुझे यह सुनके बहुत सुखद अनुभव हुआ कि अब कलयुग का नाश हो जाएगा। यानी सतयुग आने वाला है यानी भ्रष्टाचार का खात्मा...।

सतयुग आ जाएगा तो लोग अपना काला धन स्वयं ला-ला कर सरकारी खजानों में भरने लगेंगे। वैसे इसकी शुरुआत एक ऑटो चालक से दिल्ली में होभी चुकी है। हो भी क्यों न भ्रष्टाचार का आरंभ भी वहीं से हुआ था। वैसे बाबा जय गुरुदेव तो आठवें दशक में ही सतयुग के आने की घोषणा कर चुके हैं। अब दूसरी घोषणा अपने गिरगिट की है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन मुझे तो अभी दूर-दूर तक यह कलयुग जाता हुआ नहीं दिखता। केवल उल्लू की आरती उतारने से बुरे दिन आ जाएंगे गिरगिट की यह बात भी हमारे गले नहीं उतरती। बुरे दिन आने हैं सो वैसे ही आ जाएंगे। जब इंसानी ट्रैक पर गाय-बैलों को दौड़ाया जाता है तब तो बुरे दिन आते नहीं तो भला उल्लू की आरती उतारने से कैसे आ जाएंगे । मुझे तो यह दृश्य देखकर और बड़ी खुशी हुई कि इस देश के समझदार गाय-बैलों ने अपने नीचे लेटे भक्तों का सबसे बड़ा भला तो यही किया कि उन्हें घायल नहीं किया वरना मन्नत तो बाद में पूरी होती पहले तो घाव पुरवाना पड़ता।

एक दूसरे पर पत्थर मारने, अंगारों पर चलने और एक दूसरे पर पटाखे छोड़ने की स्वस्थ परंपराओं वाले त्योहारी देश भारत में जब भगवान शूकरावतार की पूजा की जा सकती है तो उल्लू की क्यों नहीं? वैसे चौरासी लाख योनियों में से हर योनि की अपनी विशेष महत्ता है। इनमें एक उल्लू भी है। कुछ वर्षों पहले गिद्धों को अचानक गायब होते देख कर पर्यावरण विद् विचलित हो उठे थे। मेरी दृष्टि में ये भक्त दूरदर्शी हैं। अब आप पूछेंगे कैसे? इसपर मेरा यही प्रतिप्रश्न होगा कि लक्ष्मी जी की सवारी कौन है? आपका उत्तर होगा कि उल्लू। अब यदि लक्ष्मीजी को खुश रखना है तो उनकी सवारी का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा।

दीवाली के दिन तांत्रिकों के फेर में अनावश्यक बलि चढ़ते उल्लुओं के जीवन की रक्षा का यह नया तरीका है। जब भक्त इन उल्लुओं की आरती उतार रहे होंगे ऐसे में किसकी औकात है कि वह उनके उनके आराध्य देव का अपहरण कर सके।

उल्लू का पक्ष लेने से निश्चय ही गिरगिट मेरे गले पड़ने वाला है। वह सायवादी है। थोड़ा-बहुत प्रगतिशील मैं भी हूँ पर बीबी के करवा चौथ पर बड़े मजे से अपनी आरती उतरवाता हूं। इस बार करवाचौथ पर जब मेरी आरती उतारी जा रही थी उस समय मैं स्वयं को उल्लू से कुछ कम सौभाग्यशाली नहीं समझ रहा था। उसका सीधा सा कारण था धर्मपत्नी का लक्ष्मी का रूप। हर पति बड़े गर्व से अपनी धर्मपत्नी को गृहलक्ष्मी कहता है और गाहे-बगाहे स्वयं के उल्लू होने की घोषणा भी कर देता है। इस तरह वह लक्ष्मी जी की सवारी तो बन ही जाता है। वह इसे न भी स्वीकारे तो भी जगत यह स्वीकारने को कतई तैयार नहीं होगा कि पति देवता पर धर्मपत्नी जी कभी सवार ही नहीं होती हैं।

इस प्रकार उल्लू की यह नवजात परंपरा अपनी संपूर्ण मिथकीय गरिमा के साथ अगले वर्ष से प्रतिष्ठापित होने वाली है। इसलिए प्रिय पाठको तब तक इस आरती का अच्छी तरह से अभ्यास तो कर लो... ओम जय उल्लू देवा।

‘‘अर्ध-सत्‍य''

कहा कमीना कुत्‍ता'

पिछले दिवस निकट दिल्‍ली के मजमा थे अलबेला।

अलबेली मोटर कारों का हुआ था रेलमपेला।

हाहाकार मचा एकदम से छिन गई जैसे सत्‍ता।

खाली सड़क देखकर उस दिन घुसा वहाँ पर कुत्‍ता।

गरियाकर कुछ मतवालों ने कहा कमीना कुत्‍ता।

 

त्रेता युग में भरत मित्र थे, तभी तो उनको राज मिला।

राम को नफरत थी कुत्‍तों से, बरसों का बनवास मिला।

द्वापर युग में धर्मराज को पड़ी मुसीबत रस्‍ते में।

ज्ञानी, गुरू, बंधुवर, प्रियजन, सभी निपट गये सस्‍ते में।

तभी पुराना साथी आया बनकर तारक रास्‍ता में।

विद फैमली ले गया स्‍वर्ग को, शक्‍ति अजब थी कुत्‍ता में।

 

सतयुग में एक बार इन्‍द्र की गायें हो गयी चोरी,

पता नहीं जब चला चोर का, इन्‍द्र करें बरजोरी।

फेल हुई थी सी0बी0आई0 मची खलबली चारों ओर।

' सरमा नाम की एक कुतिया ने गायें उनकी ला दीं ठौर।

इन्‍द्र कृतज्ञ हुए उस पशु के, दे दी आधी सत्‍ता।

लेकिन अब हम हैं पगलाये, कहें कमीना कुत्‍ता।

 

कलयुग का इंसान खुदा से खुद को बड़ा समझता है।

पर, खुद की जगह '' लाइका को राकेट में प्रथम भेजता है।

कौन साथ राज इन्‍हें दे डाला, क्‍या सौंपी इनको सत्‍ता।

सोचो-सोचो क्‍यों बकते हो, इन्‍हें कमीना कुत्‍ता।

 

बीच सड़क पर हांफे, सोचे, बुरा हाल है जीने का,

घूरे देखें, सभी तो चाहे पीना खून कमीने का।

पकड़ न पाओ जब अपराधी, शरण में इनके जाते हो।

अपनी करनी नहीं देखते इनकी दुम सहलाते हों।

नर की नारी करे प्रधानी, पाथे कंडे औरों के,

फिर विकास कैसे, क्‍यों होगा भैस बंधी है औरों के।

 

सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग ऐसा मित्र नहीं पाओगे।

सोच समझकर अब गरियाना, नहीं तो बहुत ही पछताओगे।

फिर कहते हो बड़ा कमीना, अरे बहुत भला है कुत्‍ता।

अब भी आंखें खोलो प्‍यारे, पास खड़ा है कुत्‍ता।

 

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' सरमा - एक कुतिया जिसने इन्‍द्र की चोरी हुई गायें खोजी थी।

'' लाइका- अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम कुतिया।

-रामदीन,

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णानगर, लखनऊ-23

मो0 नं0ः 9412530473

साहित्‍यिक रिपोर्ट

सरिता लोक सेवा संस्‍थान का दशम्‌ सारस्‍वत सम्‍मान समारोह एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन सम्‍पन्‍न ।

अवध क्षेत्रांर्तगत जनपद सुल्‍तानपुर(उ.प्र.)की साहित्‍यिक,सामाजिक संस्‍था सरिता लोक सेवा संस्‍थान ,सहिनवाँ का दशम्‌ सारस्‍वत सम्‍मान समारोह एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन संस्‍थान के अध्‍यक्ष डॉ. कृष्‍ण मणि चतुर्वेदी मैत्रेय के संयोजकत्‍व में आयोजित किया गया। मुख्‍य अतिथि डॉ. मोहन तिवारी(भोपाल),विशिष्‍ट अतिथि डॉ.देवेन्‍द्र साह (बिहार) एवं प्रमुख समाजसुवी रामार्य पाठक (दिल्‍ली)के द्वारा मां शारदे के चित्र समक्ष दीप प्रज्‍वलन तथा माल्‍यार्पण किया गया ,तत्‌पश्‍चात स्‍व. रामकृपाल पाण्‍डेय ,पं. बृज बहादुर पाण्‍डेय और श्री बाबूराम शर्मा जी के चित्रों पर माल्‍यार्पण उनकी संतति के साथ ही कार्यक्रम का आगाज हुआ।

सारस्‍वत सम्‍मान के क्रम में सर्वोच्‍च सम्‍मान कीर्ति भारती (रु.21.. सहित)डॉ. देवेन्‍द्र साह(भागलपुर बिहार),पं. बृज बहादुर पाण्‍डेय सम्‍मान(रु.11..सहित),डॉ. सन्‍त शरण त्रिपाठी सन्‍त (गोण्‍डा)को ,ज्ञान चन्‍द्र मर्मज्ञ सम्‍मान(रु.11..सहित)डॉ. मोहन तिवारी आनंद (भोपाल)को, दर्द(झांसी)एवं गोपाल कृष्‍ण भट्‌ट(कोटा)को साहित्‍य मार्तण्‍ड,अनन्‍त आलोक (हि.प्र.),उमेश पटेल श्रीश (महाराजगंज)को साहित्‍य गौरव कृपा शंकर शर्मा अचूक (जयपुर),रामचरण यादव यादाश्‍त (बैतूल) को भाषा भूषण तथा सैन्‍य कवि रघुनंदन प्रसाद दीक्षित प्रखर( फर्रुखाबाद)को काव्‍य कुमुद तथा प्रदीप प्रचंड को भाषा भूषण से सम्‍मानित किया गया।

सम्‍मान अलंकार उपरांत राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन आहूत किया गया। जिसमें डॉ. मोहन तिवारी आनंद (भोपाल), गोपाल कृष्‍ण भट्‌ट(कोटा), रघुनंदन प्रसाद दीक्षित प्रखर( फर्रुखाबाद), अनन्‍त आलोक (हि.प्र.),सतीश चन्‍द्र शर्मा(मैनपुरी),डॉ. अशोक गुलशन,संगम लाल भंवर (प्रतापगढ)सहित स्‍थानीय कवियों में इन्‍दु,जलज, मनोज,धुरंधरआदि दर्जन भर कवियों ने काव्‍य पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया । देर रात तक चला कवि सम्‍मेलन उत्‍कर्ष के सोपान छूता रहा। समारोह का निखालिश ग्रम्‍यांचल में आयोजन एवं खडी बोली के अतिरिक्‍त अवधी,कन्‍नौजी तथा भेाजपुरी की त्रिवेणी में रससिक्‍तता समारोह की विश्‍ोष उपलब्‍धि रही।काव्‍यपाठ में 8. वर्षीय सुखपाल सिंह की उपस्‍थिति थी तो वहीं तरुणाई की दहलीज पर पांव रखे 18 वर्षीय शिवकांत त्रिपाठी ने श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता डॉ. देवेन्‍द्र साह ने तथा सम्‍मान सत्र का डॉ. सन्‍त शरण त्रिपाठी सन्‍त ने एवं कवि सम्‍मेलन का अल्‍हड ने कुशल किया।

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पुस्‍तक समीक्षा

मानवीय सम्‍वेदनाओं को तलाशती तलाश

जब सामाजिक विद्रूपताऐं, सडी गली कुरितियों एवं रुढियों के प्रति आक्रोश के मध्‍य विवेकपूर्ण चिन्‍तन से हृदय उद्‌द्वेलित होता तभी काव्‍य की रसधार प्रस्‍फुटित होती है। आदि कवि बाल्‍मीकि ने जब आहत क्रौंच पक्षी की दुर्गति को निहारा तो तत्‌क्षण व्‍यथित हृदय में ही सरस काव्‍य का बास होता है। इस तथ्‍य की पुष्‍टि निम्‍नांकित पंक्‍तियों से होती हैः-

वियोगी होगा पहला कवि,

आह से उपजा होगा गान,

वही कविता होगी अंजान॥

अनंत आलोक विरचित काव्‍य संग्रह तलाश उसी सांकल की एक कडी है। सर्वप्रथम कृति शीर्षक की चर्चा करना संदर्भित होगा । तलाश अर्थात खोज, खोज आदमी में मानव की ,निष्‍छलता का पर्याय शाश्‍वत बालमन की,इहलोक में रहकर पारलौकिक आनंद के अनुभूति की जो परम सत्‍ता अवतार भगवान बुद्ध के चिन्‍तन ,उपदेशों ,निर्देशों की बीथिका से पारगमन होती हैं इसी नित्‍य सत्‍य प्रभति की प्राप्‍ति के उपक्रम में कृति का अथ से इति तक का संर्घ अनवरत जारी हैं। अतः कृति का चयनित अथ वाक्‌ तलाश सर्वथा सार्थक प्रतीत होता है।

इनकी कविताओं में मानवीय सम्‍वेदना ,संघर्ष मुखर स्‍वर, सामाजिक कुरीतियां एवं विद्रूपताओं नर करारी चोट ,अध्‍यात्‍म चिन्‍तन ,आधुनिकता पर अर्वाचीनी प्रहार के प्रत्‍यक्ष दर्शन होते हैं। कवि आलोक जीवन से जुडे छोटे किन्‍तु अहम पहलुओं पर अपनी लेखनी चलायी है। अम्‍मा का घड़े का शीतल जल फ्रिज को मात देता और त्‍यौहार पर अम्‍मा का घडा सिवईयां बटने के काम के काम आता है। कविता शीर्षक अम्‍मा में अपनत्‍व एवं ममत्‍व की अनुभूति होती है। कवि का संशय ,होश और निश्‍चेतना की भारिता को लेकर लाजिमी है। वर्तमान भारतीय परिदृश्‍य शहरी संस्‍कृति से रुबरु कराती है काव्‍यकृति । ष्‍फूलष्‍ जैसी अन्‍य रचनाओं में उत्‍तरार्ध में सकारात्‍मक पक्ष कृति की विशेषता है।

शीर्षक कविता तलाश के भाव कवि के शब्‍दों में यथा ः-

आदमी के भीतर दिखे

केवल एक ही इंसान।

बालक सा हो निष्‍छल मन

और बुद्ध सा बुद्धिमान॥

.....

यही मेरी तलाश है,

यही मेरा संग्राम

और तलाश अभी जारी है॥(पृ.-6.)

कृति के उत्‍तरार्ध में हायकू मुक्‍तक तथा दोहों का संकलन एक में अनेक प्रतिबिम्‍बित है। हालाकिं कवि का यह प्रयास का प्रथम सोपान है। आशा है अनन्‍त आलोक की लेखनी से अभी कई पुष्‍पों की सौरभ से पाठकवृंद सुरभित होंगं। भाषा सरल,सुगम तथा ग्राहृय है।लोक की बात लोक भाषा में । रस,अलंकार पर ध्‍यान रहता तो काव्‍यकृति में माधुर्य मुग्‍ध करता ।

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अंततः काव्‍यकृति संग्रहणीय एवं मननीय है। आशा की जानी चाहिए ,कवि का परिमार्जित स्‍वरुप उनकी अग्रिम कृति में परिलक्षित होगा। इसी आशा के साथ-

मानवीय सम्‍वेदना, मानवता की आस।

मग घर गोचर बाग वन,जारी सतत तलाश॥

कृतिः तलाश

मूल्‍यः1.. रुपए

प्रकाशकः आजमी प्रकाशन,पांवटा साहिब

सिरमौर(हि.प्र.)

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विषाद को भेदती -व्‍यंग्‍य की टंकार

ज्‍यों-ज्‍यों मानव ने स्‍वयं को परिष्‍कृत और विकसित किया, आधुनिकता का चोला पहना त्‍यों-त्‍यों उसकी सम्‍वेदनाऐं भोथरी होती गयीं। चिन्‍ता,विषाद,अवसाद एवं अंर्तद्वन्‍द ने कीलनी की भांति जकड लिया है। उसके पास अपने लिए समय ही नहीं बचा। आज स्‍थिति यह है कि वह परिजनों ,शानो शौकत तथा दौलत के हेत जीवन जी रहा है। उसका अपना जीवन ,उसका सुकून, हास परिहास न जाने कहाँ विलुप्‍त होता जा रहा है। ऐसे बोझिल, गमगीन संक्रमण काल के मध्‍य आंतरिक सुरक्षा से जुडे उ.प्र. पुलिस में सेवारत प्रतिसार निरीक्षक श्री सतीश चन्‍द्र शर्मा 'सुधांशुु' के व्‍यंग्‍य काव्‍य संग्रह ने फागुन की फुहार बनकर पाठकों के बीच दस्‍तक दी है। श्री सतीश 'सुधांशु' का विषय क्षेत्र सियासत,शिक्षा विभाग ,पति पत्‍नी और वो, समाज में व्‍याप्‍त विसंगतियां,यहां तक कि जल में रहे मगर से बैर वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पुलिस की कारगुजारियां भी व्‍यंग्‍य बाण से नहीं बच पायीं हैः-

यथा- दरोगा जी से पूछा -

आम आदमी की तलाश है।

क्‍या कोई आसपास है ?

वे बोले-क्‍या बकवास है ?

यहां मिलेंगे वादी प्रतिवादी

पुलिस दलाल अपराधी॥ (पृ. 3)

हालांकि बेल्‍टधारी नौकरी में सृजन के हेतु समय निकाल पाना दुष्‍कर कार्य है। मैं स्‍वयं इस पीडा का भुक्‍तभोगी हूँ लेकिन सृजन कार्य रात्रि दस बजे के उपरांत प्रारम्‍भ होकर भोर की बेला तक ही किया जा सकता है। वह भी नेपथ्‍य में। पता नहीं कब कोप की गाज लेखन पर गिर पडे । इस साहस के लिए कृतिकार साधुवाद के पात्र हैं। कृति व्‍यंग्‍य के हर रस की अनुभूति कराती है। व्‍यंग्‍य यात्रा बहुत शालीनता एवं मर्यादा में रहकर अपने लक्ष्‍य को प्राप्‍त करती है। कविताओं में लोकोक्‍ति तथा मुहाविरों का प्रयोग प्रचुर मात्रा किया गया है। इनके बिना रचना पूर्णतः को प्राप्‍त नहीं होती है।

आशा की जानी चाहिए श्री सतीश 'सुधांशु' के तरकश से भविष्‍य में भी अनेकों व्‍यंग्‍य विधा के बाणों से बच पाना मुश्‍किल होगा।

अंततः यही.........

पति पत्‍नी के बीच 'वो',नेता अरु सरकार।

पुलिस कहाँ बच पायेगी, गूंजे जब टंकार॥

पुस्‍तक ः व्‍यंग्‍य की टंकार

मूल्‍य ः 15. रुपये

प्रकाशकः विकास प्रकाशन

कल्‍पतरु, जियाखेल, शाहजहाँपुर(उ.प्र.)

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अनंत आलोक

अजर अमर अद्वैत वही,कण कण रमता राम।

जब तक रब का बास हिय,तब तक तन का दाम॥1॥

नभ क्षिति पावक जल हवा,करते तन में बास।

पंच तत्‍व का पिंजडा ,आत्‍मदेव से श्‍वांस॥2॥

न्‍यामत उसकी है अगर,गगन चूमती शान।

जिसके बिन न तृण हिले, उसे कहें भगवान॥3॥

तक्‍त कसैला कटु मधुर,जीवन के रस चार।

रहे कफन श्‍मशान तक, नर जाता हाथ पसार॥4॥

आगत का आदर करें,रखें पलक की छांव।

अतिथि देव का रुप सच,हृदय प्रेम का भाव॥5॥

लोक और परलोक सब, कर्मों के आधीन।

सांप वहीं पर झूमता,जहां गूंजती बीन॥6॥

करम प्रधान पूजा यही व्‍यर्थ बजाते गाल।

जो बोया सो काटिए,जहां आप तंह काल॥7॥

प्रथम वर्ण को जोडिए, दोहे पढिए सात।

दिव्‍य अनंत आलोक से,रोशन रहे प्रभात॥8॥

उन्‍नति सुख समृद्धि अरु, नहिं ब्‍यापै जग शोक।

यही कामना 'प्रखर' हिय, दमकें प्रिय आलोक॥9॥

 

॥ शारदे यज्ञ॥

यज्ञ शारदा का हुआ, पहुंचे बठुक सुजान।

साहित्‍य मनीषी कलाधर, गहे लेखनी बान।

गहे लेखनी बान ,थी-'इन्‍दु' की छटा निराली।

'मैत्रेय' 'आनंद' 'प्रखर' था 'अल्‍हड' की हरयाली॥

दर्दे दिल सुनाऐं 'गुलशन',विनयी नम्र सुविज्ञ।

रहे प्रवाहित सरिता धारा, और शारदे यज्ञ॥

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शांतिदाता सदन, नेकपुर चौरासी फतेहगढ (उ.प्र.) पिन2.96.1

dixit4803@rediffmail.com

 

पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीनचार, पांच, छः , सात, आठ, नौ

आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी


मेरी बेटी

मेरी बेटी,

मैं तुझसे क्या कहूँ...? किस तरह तुझे समझाऊं...? तू तो मेरी कोई भी बात मानने को तैयार ही नहीं होती है. मेरी हर बात का तो जवाब होता है तेरे पास.

तू अभी छोटी है मेरी बच्ची. तुझे कैसे बताऊँ कि मैं क्यों तेरे लिए इतनी चिन्ता करती हूँ. तुझे कैसे बताऊँ कि अब तू बड़ी हो रही है. मुझे डर लगता है. तू जिस तरह लड़कों से बिन्दास बात करती है किसी दिन कुछ हो गया तो मैं तो मर ही जाऊँगी रे...!

तुझे पता है तू जब नहीं थी तब हम बच्चे के लिए कितना तरसते थे. ऊपरवाले से बहुत मनाया तब जाके तू पैदा हुई थी. बड़े अरमानों से तुझे पाला है. ये बात अलग है कि तेरे बाद तेरा एक भाई भी हुआ लेकिन हमारे लिए तो तू ही हमारा पहला बच्चा है. हमने तुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी. फिर भी न जाने क्या कमी रह गई मेरी परवरिश में कि तू मुझसे ही इतनी चिढ़ी रहती है.

क्या करूँ रे...? मैं माँ हूँ ना...! एक औरत हूँ इसलिए डरती हूँ. तेरे लिए फ़िक्र करती हूँ ताकि तेरी जिन्दगी में कोई ऊँच-नीच न हो जाए. इसीलिए तेरे साथ तुझे ट्यूशन छोड़ने जाती हूँ और वापस लेने भी आती हूँ. मगर तुझे वो भी पसन्द नहीं है. तू कहती है तू बड़ी हो गई है लेकिन तेरी लापरवाहियाँ मुझे हैरान करती हैं.

तू घर में गाना तेज आवाज में सुनती है. जब देखो नाचती रहती है. कोई बात नहीं मानती. पढ़ने का मन तो कभी तेरा होता नहीं है. सिर्फ स्कूल और ट्यूशन से ही अगर पढ़ाई हो जाती है तो फिर तेरे नम्बर इतने कम क्यूँ आते हैं...? लोगों के सामने कहने में भी शर्म आती है. तुझे ये सब समझ में नहीं आएगा बेटी. तू तो उल्टा टीचर को दोष देने लगती है कि “मैंने तो सब सही-सही लिखा था उस टीचर का दिमाग खराब था जो उसने मुझे इतने कम नम्बर दिए.” तू ही बता क्या वो टीचर तेरी दुश्मन है...? या बाकी बच्चों की रिश्तेदार है जिनके अच्छे नम्बर आए हैं...?

मेरी बेटी...! तू कब समझेगी अपनी माँ की तकलीफ...? तेरा बाप तो तुझे कुछ कहता नहीं. मैंने सोचा चलो मैं ही तुझे सही बातें सिखाती हूँ. तेरे पापा तो दिन भर घर से बाहर रहते हैं. उन्हें तेरी हरकतों का तो पता भी नहीं है. फिर वो कहेंगे भी क्या...? तूने ही तो उन्हें बाप बनने का संजोग दिया. तू उन्हें बड़ी प्यारी जो है. लेकिन तू ये मत भूल कि मैंने तुझे अपने पेट में रखकर पाला है. मैं तेरी दुश्मन नहीं हूँ.

मैं तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ. तू पता नहीं क्या मोबाइल पे मैसेज भेजती रहती है. तुझे क्या लगता है मुझे कुछ पता नहीं है...? मुझे सब पता है. बस अपनी बेटी की गलतियों पे पर्दा डालती रहती हूँ. और मारूँ भी तो कितना...? मार खा-खा के भी तू कुछ नहीं समझती. अब तो मैंने तुझे मारना भी छोड़ दिया है. अब तो समझ ले मेरी बात...!

मैं तुझसे और कुछ नहीं चाहती. बस तू अपनी पढ़ाई ठीक से कर. ज्यादा नहीं मगर अच्छे नम्बरों से पास हो. बस इतना ही चाहती हूँ. मैं तो पढ़ न सकी. तू तो पढ़ ले. क्या तू भी मेरी ही तरह रहना चाहती है. माँ-बाप चाहे जैसे भी हों अपने बच्चों को हमेशा अच्छा ही बनाने की कोशिश करते हैं. पता नहीं क्यूँ तुझे इतनी सी बात समझ में नहीं आती...?

तू जहाँ भी जाती है कोई न कोई लड़का तेरा दोस्त बन जाता है. तू क्यूँ नहीं समझती...? मुझे डर लगता है रे...! तू इतनी छोटी है कि तुझसे खुलके कहने में भी शर्म आती है. तू खुद से समझ ले मेरी बच्ची...! मेरी परेशानी बस इतनी सी है.

तू कहती है स्कूल में सभी दोस्त बनाते हैं. तू भी बना. मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है. लेकिन तुझे तेरे दोस्तों के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं है. मुझे बस इस बात की तकलीफ है. तू सरफिरी सी होती जा रही है. कोई बात नहीं मानती. दूसरों से अपनी बात कहती है. मैं तेरी माँ हूँ मगर तू मुझसे कुछ नहीं कहती. किसी लड़की के लिए उसकी माँ उसकी पहली दोस्त होती है. बाकी सब बाद में आते हैं. मगर तू मुझे सबसे बाद में रखती है. मेरे साथ तो मुझे लगता है तेरा दम घुटता है. तुझे अन्दाजा भी है ये सोचके मुझे कैसा लगता होगा...? मेरी बेटी...! मेरी बेटी होके भी तू मेरी बेटी नहीं है. मुझसे ही दूर भागती है तू. तेज आवाज में बात करती है. जब देखो भागती रहती है. घर में रहेगी तो हमेशा सोती रहेगी. या टीवी देखेगी. मगर कोई ढंग का काम नहीं करेगी. बस मेरा खून जलाती रहती है.

तू मेरे गहनों को देखती है. तुझे पता है ये सब मैं तेरे लिए इकठ्ठा कर रही हूँ. जब तेरी शादी होगी तो ये सब तेरा हो जाएगा. हम गरीब लोग हैं. एक साथ इतना सोना नहीं खरीद सकते. इसलिए थोड़ा-थोड़ा करके तेरे लिए...अपनी बेटी के लिए जुटा रही हूँ. एक तू है कि मुझे कुछ समझती ही नहीं है.

मुझे इस बात का भी अफ़सोस नहीं है. बस तू खुद को समझ कि तू एक लड़की है और एक लड़की की कुछ हदें होती हैं. हम हिन्दुस्तान में हैं. हम गरीब लोग हैं. जिस दिन किसी ने तेरे ऊपर उँगली उठा दी. तेरी माँ तो जीते जी मर जायेगी. मगर मेरी बेटी तू ये नहीं समझेगी. जब तू माँ बनेगी तब तुझे मेरी ये सारी बातें सही लगेंगी.

तू मेरी बेटी है. तू मेरा हिस्सा है. तुझे चोट लगती है तो मुझे भी दर्द होता है. अब भी वक्त है मेरी बेटी...! संभल जा...! तू कुछ भी कर. बस मेरी दो बातों का खयाल रख. एक तो ये कि तू पढ़ाई कर. स्कूल में अच्छे नम्बर ला. और दूसरा ये कि तू कोई भी काम कर तो बस इस बात का खयाल रख कि कोई तुझपे ऊँगली न उठा पाए.

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कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

1. मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं...

के अपनी बदगुमानियों से उकता गया हूं,

मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं।


न हमराह न हमराज़ इन गलियों में लेकिन,
मैं इस शहर में अपना एक कोना चाहता हूं।


सुकूं आराम की मोहलत के कैसी ये क़ज़ा* है,
मैं अपनी मां के आंचल सा बिछौना चाहता हूं।


के यूं ख्वाहिश जगी दाग़ औ कीचड़ के फाहों की,
मैं बच्चा बनके राह गलियारों में सोना चाहता हूं।


सिसकना सब्र से ईमां का अब होता नहीं रक़ीब*,
ना बन दस्त ए गिरह रफ़ीक*, मैं खोना चाहता हूं।


मुसल्लम ए ईमां हूं क़ाफिर की सज़ा पाई है,
अब बोसा* ए संग ए असवद* भी धोना चाहता हूं.. (पंशु.)


क़ज़ा- मौत। रक़ीब - दुश्मन। रफ़ीक - दोस्त।
बोसा - चुंबन। संग ए असवद - मक्का का पवित्र पत्थर।

2. तेरी लाडो मुन्नी मेरी..


दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली*, कन्नी मेरी।


दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।


तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत* का ये घर की धन्नी मेरी।


मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।


रगों में इसकी खून मेरा तो हो दूध तेरा भी,
सर ए दुनिया रहे चमके तेरी लाडो मुन्नी मेरी।

बसुली - राजमिस्त्री का औजार। उक़ूबत - दर्द

3. सलाम ए सितमगर..

लो आ गया वो फिर से उसी शहर उन्हीं गलियों में,
नसीब उसका, रिवायत वही राह ए गुजर बनने की।

ना कर वादे, वादों पे नहीं अब और ऐतबार उसे,
मर चुकी ख्वाहिश भी हमराह ए सफर बनने की।


अपने शागिर्द की उस्तादी का भरम वो तोड़ चला,
हो के रुसवा बढ़ी चाहत यूं रूह ए इतर बनने की।


उसका एहतराम वो संगदिल भी थोड़ा सनकी भी,
हो के बेगैरत पड़ी आदत ज़िक्र ए फिक़र बनने की।


उसने परखा परखने में कोई अपना नहीं निकला,
मुए की आदत थी मुई लख़्त ए जिगर बनने की।


© पंकज शुक्ल। 2011।

परिचय: 

संप्रति: रीजनल एडीटर, नई दुनिया/संडे नई दुनिया, मुंबई

जन्मं- 30 दिसंबर 1966। मंझेरिया कलां (उन्नाव, उत्तर प्रदेश) में।

परिचय- शुरुआती पढ़ाई जोधपुर और फिर गांव के प्राइमरी स्कूल में। कॉलेज की पढ़ाई कानपुर में। सिनेमा की संगत बचपन से। सरकारी नौकरी छोड़ पत्रकारिता सीखी, अमर उजाला में तकरीबन एक दशक तक रिपोर्टिंग और संपादन। फिर ज़ी न्यूज़ में स्पेशल प्रोग्रामिंग इंचार्ज। प्राइम टाइम स्पेशल, बॉलीवुड बाज़ीगर, मियां बीवी और टीवी, बोले तो बॉलीवुड, भूत बंगला, होनी अनहोनी, बचके रहना, मुकद्दर का सिकंदर, तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, बेगम की महफिल, वोट फॉर खदेरन और वोट फॉर चौधरी जैसी टीआरपी विनिंग सीरीज़ का निर्माता-निर्देशक रहने के दौरान चंद बेहतरीन साथियों से मिलना हुआ। एमएच वन न्यूज़ और ई 24 की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा। ज़ी 24 घंटे छत्तीसगढ़ का भी कुछ वक्त तक संचालन। बतौर लेखक-निर्देशक पहली फीचर फिल्म "भोले शंकर" रिलीज़। फिल्म ने शानदार सौ दिन पूरे किए। अमिताभ बच्चन, लता मंगेशकर और बेगम अख्तर पर वृत्तचित्रों का निर्माण व लेखन-निर्देशन। बतौर पटकथा लेखक-निर्देशक 4 शॉर्ट फिल्में - अजीजन मस्तानी, दंश, लक्ष्मी और बहुरूपिया। चारों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और प्रशंसित। कई फिल्म फेस्टिवल्स में शामिल। विज्ञापन फिल्मों और कॉरपोरेट फिल्मों के लेखन और निर्देशन में भी सक्रिय।

संपर्क: pankajshuklaa@gmail.com

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रविकान्त, एसोसिएट फ़ेलो, सीएसडीएस

बहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका माधुरी हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लंबा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में सुचित्रा नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवर-कलेवर, रूप-रंग, साज-सज्जा, मियाद व सामग्री बदली तो लेखक-पाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था।[1] इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरी-पूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकली माधुरी तक महदूद रहकर चंद मोटी-मोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है।

माधुरी से तीसेक साल पहले से ही हिन्दी में कई फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकल कर बंद हो चुकी थीं, कुछ की आधी-अधूरी फ़ाइलें अब भी पुस्तकालयों में मिल जाती हैं, जैसे, रंगभूमि, चित्रपट, मनोरंजन आदि। ये जानना भी दिलचस्प है कि हिन्दी की साहित्यिक मुख्यधारा की पत्रिकाओं - मसलन, सुधा, सरस्वती, चाँद, माधुरी - में भी जब-तब सिनेमा पर गंभीर बहस-मुबाहिसे, या, चूँकि चीज़ नई थी, बोलती फ़िल्मों के आने के बाद व्यापक स्तर पर लोकप्रिय हुआ ही चाहती थी, तो सिनेकला के विभिन्न आयामों से ता'रुफ़ कराने वाले लेख भी छपा करते थे। फ़िल्म माध्यम की अपनी नैतिकता से लेकर इसमें महिलाओं और साहित्यकारों के काम करने के औचित्य, उसकी ज़रूरत, भाषा व विषय-वस्तु, नाटक/पारसी रंगकर्म/साहित्य से इसके संबंध से लेकर विश्व-सिनेमा से भारतीय सिनेमा की तुलना, सेंसरशिप, पौराणिकता, श्लीलता-अश्लीलता, सार्थकता/अनर्थकता/सोद्देश्यता आदि नानाविध विषयों पर जानकार लेखकों ने क़लम चलाई।[2] इनमें से कुछ शुद्ध साहित्यकार थे, पर ज़्यादातर फ़िल्मी दुनिया से किसी न किसी रूप से जुड़े लेखक ही थे। इन लेखों से हमें पता चलता है कि पहले भले हिंदू घरों की औरतों का फ़िल्मी नायिका बनना ठीक नहीं समझा जाता था, वैसे ही जैसे कि उनका नाटक करना या रेडियो पर गाना अपवादस्वरूप ही हो पाता था। पौराणिक-ऐतिहासिक भूमिकाएँ करने वाली मिस सुलोचना, मिस माधुरी आदि वस्तुत: ईसाई महिलाएँ थीं, जिन्होंने बड़े दर्शकवर्ग से तादात्म्य बिठाने के लिए अपने नाम बदल लिए थे। पारसी थिएटर का सूरज डूबने लगा था, ऐसी स्थिति में रेडियो या सिनेमा के लिए गानेवालियाँ 'बाई' या 'जान' के प्रत्यय लगाने वाली ही हुआ करती थीं। पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों पर भी आपको वही नाम ज़्यादातर मिलेंगे। अगर आपने अमृतलाल नागर की बेहतरीन शोधपुस्तक ये कोठेवालियाँ[3] पढ़ी है, तो आपको अंदाज़ा होगा कि मैं क्या अर्ज़ करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी लेखकों ने ज़्यादा अनुभवी नारायण प्रसाद 'बेताब' या राधेश्याम कथावाचक या फिर बलभद्र नारायण 'पढ़ीस' की इल्तिजा पर ग़ौर न करते हुए[4] प्रेमचंद जैसे लेखकों के मुख़्तसर तजुर्बे पर ज़्यादा ध्यान दिया, जो कि हक़ीक़तन कड़वा था। उन्होंने आम तौर पर फ़िल्मी दुनिया को भ्रष्ट पूंजीपतियों की अनैतिक अय्याशी का अड्डा माना, माध्यम को संस्कार बिगाड़ने वाला 'कुवासना गृह' समझा, उसे छापे की दुनिया में होने वाले घाटे की भरपाई करके वापस वहीं लौट आने के लिए थोड़े समय के लिए जाने वाली जगह समझा। पर पूरी तरह चैन भी नहीं कि उर्दू वालों ने एक पूरा इलाक़ा क़ब्ज़िया रखा है। हिन्दी और उर्दू के साहित्यिक जनपद के बुनियादी फ़िल्मी रवैये में अगर फ़र्क़ देखना चाहते हैं तो मंटो को पढ़ें, फिर उपेन्द्रनाथ अश्क और भगवतीचरण वर्मा के सिनेमाई संस्मरण, रेखाचित्र या उपन्यास पढ़ें।[5] भाषा के सवाल पर गांधी जी से भी दो-दो हाथ कर लेने वाले हिन्दी के पैरोकार, अपवादों को छोड़ दें तो, अपने सिनेमा-प्रेम के मामले में काफ़ी समय तक गांधीवादी ही रहे।

बेशक स्थिति धीरे-धीरे बदल रही थी, पर 1964 में जब माधुरी निकली तब तक इसके संस्थापक संपादक के अपने अल्फ़ाज़ में "सिनेमा देखना हमारे यहाँ क़ुफ़्र समझा जाता था।" उन्होंने इस क़ुफ़्र सांस्कृतिक कर्म को हिन्दी जनपद में पारिवारिक-समाजिक स्वीकृति दिलाने में अहम ऐतिहासिक भूमिका अदा की। माधुरी ने कई बड़े-छोटे पुल बनाए, जिसने सिनेमा जगत और जनता को तो आपस में जोड़ा ही, सिनेमा को साहित्य और राजनीतिक गलियारों से, विश्व-सिनेमा को भारतीय सिनेमा से, हिन्दी सिनेमा को अहिन्दी सिनेमा से, और सिनेमा जगत के अंदर के विभिन्न अवयवों को भी आपस में जोड़ा। पत्रिका की टीम छोटी-सी थी, और इतनी बड़ी तादाद में बन रही फ़िल्मों की समीक्षा, उनके बनने की कहानियों, फ़िल्म समाचारों, गीत-संगीत की स्थिति, इन सबको अपनी ज़द में समेट लेना सिर्फ़ माधुरी की अपनी टीम के ज़रिए संभव नहीं था। अपनी लगातार बढ़ती पाठक संख्या का रुझान भाँपते हुए, उसके सुझावों से बराबर इशारे लेते हुए माधुरी ने उनसे सक्रिय योगदान की अपेक्षा की और उसके पाठकों ने उसे निराश नहीं किया। प्रकाशन के तीसरे साल में प्रवेश करने पर छपा यह संपादकीय इस संवाद के बारे में बहुत कुछ कहता है:

हिन्दी में सिनेपत्रकारिता सभ्य, संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों द्वारा उपेक्षित रही है। सिनेमा को ही अभी तक हमारे परिवारों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। फ़िल्में देखना बड़े-बूढ़े उच्छृंखलता की निशानी मानते हैं। कुछ फ़िल्मकारों ने अपनी फ़िल्मों के सस्तेपन से इस धारणा की पुष्टि की है। ऐसी हालत में फ़िल्म पत्रिका का परिवारों में स्वागत होना कठिन ही था।

सिनेमा आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक मनोरंजन बन गया है। अत: इससे दूर भागकर समाज का कोई भला नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसमें गहरी रुचि लेकर इसे सुधारें, अपने विकासशील राष्ट्र के लायक़ बनाएँ। नवयुवक वर्ग में सिनेमा की एक नयी समझ उन्हें स्वस्थ मनोरंजन का स्वागत करने की स्थिति में ला सकती है। इसके लिए जिम्मेदार फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता स्पष्ट है। मैं कोशिश कर रही हूँ फ़िल्मों के बारे में सही तरह की जानकारी देकर मैं यह काम कर सकूँ। परिवारों में मेरा जो स्वागत हुआ है उसको देख कर मैं आश्वस्त हूँ कि मैं सही रास्ते पर हूँ। आत्मनिवेदन: (11 फ़रवरी, 1966).

इस आत्मनिवेदन को हम पारंपरिक उच्च-भ्रू संदर्भ की आलोचना के साथ-साथ पत्रिका के घोषणा-पत्र और इसकी अपनी आकांक्षाओं के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ सकते हैं। पत्रिका गुज़रे ज़माने के पूर्वग्रहों से जूझती हुई नयी पीढ़ी से मुख़ातिब है, सिनेमा जैसा है, उसे वैसा ही क़ुबूल करने के पक्ष में नहीं, उसे 'विकासशील राष्ट्र के लायक़' बनाने में अपनी सचेत जिम्मेदारी मानते हुए पारिवारिक तौर पर लोकप्रिय होना चाहती है। कहना होगा कि पत्रिका ने घोर आत्मसंयम का परिचय देते हुए पारिवारिकता का धर्म बख़ूबी निभाया, लेकिन साथ ही 'करणीय-अकरणीय' की पारिभाषिक हदों को भी आहिस्ता-आहिस्ता सरकाने की चतुर कोशिशें भी करती रही। भले ही इस मामले में यह अपने भगिनी प्रकाशन 'फ़िल्मफ़ेयर'-जैसी 'उच्छृंखल' कम से कम समीक्षा-काल में तो नहीं ही बन पाई। बक़ौल अरविंद कुमार, जब पत्रिका की तैयारी चल रही थी, तो सुचित्रा की पहली प्रतियाँ सिनेजगत के कई बुज़ुर्गों को दिखाई गईं। उनमें से वी शांताराम की टिप्पणी थी कि इस पर फ़िल्मफ़ेयर का बहुत असर है। यह बात अरविंद जी को लग गई गई, और उन्हें ढाढ़स भी मिला। लिहाज़ा, माधुरी ने अपना अलग हिन्दीमय रास्ता अख़्तियार किया, और मालिकों ने भी इसे पर्याप्त आज़ादी दी। अनेक मनभावन सफ़ेद स्याह, और कुछ रंगीन चित्रों और लोकार्षक स्तंभों से सज्जित माधुरी जल्द ही संख्या में विस्तार पाते बड़े-छोटे शहरों के हिन्दी-भाषी मध्यवर्ग की अनिवार्य पत्रिका बन गई, जिसमें इसके शाफ़-शफ़्फ़ाफ़ और मेहनतपसंद संपादन - मसलन, प्रूफ़ की बहुत कम ग़लतियाँ होना - का भी हाथ रहा ही होगा। यहाँ 'मध्यवर्ग की पत्रिका' का लेबल चस्पाँ करते हुए हमें उन चाय और नाई की दुकानों को नहीं भूलना चाहिए, जहाँ पत्रिका को व्यापकतर जन समुदाय द्वारा पढ़ा-देखा-पलटा-सुना जाता होगा। अभाव से प्रेरित ही सही, लेकिन हमारे यहाँ ग्रामोफोन से लेकर सिनेमा-रेडियो-टीवी, पब्लिक फोन, और इंटरनेट(सायबर कैफ़े, ई-चौपाल) तक के आम अड्डों में सामूहिक श्रवण-वाचन-दर्शन-विचरण का तगड़ा रिवाज रहा है। संगीत रसास्वादन वॉकमैन और मोबाइल युग में आकर ही निजी होने लगा है। तो इस वृहत्तर पाठक-वर्ग तक फ़िल्म जैसे माध्यम को संप्रेषित करने के लिए माक़ूल शब्दावली जुटाने में मौजूदा शब्दों में नये अर्थ भरने से लेकर नये शब्दों की ईजाद तक की चुनौती संपादकों और लेखकों ने उठाई लेकिन अपरिचित को जाने-पहचाने शब्दों और साहित्यिक चाशनी में लपेट कर कुछ यूँ परोसा कि पाठकों ने कभी भाषायी बदहज़मी की शिकायत नहीं की। शब्दों से खेलने की इस शग़ल को गंभीरता से लेते हुए अरविंद जी ने अगर आगे चलकर शब्दकोश-निर्माण में अपना जीवन झोंक दिया तो किमाश्चर्यम, कि यह काम भी क्या ख़ूब किया![6]

सिने-जनमत सर्वेक्षण

बहरहाल, पूछने लायक़ बात है कि माधुरी के लिए सिनेमा के मायने क्या थे। ऊपर के इशारे में ही जवाब था - विशद-विस्तृत। पत्रिका ने न केवल दुनिया-भर में बन रहे महत्वपूर्ण चित्रों या चित्रनिर्माण की कलात्मक-व्यावसायिक प्रवृत्तियों पर अपनी नज़र रखी, बल्कि कैसे बनते थे/बन रहे हैं, इनका भी गाहे-बगाहे आकलन पेश किया, ताकि फ़िल्मी दुनिया में आने की ख़्वाहिश रखने वाले - लेखक, निर्देशक, अभिनेता, गायक - ज़रूरी हथियारों से लैस आएँ, या जो नहीं भी आएँ, वे जादुई रुपहले पर्दे के पीछे के रहस्य को थोड़ा बेहतर समझ पाएँ। इस लिहाज से ये ग़ौरतलब है कि माधुरी ने अपने पन्नों में सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेताओं को जगह नहीं दी, बल्कि तकनीकी कलाकारों - छायाकारों, ध्वनि-मुद्रकों और 'एक्स्ट्राज़' को भी, ठीक वैसे ही जैसे कि महमूद जैसे 'हास्य'-अभिनेताओं को आवरण पर डालकर, या फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, पुणे से उत्तीर्ण नावागंतुकों की उपलब्धियों को समारोहपूर्वक छापकर अपनी जनवादप्रियता का पता दिया। उनकी कार्य-पद्धति समझाकर, उनकी मुश्किलों, मिहनत को रेखांकित करते हुए उनकी मानवीयता की स्थापना कर सिनेमा उद्योग के इर्द-गिर्द जो नैतिक ग्रहण ज़माने से लगा हुआ था, उसको काटने में मदद की।

इस सिलससिले में घुमंतू परिचर्चाओं की दो शृंखलाएँ मार्के की हैं: पहली, जब माधुरी ने मुंबई महानगरी से निकलकर अपना रुख़ राज्यों की राजधानियों और उनसे भी छोटे शहरों की ओर किया ये टटोलने के लिए कि वहाँ के बाशिंदे बन रही फ़िल्मों से कितने मुतमइन हैं, उन्हें उनमें और क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए, आदि-आदि। जवाब में मध्यवर्गीय समाज के वाक्पटु नुमाइंदों ने अक्सरहाँ फ़िल्मों की यथास्थिति से असंतोष जताया, अश्लीलता और फ़ॉर्मूलेबाज़ी की भर्त्सना की, सिनेमा के साहित्योन्मुख होने की वकालत की। इन सर्वेक्षणों के आयोजन में ज़ाहिर है कि माधुरी का अपना सुधारवादी एजेंडा था, लेकिन इनसे हमें उस समय के फ़िल्म-प्रेमियों की अपेक्षाओं का भी पता मिलता है। हमारे पास उनकी आलोचनाओं को सिरे से ख़ारिज करने के लिए फ़िलहाल ज़रूरी सुबूत नहीं हैं, लेकिन ये सोचने का मन करता है कि इन पिटी-पिटाई, और एक हद तक अतिरेकी प्रतिक्रियाओं में उस ढोंगी, उपदेशात्मक सार्वजनिक मुखौटे की भी झलक मिलती है, जो अक्सरहाँ जनता के सामने आते ही लोग ओढ़ लिया करते हैं, भले ही सिनेमा द्वारा परोसे गए मनोरंजन का उन्होंने भरपूर रस लिया हो। मामला जो भी हो, माधुरी ने अपने पाठकों को भी यदा-कदा टोकना ज़रूरी समझा : मसलन, फ़िल्मों में अश्लीलता को लेकर हरीश तिवारी ने जनमत से बाक़ायदा जिरह की और उसे उचित ठहराया।[7] उस अंक में तो नहीं, लेकिन गोया एक सामान्य संतुलन बनाते हुए लतीफ़ घोंघी ने हिन्दी सिनेमा के तथाकथित फ़ोहश दृश्यों की एक पूरी परंपरा को दृष्टांत दे-देकर बताना ज़रूरी समझा। लेकिन फिल्मेश्वर ने चुंबनांकन को लेकर जो मख़ौलिया खिलवाड़ किस न करने वाली भारतीय संस्कृति के साथ किया, वह तो अद्भुत था।[8] थोड़े मुख़्तलिफ़ तरह का एक दूसरा सर्वेक्षण भौगोलिक था। याद कीजिए कि उस ज़माने में कश्मीर फ़िल्मकारों का स्वर्ग जैसा बन गया था। एक के बाद एक कई फ़िल्में बनी थीं, जिनका लोकेशन वही था, और पूरा कथानक नहीं तो कम-से-कम एक-दो गाने तो वहाँ शूट कर ही लिए जाते थे।[9] जान पड़ता है कि लोगों को कश्मीर के प्रति निर्माताओं की यह आसक्ति थोड़ी-थोड़ी ऊब देने लगी थी। माधुरी ने एक पूरी शृंखला ही समूचे हिन्दुस्तान की उन अनजान आकर्षक जगहों पर कर डाली जहाँ फ़िल्मों को शूट किया जा सकता है, बाक़ायदा सचित्र और स्थानीय इतिहास और सुविधाओं की जानकारियों मुहैया कराते हुए। इस तरह 'भावनात्मक एकता' का जो नारा मुल्क के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने उस ज़माने में बुलंद किया था, उसकी किंचित वृहत्तर परिभाषा कर कश्मीरेतर दूर-दराज़ की जगहों को फ़िल्मों के भौतिक साँचे में ढालने की ठोस वकालत माधुरी ने बेशक की।

सिने-माहौल और नागर चेतना

चलिए, आगे बढ़ें। सिनेमाघरों की दशा पर केन्द्रित माधुरी का तीसरा सर्वेक्षण अपेक्षाकृत ज़्यादा दिलचस्प था। इसकी प्रेरणा पाठकों से मिले शिकायती ख़तों से ही आई मालूम पड़ती है: जब पत्रों में अपने शहर के सिनेमा हॉल के हालात को लेकर करुण-क्रंदन थमा नहीं तो माधुरी ने उसे एक वृहत्तर अनुष्ठान और मुहिम का रूप दे दिया। इस मुहिम की अहमियत समझने के लिए आजकल की मल्टीप्लेक्स-सुविधा-भोगी हमारी पीढ़ी[10] को मनसा उस ज़माने में और उन छोटे शहरों में लौटना होगा, जब सिनेमा देखने को ही समाज में सम्मानजनक नहीं माना जाता था तो देखनेवालों को सिने-मालिक लुच्चा-लफ़ंगा मान लें तो उनका क्या क़ुसूर। जैसे दारू के ठेकों पर सिर-फुटव्वल आम बात थी, या है, वैसे ही पहले दिन/पहले शो में हॉल के बाहर टिकट खिड़की पर लाठियाँ चल जाना भी कोई अजीब बात नहीं होती थी। आप ख़ुद देखिए, लोगों ने फ़िल्म देखने के लिए कितने त्याग किए हैं, पूंजीवादी समाज की कैसी बेरुख़ी झेली है, एक-दूसरे को कितना प्रताड़ित किया है। माधुरी का शुक्रिया कि इसने सिनेमा हॉल को साफ़-सभ्य-सुसंस्कृत-पारिवारिक जगह बनाने की दिशा में पहल तो की।[11] नीचे पेश है एक बानगी उज्जैन, झाँसी, कानपुर, जमशेदपुर जैसे शहरों से दर्ज शिकायतनामों की। चक्रधर पुर, बिहार, से किसी ने लिखा कि हॉल में पीक के धब्बों और मूँगफली के छिलकों की सजावट आम बात है। सीटों पर नंबर नहीं और, लोग तो जैसे 'धूम्रपान निषेध' की चेतावनी देखते ही नहीं। फ़िल्म प्रभाग के वृत्तचित्र हमेशा अंग्रेज़ी में ही होते हैं, और जनता राष्ट्रगान के समय भी चहलक़दमी करती रहती है।( 8 सितंबर,1967). इसी अंक में होशंगाबाद से ख़बर है कि किसी ने गोदाम को सिनेमा हॉल बना दिया है, पीने को पानी नहीं है, हाँ, खाने की चीज़ ख़रीदने पर ज़रूर 'मुफ़्त' मिल जाता है। फ़रियादी की दरख़्वास्त है कि महीने में कम-से-कम एक बार तो कीटनाशक छिड़का जाए, मूतरियों को साफ़ रखा जाए, और टिकट ख़रीदने के बाद के इंतज़ार को आरामदेह बनाया जाए। झाँसी से एक जनाब फ़रमाते हैं कि वहाँ दो-ढाई लाख की आबादी में कहने को तो सात सिनेमाघर हैं, लेकिन एक को छोड़कर सब ख़स्ताहाल। फटी सीटें, पीला पर्दा, गोया किसी फोटॉग्रफर का स्टूडियो हो; लोग बहुत शोर मचाते हैं, जैसे ही बिजली जाती है या रील टूटती है, 'कौन है बे' की आवाज़ के साथ सीटियों का सरगम शुरू हो जाता है; गेटकीपर ख़ुद ब्लैक करता है और मना करने पर रौब झाड़ता है; पार्किंग में भी टिकट मिलता है, लेकिन साइकिल वहीं लगाने पर; अंग्रेज़ी-हिन्दी दोनों ही फ़िल्में काफ़ी देर से लगाई जाती हैं। 'महारानी लक्ष्मीबाई ने नगर' के इस शिकायती ने क्रांतिकारी धमकी के साथ अपनी बात ख़त्म की : अगर संबंधित अधिकारी कुछ नहीं करते तो झाँसी की जनता को फ़िल्म देखना छोड़ देना पड़ेगा। वाह! इसी तरह तीन सिनेमाघरों वाले बीकानेर से एक जागरूक सज्जन ने लिखा: एक हॉल तो कॉलेज से बिल्कुल सटा हुआ है, टिकटार्थियों की क़तार सड़क तक फैल जाती है, ब्लैक वालों के शोर-ओ-गुल से कक्षाएँ बाधित होती हैं; फ़र्स्ट क्लास की सीटें भी जैसे कष्ट देने के लिए ही बनाई गई हैं, एयरकंडीशनिंग ऐसी कि उससे बेहतर धूप में रहें, कभी सफ़ाई नहीं होती, कचरे के ढेर लगे होते हैं; तीसरे सिनेमा हॉल में तो बालकनी की हालत फ़र्स्ट क्लास से भी बदतर है। फ़र्स्ट क्लास का दर्शक जब 'सिनेमा देखने में मग्न हो तब अचानक ऐसा लगता है कि किसी सर्प ने काट खाया हो या इंजेक्शन लगा दिया गया हो। बरबस दर्शक उछल पड़ता है। पीछे देखता है तो मूषकदेव कुर्सियों पर विराजमान हैं। हॉल में कई चूहों के बिल देखने को मिल सकते हैं। सरदार शहर के एक सिनेमची ने शिकायत की कि वहाँ हॉल के अति सँकरे दरवाज़े से घुसने के बाद दर्शक और बदरंग पर्दे के बीच में दो-एक खंभे खड़े होकर फ़िल्म देखते हैं, ध्वनि-यंत्र ख़राब है, उससे ज़्यादा शोर तो छत से लटके पंखे कर देते हैं; बारिश में छत चूती है, कुर्सियों के कहीं हाथ तो कहीं पैर नहीं, कहीं पीठ ही ग़ायब है; आदमी ज़्यादातर ख़ुद को सँभालता रहता है: कोई नया हॉल बनाना भी चाहे तो लाइसेन्स नहीं मिलता। दरभंगा से रपट आई कि चार में से तीन सिनेमाहॉल तो 'उच्च वर्गों' के लिए हैं ही नहीं; नैशनल टॉकीज़ पूरा कबूतरख़ाना है; लोग हॉल में आकर अपनी सीट से ही टिकट ख़रीदते हैं, सीट संख्या नहीं होने पर काफ़ी कोहराम मचा होता है; मेरा साया शुरू हुआ तो पंखे की छड़ ऐन पर्दे पर नमूदार हो गई, और जिस तरह की फ़िल्म थी, हमें लगा ज़रूर कुछ रहस्य है इस साये में! लेकिन बात हँसने वाली नहीं। कौन इनका हल करेगा - सरकार या व्यवस्थापक? कोई नहीं, क्योंकि उनकी झोलियाँ तो भर ही रही हैं। सिनेमा का बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता बचता है। एप्रील फ़ूल देखकर आए गुरदासपुर के एक सचेत नागरिक ने हॉल वालों को तो आड़े हाथों लिया ही कि वहाँ निर्माण कार्य कभी बंद ही नहीं होता और पुराने प्रॉजेक्टर का शोर असह्य है, साथ ही दर्शकों के व्यवहार से भी घोर असंतोष ज़ाहिर किया: 'कामुक दृश्यों पर भद्दी आवाज़ों का शोर तमाम नैतिक मापदंडों की हत्या करके भी शांत नहीं होता। शायद यही कारण है कि कोई भी भलामानुस माँ-बहनों के साथ फ़िल्म देखने का साहस नहीं जुटा पाता...राष्ट्रगान के समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाता है, लोग बाहर निकल जाते हैं, जो अंदर भी रहते हैं, वे या तो बदन खुजाते या जम्हाइयाँ लेते दिखाई देते हैं।...अच्छी और सफल फ़िल्में जो पंजाब के बड़े शहरों में वर्ष के आरंभ में प्रदर्शित होती हैं, यहाँ अंत तक पहुँचती हैं, नतीजा ये होता है कि गणतंत्र दिवस की न्यूज़ रीलें हम स्वतंत्रता दिवस पर देखते हैं: हमें अभी तक अनुपमा और आए दिन बहार के का इंतज़ार है!

आरा से आकर एक सज्जन बड़े नाराज़ थे:

छुट्टियाँ बिताने आरा गया हुआ था। यहाँ के सिनेमा-हॉल और व्यवस्थापकों की लापरवाही देखकर दुख हुआ। सिनेमा हॉल के बाहर कुछ लोग लाइन में खड़े रहते हैं जबकि टिकट पास के पान की दुकान पर मिल जाता है। नोस्मोकिंग आते ही लोग बीड़ी जला लेते हैं। अगर कोई रोमाण्टिक सीन आ जाए तो उन्हें चिल्लाकर ही संतोष होता है, जिन्होंने अभी सीटी बजाना नहीं सीखा है। सिनेमा शुरू होने का कोई निश्चित समय नहीं है। अगर किसी अधिकारी की फ़ेमिली आने वाली है तो सिनेमा उनके आने के बाद ही शुरू होगा। हॉल में घुसते ही कुछ नवयुवक इतनी हड़बड़ी में आते हैं कि जल्दबाज़ी में फ़ेमिली स्वीट्स में घुस जाते हैं। (29 दिसंबर 1967).

डेविड धवन की हालिया फ़िल्म राजा बाबू की बरबस याद आ जाती है, जिसमें तामझाम से सजे लाल बुलेट पर घूमने वाला गोविंदा का किरदार सिनेमा हॉल में जाकर अपने मनपसंद दृश्य को 'रिवाइन्ड' करवाके बार-बार देखता है। साठ के दशक में छोटे शहरों के असली बाबू भी राजा बाबू से कोई कम थे! लेकिन ये शिकायती स्वर इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि सिनेदर्शक अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत हो रहा था, और सिने-प्रदर्शन में हो रही अँधेरगर्दी की पोल खोलने पर आमादा था। लेकिन इस तरह की परेशानियाँ सिर्फ़ छोटे शहरों तक सीमित नहीं थीं। एक आख़िरी उद्धरण देखिए, राजकुमार साहब के हवाले से:

दिल्ली के कुछ सिनेमा हॉल जो कि पुरानी दिल्ली में हैं बहुत ख़राब दशा में हैं। महिलाओं को केवल एक सुविधा प्राप्त है, और वो है टिकट मिल जाना। और इसके अलावा कोई सुविधा नहीं। अन्दर जाकर सीट पर बैठे तो क्या देखेंगे कि पीछे के दर्शक महोदय बड़े आराम से सीट पर पैर रख कर बैठे हुए हैं। ऐसा करना वे अपना अधिकार समझते हैं। आसपास के लोग बड़े प्रेम से घर की या बाहर की बातें करते नज़र आएँगे जबकि फ़िल्म चल रही होगी। मना किया जाय तो वे लड़ने लगेंगे और आप (जो कि माँ या बहन के साथ बैठे होंगे) लोगों की नज़रों के केन्द्र बन जाएँगे। यदि कोई प्रेम या उत्तेजक सीन होगा तो देखिए कितनी आवाज़ें कसी जाती हैं, गालियाँ दी जाती हैं, और सीटियाँ तो फ़िल्म के संगीत का पहलू नज़र आती हैं। यदि पास बैठी महिला के साथ छेड़छाड़ करने का अवसर मिल जाए तो वे हाथ से जाने नहीं देते। ये सब बातें सिर्फ़ इसलिए होती हैं कि सिनेमा हॉल में आगे बैठे लोग सिर्फ़ दो-तरफ़ा मनोरंजन चाहते हैं। इस तरह सिनेमा देखना तो कोई सहनशील व्यक्ति भी गवारा नहीं करेगा। (29 दिसंबर 1967, पत्र).

क़िस्सा कोताह ये कि दर्शकों की इन दूर-दराज़ की - सिनेव्यापार की भाषा में 'बी' 'सी' श्रेणी के शहरों-क़स्बों से आती - आवाज़ों को राष्ट्रीय गलियारों तक पहुँचाने का काम करते हुए माधुरी ने निहायत कार्यकर्तानुमा मुस्तैदी और प्रतिबद्धता दिखाई। इसका कितना असर हुआ या नहीं, कह नहीं सकते, लेकिन सिनेमा देखने वाले लोग भी नागरिक समाज की बुनियादी सहूलियतों और दैनंदिन सदाचरण के हक़दार हैं, अंक-दर-अंक यह चीख़ने के पीछे कम-से-कम माधुरी का तो वही भरोसा रहा, जो फ़ैज़ का था: 'कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएँगे'।[12] और नहीं तो कम-से-कम शेष पाठकों तक तो नाले गए ही होंगे क्योंकि चंद संजीदा क़िस्म की शिकायतें तो आम जनता, ख़ासकर पुरुषों, को ही संबोधित हैं! एक और दिलचस्प बात आपने नोट की होगी इन ख़तों में कि हिन्दी-भाषी पुरुष उस ज़माने में सिर्फ़ 'माँ-बहनों' के साथ फ़िल्म देखने जाता था!

मधुर संगीतप्रियता

अच्छा साहब, बहुत हो लीं रोने-धोने की बातें। आइए अब कुछ गाने की भी की जाएँ। माधुरी ने यह बहुत जल्द पहचान लिया था कि रेडियो और ग्रामोफोन के ज़रिए लोग सिनेमा को सिर्फ़ देखते नहीं हैं, उसे सुनते भी हैं, वैसे लोग भी जो नहीं देखते, गुनगुनाते ज़रूर हैं, और इसके लिए वे बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दिनों से ही सस्ते काग़ज़ पर छपे चौपतिया मार्का 'कथा-सार व गीत' या बाद में नारायण ऐण्ड को., सालिमपुर अहरा, पटना जैसे प्रकाशकों द्वारा मुद्रित 'सचित्र-गीत-डायलॉग' के बेहद शौक़ीन थे, बल्कि उन पर मुनहसर थे। क्योंकि इससे बार-बार सिनेमा जाकर या रेडियो पर सुन-सुनकर कॉपी पे उतारने की उनकी अपनी मेहनत बचती थी। सिनेमा के गीतों ने एक अरसे से रोज़ाना की अंत्याक्षरी से लेकर औपचारिक, शास्त्रीय हर तरह की महफ़िलों में अपना रंग जमा रखा था, तो जो लोग राग-आधारित गाने गाना चाहते थे, उनके लिए गीत के बोल के साथ-साथ स्वराक्षरी देने का काम संपादक ने संगीत-मर्मज्ञ श्रीधर केंकड़े से काफ़ी लंबे अरसे तक करवाया। उन पृष्ठों पर संगीतकार-गीतकार-गायक-गायिका का नाम बड़े सम्मान से छापा जाता था। लेकिन जल्द ही 'रिकार्ड तोड़ फ़ीचर' और पैरोडियाँ भी स्तंभवत छपने लगीं, जो जनता के हाथों पुराने-नए मशहूर गानों के अल्फ़ाज़ की रीमिक्सिंग (= पुनर्मिश्रण, पुनर्रचना) के लोकाचार का ही एक तरह से साहित्यिक विस्तार था। इसलिए स्वाभाविक ही था कि हुल्लड़ मुरादाबादी और काका हाथरसी जैसे मशहूर कवियों के अलावा बेनाम तुक्कड़ों ने अच्छी तुकबंदियाँ पेश कीं। इस तरह की हास्य-व्यंग्य से लबरेज़ नक़्क़ाली के विषय अक्सर सामाजिक होते थे, कई बार फ़िल्मी, पर बाज़ मर्तबा राजनीतिक भी, जैसे कि सदाबहार मौज़ू 'महँगाई' को लेकर सीधे-सीधे भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री से पूछा गया सवाल, जो कि बतर्ज़ 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं' गुनगुनाये जाने पर सामान्य से किंचित अतिरिक्त फैलती मुस्कान की वजह बनता होगा:

इतना महँगा गेहूँ, औ इतना महँगा चावल

बोल इन्द्रा बोल सस्ता होगा कि नहीं

कितने घंटे बीत गए हैं मुझको राशन लाने में

साहब से फटकार पड़ेगी देर से दफ़्तर आने मे

इन झगड़ों का अन्त कहीं पर होगा कि नहीं॥ बोल इन्द्रा बोल...

दो पाटों के बीच अगर गेहूँ आटा बन जाता है

क्यों न जहाँ पर इतने कर हों, दम सबका घुट जाता है

कभी करों का यह बोझा कम होगा कि नहीं।। बोल इन्द्रा बोल...

हम जीने को तड़प रहे ज्यों बकरा बूचड़ख़ाने में

एक नया कर और लगा दो साँस के आने-जाने में

आधी जनता मरे चैन तब होगा कि नहीं? बोल इन्द्रा बोल...(22 सितंबर 1967).

अब आप ही बताइए साहब कि ये नक़ल, असल से कविताई में कहीं से उन्नीस है? इसी तरह काका ने एक पैरोडी बनाई थी संत ज्ञानेश्वर के मशहूर गीत 'ज्योति से ज्योति जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो' पर, 'नोट से नोट कमाते चलो, काले धन को पचाते चलो, जिसका थीम इतना शाश्वत है कि कभी पुराना नहीं होगा। पता नहीं हम ऐसे ख़ज़ाने का जमकर इस्तेमाल क्यों नहीं करते। पुनर्चक्रण पर्यावरण-प्रिय युग की माँग है। माधुरी ने तो अपनी पुनर्चक्रण-प्रियता का सबूत इस हद तक दिया कि एक पूरा फ़िल्मी पुराण और एक संपूर्ण फ़िल्मी चालीसा ही छाप दिया, जिसमें फ़िल्मी इतिहास के बहुत सारे अहम नाम सिमट आए हैं। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप ख़ुद पाठ करें, तर्ज़ वही है गोस्वामी तुलसीदासकृत हनुमान चालीसा वाली:

दोहा: सहगल चरण स्पर्श कर, नित्य करूँ मधुपान

सुमिरौं प्रतिपल बिमल दा निर्देशन के प्राण

स्वयं को काबिल मानि कै, सुमिरौ शांताराम

ख्याति प्राप्त अतुलित करूँ, देहु फिलम में काम

चौपाई: जय जय श्री रामानंद सागर, सत्यजीत संसार उजागर

दारासिंग अतुलित बलधामा, रंधावा जेहि भ्राता नामा

दिलीप 'संघर्ष' में बन बजरंगी, प्यार करै वैजयंती संगी

मृदुल कंठ के धनी मुकेशा, विजय आनंद के कुंचित केशा।

विद्यावान गुनी अति जौहर, 'बांगला देश' दिखाए जौहर

हेलन सुंदर नृत्य दिखावा, लता कर्णप्रिय गीत सुनावा

हृषीकेश 'आनंद' मनावें, फिल्मफेयर अवार्ड ले जाएं

राजेश पावैं बहुत बड़ाई, बच्चन की वैल्यू बढ़ जाई

बेदी 'दस्तक' फिलम बनावें, पबलिक से ताली पिटवावें

पृथ्वीराज नाटक चलवाना, राज कपूर को सब जग जाना

शम्मी तुम कपिदल के राजा, तिरछे रोल सकल तुम साजा

हार्कनेस रोड शशि बिराजें, वाम अंग जैनीफर छाजें

अमरोही बनायें 'पाकीजा', लाभ करोड़ों का है कीजा

मनोज कुमार 'उपकार' बनाई, नोट बटोर ख्याति अति पाई

प्राण जो तेज दिखावहिं आपैं, दर्शक सभी हांक ते कांपै

नासैं दुख हरैं सब पीड़ा, परदे पर महमूद जस बीरा

आगा जी फुलझड़ी छुड़ावैं, मुकरी, ओम कहकहे लगावैं

जुवतियों में परताप तुम्हारा, देव आनंद जगत उजियारा

तुमहिं अशोक कला रखवारे, किशोर कुमार संगित दुलारे

राहुल बर्मन नाम कमावें, 'दम मारो दम' मस्त बनावें

नौशादहिं मन को अति भावें, शास्त्रीय संगीत सुनावें

रफी कंठ मृदु तुम्हरे पासा, सादर तुम संगित के दासा

भूत पिशाच निकट पर्दे पर आवें, आदर्शहिं जब फिल्म बनावें

जीवन नारद रोल सुहाएं, दुर्गा, अचला मा बन जाएं

संकट हटे मिटे सब पीड़ा, काम देहु बलदेव चोपड़ा

जय जय जय संजीव गुसाईं, हम बन जाएं आपकी नाईं

हीरो बनना चाहे जोई, 'फिल्म चालीसा' पढ़िबो सोई

एक फिलम जब जुबली करहीं, मानव जनम सफल तब करहीं

बंगला कार, चेरि अरु चेरा, 'फैन मेल' काला धन ढेरा

अच्छे-अच्छे भोजन जीमैं, नित प्रति बढ़िया दारू पीवैं

बंबई बसहिं फिल्म भक्त कहाई, अंत काल हालीवुड जाई

मर्लिन मनरो हत्या करईं, तेहि समाधि जा माला धरईं

दोहा: बहु बिधि साज सिंगार कर, पहिन वस्त्र रंगीन

राखी, हेमा, साधना, हृदय बसहु तुम तीन. (वीरेन्द्र सिंह गोधरा, 15 सितंबर 1972.)

मज़ेदार रचना है न, बाक़ायदा दोहा-चौपाई से लैस, भाषा व शिल्प में पुरातन, सामग्री में यकलख़्त ऐतिहासिक और अद्यतन, फ़िल्म भक्ति के सहस्रनाम-गुण-बखान में निहायत समावेशी, नामित आराध्य की भक्ति में सराबोर लेकिन साथ ही अमूर्त देवी-देवताओं के 'काले कार्य-व्यापार' से आधुनिक आलोचनात्मक दूरी बनाती हुई भी, जो आख़िरी चौपाई में मुखर हो उठती है। हमारे ज़माने में 'चोली के पीछे क्या है', के कई काँवड़िया संस्करण बन चुके हैं - अगले सावन में 'मुन्नी बदनाम हुई' के भी बन जाएँगे - अब अगर प्रामाणिक धर्म-धुरंधरों को इस तथाकथित अश्लील आयटम गीत की तर्ज़ पर शिवभक्ति अलापने में परहेज़ नहीं है तो उस ज़माने में माधुरी को इसकी उलट पैरोडी पेश करने में भला क्यों होता। फ़िल्म का एहतराम करना तो उसका घोषित धर्म ही ठहरा, और पाठक अगर धार्मिक पैकेजिंग में ही सिनेमा को घर ले जाना चाहते हैं तो वही सही। उन्हीं दिनों की बात है न जब जय संतोषी माँ आई थी तो लोग श्रद्धावश पर्दे पर पैसे फेंककर अपनी भक्ति का इज़हार कर रहे थे, जैसे कि किसी आयटम गाने पर ख़ुश होकर वे हॉल में सिक्के फेंकते पाए जाते थे, गोया किसी तवायफ़ की महफ़िल में बैठे हों। कैसा मणिकांचन घालमेल, कैसी अजस्र निरंतरता पायी जाती है हमारे लोक के धर्म-कर्म, नाच-गाने, और रुपहली दुनिया में कि शुद्धतावादियों का दम घुट जाए। वैसे माधुरी ने चंद बहसें धार्मिक फ़िल्मों के इतिहास व वर्तमान, उसके निर्माण के औचित्य-अनौचित्य पर भी चलाईं, एक ऐसे विशेषांक में अपना जवाब ख़ुद देता सवालिया प्रस्थान-बिंदु याद आता है: क्या धार्मिक फ़िल्मों के रथ को व्यावसायिकता का छकड़ा ढो रहा है?[13] ये तय है कि धर्म को लेकर माधुरी न तो भावुक थी न ही संवेदनशील; अगर किसी एक धर्म में इसकी अदम्य आस्था देखी जा सकती है, तो उसका नाम हमें राष्ट्रधर्म देना होगा। इसपर कुछ बातें, थोड़ी देर में।

'रिकार्ड तोड़ फीचर' स्तंभ में गानों की पंक्तियों से अटपटे सवाल पूछे जाते थे, या कटुक्तियाँ चिपकाई जाती थीं, कुछ इस बेसाख़्तगी से कि बोल के अपने अर्थ-संदर्भ गुम हो जाते थे, उनमें असली जीवन की छायाएँ कौंध जाती थीं। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

क) ओ, पंख होते तो उड़ जाती रे.....

....चिड़िया नहीं तो फ़िल्मी हीरोइन तो हो, हवाई जहाज़ में क्यों नहीं उड़ आतीं?

ख) तख़्त क्या चीज़ है और लालो-जवाहर क्या है,

इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं....

.....हाँ जी, दूसरे का माल लुटाने में क्या लगता है!

ग) जज़्बा-ए-दिल जो सलामत है तो इंशाअल्लाह

कच्चे धागे में चले आएँगे सरकार बँधे।

.....जनाब, वो नज़ाकत-नफ़ासत के ज़माने लद गए, अब तो लोहे की हथकड़ियों में बांधकर घसीटना पड़ेगा सरकार को।

घ) और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे

कारवाँ गुज़र गया, बहार देखते रहे...

....निकम्मों की यही पहचान होती है पुत्तर! (24 सितंबर, 1965).

क्या प्यारा हश्र हुआ है नीरज के पश्चाताप के आँसू रोते इस मशहूर भावुक गीत का! मूलत: हल्के-फुल्के हास्यरस का यह फ़ीचर बहुत लंबा नहीं चल पाया, लेकिन समझने लायक़ बात ये है कि यह उस परम-यथार्थवादी युग की दास्तान भी कहता है, जो तथाकथित फ़ॉर्मूला फ़िल्मों की हवा-हवाई बातों में आने से इन्कार कर रहा था, लिहाज़ा 'ये बात कुछ हज़म नहीं हुई' वाले अंदाज़ में प्रतिप्रश्न कर रहा था। जिसे आगे जाकर 'समांतर' सिनेमा कहा गया, उसका शबाब भी तो अँगड़ाइयाँ ले रहा था इस दौर में, जिसकी घनघोर प्रशंसिका बनकर ख़ुद माधुरी उभरती है। संक्षेप में, सत्यजीत राय, आदि के नक़्शे-क़दम चलकर लोकप्रिय मुख्यधारा की फ़ंतासियों के बरक्स ठोस दलीलें और वैकल्पिक फ़िल्में देने का वक़्त आ गया था, इन फुलझड़ियों से भला क्या होना था! उसके लिए तो उन साहित्यिक कृतियों के नाम गिनाए जाने थे, जो पता नहीं कब से फ़िल्म-रूप में ढल जाने को तैयार होकर बैठी थीं, और निर्माता कहते फिरते थे कि अच्छी कहानियाँ नहीं हैं।[14] दरमियानी धारा की फ़िल्में भी कई बनीं इस समय और साहित्यिक कृतियों पर भी, पर शुद्ध कलात्मक फ़िल्में माधुरी के परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन के बाद भी बहुत नहीं चल पाईं। अपवादों को छोड़ दें तो उनमें से ज़्यादातर के नसीब में सरकारी वित्तपोषण, फ़िल्मोत्सवी रिलीज़ और 'आलोचनात्मक प्रशंसा' ही आई।

साहित्यप्रियता

जितने अभियान माधुरी ने चलाए, जितने पुल इसने सिरजे, उनमें एक पुल और एक अभियान का ज़िक्र ज़रूरी है। साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में माधुरी ने कोई कसर नहीं उठाई, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसने इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर, पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और 'दिनकर' को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उसी पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी।[15] एक तरफ़ कवि, गीतकार, लेखक और विविध भारती के पहले निदेशक बनकर आए नरेन्द्र शर्मा से फ़िल्मी गीतों की महत्ता'[16] पर लिखवाया तो दूसरी ओर गुलशन नंदा से यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की आत्मीय बातचीत छापी।[17] ये याद दिलाना बेज़ा न होगा कि विविध भारती (ये शर्मा जी का रचनात्मक अनुवाद था अंग्रेज़ी के 'मिस्लेनियस प्रोग्राम' का) की स्थापना एक तरह से केसकर साहब के नेतृत्व वाले सूचना व प्रसारण मंत्रालय की बड़ी हार थी, लोकरंजक फ़िल्मी गीतों की ज़बर्दस्त लोकप्रियता के आगे। क्योंकि 1952 में भारतीय जनता को अपने मिज़ाज के माफ़िक बनाने के चक्कर में उन्होंने आकाशवाणी से फ़िल्मी गीतों के प्रसारण पर अनौपचारिक रोक लगा दी थी। जनता ने रेडियो सीलोन, और रेडियो गोआ की ओर अपने रेडियो की सूई का रुख़ कर दिया। अमीन सायानी इसी दौर में (बिनाका/सिबाका) गीतमाला के ज़रिए जो आवाज़ की दुनिया के महानायक बने तो आज तक हैं। घाटा भारतीय सरकारी ख़ज़ाने का हुआ जो पूरे पाँच साल तक चला, आख़िरकार केसकर साहब ने घुटने टेके, 'विविध भारती' चलायी, जिसे बाद में व्यावसायिक सेवा में तब्दील कर दिया गया।[18] बाक़ी तो देखा-भाला इतिहास होगा आपमें से कइयों के लिए। तो जब नरेन्द्र शर्मा ने माधुरी के लिए लिखा कि 'फ़िल्म संगीत इंद्र का घोड़ा है: आकाशवाणी उसका सम्मान करती है' तो वे भी सरकार की तरफ़ से उसको नकेल कसने की कोशिश की नाकामियों का इज़हार ही कर रहे थे, और क्या ठोस वकालत की उन्होंने फ़िल्मी गानों की। गुलशन नंदा ने, जिनका नाम आज तक हिन्दी साहित्यिक जगत में हिकारत से लिया जाता है, पर जिनके उपन्यासों पर कई सफल और मनोरंजक फ़िल्में बनीं, उस बातचीत में बग़ैर किसी शिकवा-शिकायत के, मुतमइन भाव से, अपनी बात रखी। तो माधुरी जहाँ एक ओर शुद्ध साहित्यिकों से बातचीत कर रही थी, वहीं दूसरी ओर फ़िल्मी लेखकों-शायरों - मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी, गुलज़ार, राही मासूम रज़ा, मीना कुमारी, सलीम-जावेद आदि से मुसलसल संवादरत थी।[19] नायक-नायिकाओं के साथ-साथ गायक-गायिकाओं को काफ़ी तवज्जो दी गई तो कल्याणजी-आनंदजी की चुटकुलाप्रियता की स्थानीय शोहरत को राष्ट्रीय में तब्दील करने में उनके माधुरी के स्तंभ का बेशक योगदान रहा होगा। नए-पुराने लिखने वाले निर्माता-निर्देशकों से भी साग्रह लिखवाया गया: किशोर साहू, बिमल राय, के.एन सिंह आदि की जीवनी/आत्मकथा धारावाहिक छपी तो राधू करमारकर जैसे छायाकार की कहानी को भी प्रमुखता मिली। शैलेन्द्र तो अरविन्द जी के प्रिय गीतकार और मित्र थे ही, तीसरी क़सम के बनने, असफल होने और शैलेन्द्र के उस सदमे से असमय गुज़र जाने की जितनी हृदयछू कहानियाँ माधुरी ने सुनाईं, शायद किसी के वश की बात नहीं थी। इनमें शोकसंतप्त रेणु की आत्मग्लानि से लेकर राजकपूर के अकाल-सखा-अभाव को वाणी देतीं भावभीनी श्रद्धांजलियाँ शुमार की जा सकती हैं।

लेकिन साहित्य को सिनेमा से जोड़ने के सिलसिले में सबसे रचनात्मक नुस्ख़े जो माधुरी ने कामयाबी के साथ आज़माए उनमें एक-दो ख़ास तौर पर उल्लेखनीय हैं। हालाँकि नायक-नायिकाओं के चित्रों के साथ काव्यात्मक शीर्षक देने की रिवायत पुरानी थी - उर्दू की मशहूर फ़िल्मी पत्रिका शमा में पचास के दशक में इसकी मिसालें मिल जाएँगी। वैसे ही जैसे कि तीस-चालीस के दशक की साहित्यिक पत्रिकाओं में 'रंगीन' तस्वीरों के साथ दोहा या शे'र डालने का रिवाज था। माधुरी में भी उर्दू के शे'र मिलते थे लेकिन कभी-कभार ही, उनकी जगह यहाँ हिन्दी कवियों को प्रतिष्ठित किया गया। दो-चार उदाहरणों से बात साफ़ हो जानी चाहिए। पूरे पृष्ठ पर 'पत्थरों में प्राण भरने वाले शिल्पी अभिनेता जीतेन्द्र' की सुंदर-सुडौल सफ़ेद-स्याह आवक्ष चित्ताकर्षक तस्वीर छपी है, लेकिन उसमें अतिरिक्त गरिमा डालने के लिए दिनकर की उर्वशी से पुरुरवा का दैहिक वर्णन डाल दिया गया है:

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहाँ है?

गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जय-जयकार

उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है?

यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ,

सूर्य के आलोक से दीपित समुन्नत भाल,

मेरे प्यार का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।[20]

जिसे हिन्दी साहित्य पढ़ने-पढ़ानेवालियों ने अवश्य सराहा होगा। उसी तरह सायरा बानो की दिलकश रंगीन तस्वीर के साथ टुकड़ा लगाया 'कनक छरी-सी कामिनी' और जानने वालों ने अपनी तरफ़ से दोहे की दूसरी अर्धाली अनायास जोड़ी होगी, 'काहे को कटि क्षीण'![21] उससे भी ज़्यादा जाननेवालों ने इस दोहे के साथ औरंगज़ेबकालीन कृष्णभक्त कवि आलम को भी याद किया होगा और उस रंगरेज़न को भी, जिसने कहते हैं, इस दोहे की दूसरी पंक्ति - 'कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन' - पूरी कर दी, और उसके बाद तो आलम उसके इश्क़ में गिरफ़्तार ही हो गए। माधुरी को सायरा बानो की आवरण-कथा का सिर्फ़ एक शीर्षक देना था, इसलिए उसका काम पहली अर्धाली से ही हो गया था, लेकिन दूसरी अर्धाली और पंक्ति न देकर शायद इसने अपने 'पारिवारिक' आत्मसंयम का भी परिचय दिया, कि चतुर-सुजान ख़ुद कल्पना कर लें! वरना 'यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ' और 'कुचन मध्य धरि दीन' में यही तो फ़र्क़ है कि पहले में पुरुष-देह-सौंदर्य बखाना गया है, और दूसरे में स्त्री-सौंदर्य की ओर इशारा है! वैसे, आगे चलकर जब रंगीन पृष्ठ बढ़ते हैं, तो कई स्थापित या संघर्षशील तारिकाओं की अपेक्षाकृत कम या छोटे कपड़ोंवाली तस्वीरें भी माधुरी छापती है, और पाठकों के पत्रों में सेन्सरशिप की गुहार नहीं मचती दिखती है, तो ये मान लेना चाहिए कि वक़्त के साथ इसके पाठक भी 'वयस्क' हो रहे थे। वैसे फ़िल्म सेन्सरशिप के तंत्र की आलोचना - 'अंधी कैंची, पैनी धार' - बासु भट्टाचार्य जैसे दिग्दर्शक माधुरी के पृष्ठों में कर ही रहे थे, सो पाठकों तक पत्रिका का उदारमना संदेश तो जा ही रहा होगा।[22] मौखिक और लिखित तथा छप-साहित्य की जानी-मानी लोकप्रिय विधा - समस्यापूर्ति - का भी ख़ूब इस्तेमाल किया माधुरी ने। पाठकों से अक्सर किसी (सिर्फ़ बड़े नहीं) सिनेसितारे की दिलचस्प छवि के जवाब में मौलिक कविता माँगी जाती थी, और तीन-चार अच्छी प्रविष्टियों पर नक़द ईनाम भी दिए जाते थे। एक और आवरण कथा थी माला सिन्हा पर, बग़ीचे में लताओं व पेड़ों के बीच इठलाती उनकी तीन रंगीन तस्वीरों के साथ, साथ में छपा था विद्यापति कृत ये काव्यांश;

कालिन्दी पुलिन-कुंज बन शोभन।

नव नव प्रेम विभोर।

नवल रसाल-मुकुल-मधु मातल।

नव-कोकिल कवि गाय,

नव युवति गन चित उमता भई।

नव रस कानन धाय।

जिसे उद्धृत करने के पीछे मेरा ध्येय सिर्फ़ माधुरी के काव्य-चयन का विस्तृत दायरा दिखाना है। कुछ मिसालें उर्दू शायरी से भी। शर्मीला टैगोर का चित्र है, शीर्षक में मजरूह का शे'र:

यह आग और नहीं, दिल की आग है नादाँ,

शमअ हो के न हो, जल मरेंगे परवाने।

एक और जगह रंगीन, जुड़वाँ पृष्ठों पर शर्मीला और मनोज कुमार आमने सामने हैं, एक ही ग़ज़ल के दो अश'आर से जुड़े हुए:

शर्मीला: किस नजर से आज वह देखा किया।

दिल मेरा डूबा किया उछला किया।।

मनोज: उनके जाते ही ये हैरत छा गई।

जिस तरफ़ देखा किया, देखा किया।।(10 सितंबर, 1965)

वाह! वाह!!

हिन्दीप्रियता

इन उद्धरणों से यह साफ़ हो गया होगा कि हिन्दुस्तानी सिनेमा और उर्दू के बीच जो पारंपरिक दोस्ताना रिश्ता[23] था, उसके बीच माधुरी हिन्दी के लिए भी जगह तलाशने की कोशिश कर रही थी। इस तरह की कोशिशें हिन्दी की तरफ़ से कई पीढ़ियाँ कम-से-कम सौ साल से करती आ रही थीं : चाहे वह छापे की दुनिया के भारतेन्दु और उनके बाद के दिग्गज रहे हों, जो कविता में हिन्दी को ब्रजभाषा-अवधी वग़ैरह के बरक्स 'खड़ी' करने में, या पारसी नाटक-लेखन के क्षेत्र में पं. राधेश्याम कथावाचक के सचेत प्रयास हों, या फिर रेडियो की दुनिया में पं. बलभद्र नारायण दीक्षित 'पढ़ीस' के परामर्श हों या पं. रविशंकर शुक्ल की आक्रामक राजनीतिक मुहिम हो, इन सबका एक सामान्य सरोकार उन इलाक़ों में हिन्दी की पैठ बनाना रहा जो उसके लिए नए थे।[24] ये इलाक़े हिन्दीवादियों को भाषायी नुक्ता-ए-नज़र से ख़ाली बर्तन की तरह नज़र आते थे, जिन्हें हिन्दी की सामग्री से भरना इन्हें परम राष्ट्रीय कर्तव्य लगता था। अगर ग़लती से किसी और ज़बान, और ख़ुदा न करे उर्दू का वहाँ पहले से क़ब्ज़ा हो, तब तो मामला और संगीन हो उठता था, युद्ध-जैसी स्थिति हो उठती थी, कि हमें इस 'विदेशी' ज़बान को अपदस्थ करना है, अपनी ज़मीन पर निज भाषा का अख़्तियार क़ायम करना है। बेशक आज़ादी के बाद स्थिति तेज़ी से बदली, हिन्दी का अधिकार-क्षेत्र बढ़ा, उर्दू विभाजन और मुसलमानों की भाषा बनकर हिन्दुस्तान में बदनाम और बेदख़ल कर दी गई, लेकिन, जैसा कि हम नीचे देखेंगे, तल्ख़ियाँ अभी बाक़ी हैं, घाव अभी तक ताज़ा हैं। माधुरी 'हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान' के लिए चले इस लंबे संघर्ष में हिन्दूवादी बनकर तो शायद नहीं, लेकिन कम-से-कम फ़िल्मक्षेत्रे हिन्दी राष्ट्रवादी हितों का हामी बनकर ज़रूर उभरती है।[25]

अपनी बात की पुष्टि के लिए चलिए एक बार फिर एक संपादकीय, 'हमारी बात' से ही यात्रा शुरू की जाए, जिसका शीर्षक था 'हिन्दी की फिल्में और हिन्दी':

कुछ पुरानी और कुछ आनेवाली फिल्मों के नाम इस प्रकार हैं: 'फ्लाइट टू बैंकाक', 'गर्ल फ्राम चाइना', हण्डरेड एण्ड एट [डेज़] इन कश्मीर', 'पेनिक इन पाकिस्तान', 'द सोल्जर', द कश्मीर रेडर्स', 'अराउण्ड द वर्ल्ड', 'लव इन टोकियो', 'ईवनिंग इन पेरिस', 'जौहर एण्ड जौहर इन चाइना', 'लव इन शिमला', मदर इंडिया', सन आफ इंडिया', मिस्टर एण्ड मिसेज फिफ्टी फाइव', मिस्टर एक्स इन बाम्बे, लव मैरिज', होलीडे इन बाम्बे'....। इन नामों को पढ़कर क्या आपको भ्रम नहीं होता कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है और कुछ सिरफिरे लोग बिना मतलब 'हिन्दी-हिन्दी' की रट लगाए रहते हैं? यह छोड़िये। सिनेमाघर में जब आप फिल्म देखते हैं तो आपको इतना तो अवश्य ही लगता होगा कि यदि भारत की भाषा हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी या इससे मिलती जुलती कोई और भाषा हो भी तो उसकी लिपि नागरी अरबी नहीं, रोमन है। इस सन्देह की पुष्टि तब और मिलती है, जब सड़कों, मुहल्लों के रोमन लिपि में लिखे नामपटोंपर कोलतार पोतने वाली राजनीतिक पार्टियाँ फिल्मोंकी रोमन नामावली पर चुप्पी साध लेती हैं। इन पार्टियों के सदस्य फिल्में नहीं देखते होंगे - इस पर तो विश्वास नहीं होता।

आपने अकसर यह दावा सुना होगा : हिन्दी के प्रचार में सबसे बड़ा योगदान फिल्मों का है। फिल्मकार इस आत्मछलपूर्ण दावेसे अपनेको हिन्दी सेवकोमें सबसे अगला स्थान देना चाहें तो आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तब होता है जब आम लोग हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता देखकर इस दावे को सत्य मान लेते हैं। यह ऐसा ही है कि पूर्व में सूर्योदय और पश्चिम में सूर्यास्त देख कर लोग समझते रहे कि सूर्य धरतीकी परिक्रमा करता है।[26]

इस तरह की कोपरनिकसीय भाषावैज्ञानिक क्रांति को स्थापित करने के बाद हिन्दी फिल्मकारों के 'हिन्दी-प्रेम' की पोल ये कहकर खोली जाती है कि फ़िल्म कला का एक तरह का थोक व्यवसाय है, जिसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाकर ही लाभ कमाया जा सकता है, लिहाज़ा, इसकी ज़बान औसत अवाम की ज़बान रखी जाती है। लेकिन अफ़सोस कि नामावली और प्रचार-प्रसारमें एक प्रतिशत अंग्रेज़ी-भाषी जनता की लिपि को प्रश्रय दिया जाता है, जबकि 35 प्रतिशत पढ़े-लिखे लोग टूटी-फूटी हिन्दी और देवनागरी जानते हैं। "ऐसा करके निर्माता वस्तुत: अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं। बेहतर प्रचार होता अगर वे कुछ और पैसे ख़र्च करके भारत की दीगर लिपियों में भी फिल्म का नाम दें: हाल ही में निर्माता-निर्देशक ताराचंद बड़जात्या ने अपनी फिल्म 'दोस्ती' के प्रचारमें इस नीतिको अपनाकर उचित लाभ उठाया था। बंगला फिल्मोंके अधिकांश निर्माता नामावलीमें बंगला लिपि ही काम में लाते हैं। लेकिन हिन्दीमें हाल यह है कि भोजपुरी फिल्मों में भी रोमन नामावली होती है (जबकि ये फिल्में हिन्दी क्षेत्रके बाहर कहीं नहीं देखी जाती)। यहाँ तक कि उन मारकाट वाली स्टण्ट फिल्मोंमें भी, जिन्हें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग नहीं देखते। कई बार यह देखकर निर्माताओं की व्यावसायिक बुद्धिहीनता पर हंसी ही आती है।"

इस संपादकीय से आरंभ करके माधुरी ने जैसे रोमन नामावली के ख़िलाफ़ बाक़ायदा जिहाद ही छेड़ दिया, जिसका कई पाठकों ने भी खुले दिल से समर्थन किया। मसलन जब वे पत्र लिखते तो ये शिकायती स्वर में बताना नहीं भूलते कि फ़लाँ-फ़लाँ फिल्म में नामावली रोमन में दी गई है। लेकिन इस मुहिम की सबसे सनातन रट तो फ़िल्म समीक्षा के स्तंभ 'परख' में सुनाई पड़ती है। चाहे समीक्षक की राय में पूरी फ़िल्म अच्छी ही क्यों न हो, अगर नामावली नागरी में नहीं है तो उस पर एक टेढ़ी टिप्पणी तो चिपका ही दी जाती थी। माधुरी के अंदरूनी पृष्ठों पर सिने-समाचार नामक एक अख़बार भी होता था, अख़बारी काग़ज़ पर अख़बारी साज-सज्जा लिए, जिसमें 'जानने योग्य हर फिल्मी खबर' छपती थी। उसका 15 दिसंबर, 1967 का अंक मज़ेदार है क्योंकि इसके मुख्य पृष्ठ पर सुर्ख़ी ये लगाई गई थी: 'फिल्म उद्योग में हिन्दी नामों की जोरदार लहर: हिन्दी के विरुद्ध दलीलें देने वालों को चुनौती'। उपशीर्षक भी हमारे काम का है: 'उपकार, संघर्ष, अभिलाषा, विश्वास, समर्पण, जीवन मृत्यु, परिवार, धरती, वासना, भावना आदि फिल्मों के कुछ ऐसे शीर्षक हैं जो इस मत का खण्डन करते हैं कि केवल उर्दू या अंग्रेजी के नाम ही सुंदर होते हैं'। जैसा कि ऊपर उद्धृत संपादकीय से भी ज़ाहिर है, भाषा की माधुरी की अपनी आधिकारिक समझ वैसे तो आम तौर पर व्यापक है, पर कुछ और मिसालें लेने पर हमें उस आबोहवा का अंदाज़ा लग जाएगा, जिसमें हस्तक्षेप करने की चेष्टा वो कर रही थी। संपादकीय इस पंक्ति के साथ ख़त्म होता है: "अहिन्दी भाषी क्षेत्रोंके लिए फिल्म का नाम व अन्य मुख्य नाम हिन्दी के साथ दो-तीन अन्य प्रमुख भारतीय लिपियों(जैसे बंगला व तमिल)में भी दिए जा सकते हैं।" पूछना चाहिए कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में नाम नागरी में क्यों दिए जाएँ, केवल स्थानीय भाषा में ही क्यों नहीं। लेकिन ऐसा मानना हिन्दी-हित के साथ समझौता करना होता, चूँकि इस भाषा की पहचान इसकी लिपि से नत्थम-गुत्था है, आख़िरकार लिपि की लड़ाई लड़कर ही तो भाषा अपनी स्वतंत्र इयत्ता बना पाई थी। ठीक है हिन्दी-विरोध की हवा है, ख़ासकर दक्षिण में तो इतना मान लिया जाता है कि उनकी लिपि भी चलेगी: 'भी'; 'ही' - कत्तई नहीं। इस सिलसिले में दिलचस्प है कि माधुरी ने किसी प्रोफ़ेसर मनहर सिंह रावत से दक्षिण का दौरा करवाके एक लेख लिखवाया जिसका मानीख़ेज़ शीर्षक था - 'दक्षिण का नारा: हमें फिल्मों में हिन्दी चाहिए'। लब्बेलुवाब ये था कि भारत की ज़्यादातर भाषाएँ संस्कृत के नज़दीक हैं, दक्षिण की भी। इसलिए वहाँ के लोगों के लिए संस्कृत के तत्सम-तद्भव शब्द सहज ग्राह्य हैं। साथ ही संस्कार का सनातन सवाल भी है:

एक सामान्य भारतीय के लिए गुरू-उस्ताद, रानी-बेगम, विद्यालय-मदरसा, कला-फन, ज्ञान-इल्म,, धर्म-मजहब, कवि-सम्मेलन-मुशायरा, हाथ-दस्त, पाठ-सबक, आदि शब्द युग्मोंमें बिम्ब ग्रहण या संस्कार शीलताकी दृष्टि से बहुत बड़ा अंतर आ जाता है जो कि अनुभूत सत्य है।

पर इसके साथ ही हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जन-साधारणकी भाषामें जो शब्द सदियों से घुलमिलकर उनके जीवन संस्कार के अंग बन चुके हैं, उन्हें जबरदस्ती हटाकर एक नयी बनावटी भाषाका निर्माण करना भी बहुत हानिकारक होगा। फिर वे प्रचलित शब्द या प्रयोग कहीं से क्यों न आये हों। मातृभाषा के प्रति अनावश्यक पूर्वाग्रह, ममत्व... द्वेषनात्मक दृष्टिकोण का ही सूचक है। सरल भाषाकी तो केवल एक ही कसौटी होनी चाहिये कि किसी शब्द प्रयोग या मुहावरेसे सामान्य जनता कितनी परिचित या आसानिसे भविष्य में परिचित हो सकती है। उदाहरणके लिये यदि हम कहें - “यह बात मुझे मालूम है।" तो साधारण हिन्दीसे परिचित श्रोताओंको भी समझनेमें कोई कठिनाई नहीं होती। पर इसी बातको अगर हम अनावश्यक रूप से अल्प परिचित संस्कृतनिष्ठ भाषामें कहें कि - "प्रस्तुत वार्ता मुझे विदित है।" तो यह भाषाका मज़ाक उड़ाने-जैसा हो जाता है।

इसके साथ-साथ कुछ सुन्दर सरल, उपयुक्त तथा अर्थ व्यंजक शब्द हमें जहां कहीं भी प्रादेशिक भाषाओं से मिलें, विशेषत: एसे शब्द जिनके समानार्थी या पर्यायवाची शब्द हिन्दीमें उतने निश्चित प्रभावोत्पादक एवं व्यापक अर्थोंको देनेवाले नहीं होते तो उन्हें नि:संकोच स्वीकार कर लेना चाहिये। (30 जुलाई, 1965)

रावत साहब से पूछने लायक़ बात यह है कि ये सामान्य भारतीय कौन है, और क्या पूरे दक्षिण की भाषाओं-उपभाषाओं की संस्कृतमयता यकसाँ है? अगर हाँ तो इतनी सदियों तक वे संस्कृत से अलग अपनी इयत्ता बनाकर क्यों रख पाईं? अगर हाँ तो ये सभी भाषाएँ संस्कृत ही क्यों नहीं कही जातीं। क्या तमिल भाषा के अंदर कई तरह की अंतर्विरोधी धाराएँ नहीं बह रही थीं, एक पारंपरिक ब्राह्मणवादी किंचित संस्कृतनिष्ठ तमिल के साथ-साथ दूसरी, दलित तमिल, भी तो उन्हीं दिनों अपने को राजनीतिक, साहित्यिक और फ़िल्मी गलियारों में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। तो दार्शनिक धरातल पर जहाँ रावत साहब उदारमना हैं, वहीं 'संस्कार' का सनातन सवाल उन्हें भाषाओं की उचित व्यावहारिक स्थिति का आकलन करने से रोक-रोक देता है। सवाल अंतत: शुद्धता का है, जैसा कि पटना की कुमुदिनी सिन्हा के इस ख़त से ज़ाहिर हो जाएगा:

माधुरी' एक एसी जनप्रिय पत्रिका है, जिसने हम जैसे हजारों पाठकों का दिल जीत लिया है। 10 सितंबर के अंक में 'आपकी बात' स्तंभ में प्रकाशित मधुकर राजस्थानी के विचार पढ़े.... वास्तव में आज अच्छे से अच्छे कलाकार, लेखक, कवियों का फिल्म जगत में प्रवेश आवश्यक है। फिल्म ही आज एक ऐसा माध्यम है, जो जन-जन तक पहुँचता है।

इसी स्तंभ में कलकत्ता के भाई निर्मल कुमार दसानी का पत्र पढ़ा, उन्हें भी धन्यवाद देती हूँ। इस लोकतंत्र राष्ट्र में हिन्दी के नाम पर खिचड़ी अधिक चल नहीं सकती। उसका एक अपना अलग रूप होना ही चाहिए और इसमें फिल्मों का सहयोग आवश्यक है। फिल्म के हरेक कलाकार, गीतकार को चाहिए कि फारसी-उर्दू मिश्रित भाषा त्यागकर यथाशक्ति संशोधित, परिमार्जित और मधुर हिन्दी व्यवहृत कर उसे फैलाने में अपना सहयोग दें

अंत में पुन: माधुरी की लोकप्रियता और सफलता की कामना करती हूँ।[27](ज़ोर हमारा)

एक तरफ़ जहाँ दशकों पुरानी गुहार – कि हिन्दी साहित्यकार सिनेमा की ओर मुड़ें - को बदस्तूर दुहराया गया है, वहीं लोकतंत्र की अद्भुत परिभाषा भी की गई है कि यहाँ फ़ारसी-उर्दू मिश्रित खिचड़ी भाषा नहीं चलेगी। एक तरफ़ लोकप्रियता की अभिलाषा, दूसरी तरफ़ परिमार्जित, संशोधित और परिनिष्ठित हिन्दी की वकालत - ज़ाहिर है कि लेखिका को इन दोनों चाहतों में कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देता। लेकिन भाषायी ज़मीन पर क़ब्ज़े की युयुत्सा तब ख़ासी सक्रिय हो उठती है जब मुक़ाबले में हिन्दी की पुरानी जानी दुश्मन उर्दू खड़ी हो जाए, और कुछ नहीं बस अपना खोया हुआ नाम ही माँग ले तो यूँ लगता था गोया क़यामत बरपा हो गई।[28] मिसाल के तौर पर एक विवाद का ज़िक्र करना उतना ही ज़रूरी है जितना कि उसकी तफ़सील में जाना। सिने-समाचार में छपी इस ख़बर को देखें:

साहिर द्वारा हिन्दी के विरुद्ध विष वमन: फिल्म उद्योग में आक्रोश

(माधुरी के विशेष प्रतिनिधि द्वारा : तथाकथित प्रगतिशील शायर साहिर लुधियानवीकी उर्दू-हिन्दी का विवाद उठाकर साम्प्रदायिक तनाव पैदा करनेकी कोशिशशों की फिल्म उद्योग में सर्वत्र निंदा की जा रही है।)

हाल ही में एक मुशायरे में साहिरने कहा कि भारतमें 97 प्रतिशत फिल्में उर्दू में बनती हैं, इसलिए इन फिल्मोंकी नामावली उर्दू में होनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि 'हिन्दी साम्राज्यवाद' नहीं चलने दिया जायेगा।

सारी दुनियाके शोषित वर्ग का रहनुमा बननेवाले इस शायर की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की यह कोई पहली हरकत नहीं है। कुछ ही मास पूर्व बिहारके बाढ़ पीड़ितोंकी सहायताके लिए चन्दा एकत्रित करने के उद्देश्यसे साहिर, ख्वाजा अहमद अब्बास, सरदार जाफरी आदि ने बिहार, उत्तर प्रदेश राजस्थान, पंजाब आदि प्रदेशों का दौरा किया था। लेकिन बिहारके अकाल का सिर्फ एक बहाना बन रह गया। हर मुशायरेमें सम्बन्धित प्रदेश की द्वितीय राजभाषा बनायी जानेका प्रचार किया गया।

आम चुनाव से पूर्व बम्बईके कुछ उर्दू पत्रकारों को इन्हीं शायर महोदय ने सलाह दी थी कि उत्तर प्रदेश के साथ महाराष्ट्र में भी द्वितीय राजभाषा का स्थान उर्दू को देने के लिए आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र में सम्मिलित मराठवाड़ा क्षेत्र के निजामके आधीन था और वहाँ के वासी उर्दू बोलते हैं। इस आंदोलन में तन-मन-धनसे सहायता देनेका आश्वासन भी उन्होंने दिया था।

साहिर द्वारा साम्प्रदायिक आग भड़कानेकी इन कोशिशों से फिल्म उद्योगमें आक्रोश फैल गया है। फिल्म लेखक संघ के अध्यक्ष ब्रजेन्द्र गौड़ने साहिर की निन्दा करते हुए कहा कि फिल्म उद्योग में साम्प्रदायिकता फैलाने की यह कोशिश सफल नहीं हो सकेगी।

सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोजकुमार, निर्माता शक्ति सामंत, गीतकार भरत व्यास, मजरूह सुल्तानपुरी, पं. गिरीश, संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी आदि ने भी 'माधुरी' प्रतिनिधि से हुई भेंट में साहिर की इन हरकतों की निन्दा की। (16 दिसंबर, 1967)

देखा जा सकता है कि माधुरी का हिन्दी राष्ट्रवाद जागकर गोलबंदी शुरू कर चुका है। साहिर ने अक्षम्य अपराध जो किया है, उर्दू की अपनी ज़मीन को अपना कहने का, इसके आगे उनके सारे प्रगतिशील पुण्य ख़ाक हो जाते हैं, अब तक के सारे भजन-कीर्तन बेकार, सारी लोकप्रियता ताक पर। आज का पाठक यह पूछ सकता है कि अगर हिन्दी के लिए आंदोलन चलाना साम्प्रदायिक नहीं था तो उर्दू में ऐसी क्या ख़ास बात थी जिसके स्पर्श मात्र से आपकी तरक़्क़ीपसंदगी मशकूक हो जाती थी? यह उसी 'शूच्याग्रे न दत्तव्यं' वाले युयुत्सु उत्साहातिरेक का लक्षण था जो हिन्दी के हिमायतियों में पचास और साठ के दशक में ज़बर्दस्त तौर पर तारी था, जो कुछ राज्यों में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने के नाम पर ही अलगाववाद सूँघने लगता था। पाठकों ने एक बार फिर माधुरी के मुहिम की ताईद करते हुए कई ख़त लिखे, सिर्फ़ एक लेते हैं:

'साहिर का असली चेहरा' शीर्षक-पत्र में कहा गया: "साहिरकी लोकप्रियता प्रगतिशील विचारोंके कारण ही बढ़ी है। एक प्रगतिशील साहित्यजीवी अगर संकीर्णता और अलगाववादी लिजलिजी विचारधाराको प्रोत्साहन देता है तो ऐसी प्रगतिशिलता को 'फ्राड' ही कहा जाएगा। साहिर निश्चय ही उर्दू का पक्षपोषण कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रभाषा का अपमान करके या अपमान की भाषा बोलकर नहीं। साहिर साहब को यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है कि राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की क्या अहमियत होती है। उर्दू को हथियार बनाकर हिन्दीपर वार करना कौन देशभक्त हिन्दुस्तानी पसंद करेगा?...फिरकापरस्तों की यह कमजोरी होती है कि वे वतन की मिट्टी के साथ, उसकी पाकीजा तहजीब के साथ, उसकी भावनात्मक एकता के साथ गद्दारी ही नहीं बलात्कार तक करने की कोशिश करते हैं।...अच्छा हो साहिर साहब अपने रुख में परिवर्तन कर लें अन्यथा प्रगतिशीलता का जो नकाब उन्होंने चढ़ा रखा है, वह हमेशा के लिए उतार फेंके ताकि असली चेहरे का रंग-रोगन तो नजर आए।"

इस धौंस-भरे विमर्श में राष्ट्रभाषा हिन्दी तो सदा-सर्वदा लोकाभिमुख रही है, वह तो जनवाद के ऊँचे नैतिक सिंहासन से जनता से बोलती हुई जनता की अपनी भाषा है, उसको साम्राज्यवादी भला कहा कैसे जा सकता है! ऐसा पूर्वी बंगाल में बांग्ला के साथ पाकिस्तान भले कर सकता है, जबकि भारत की पूरी तवारीख़ में आक्रामकता के उदाहरण नहीं मिलते। दिलचस्प यह भी है कि इस विवाद के दौरान साहिर को कभी अपनी स्थिति साफ़ करने का मौक़ा नहीं दिया, हाँ चौतरफ़ा उनपर हल्ला अवश्य बोला गया। इस विवाद की अनुगूँज अंग्रेजी फ़िल्मफ़ेयर में भी उठी, पर वहाँ कम-से-कम कुछ ऐसी चिट्ठियों को भी छापा गया जो उर्दू व हिन्दुस्तानी यानि साहिर का पक्ष लेती दिखीं, जबकि एक भी ऐसी चिट्ठी माधुरी की उपलब्ध फ़ाइलों में नहीं दिखी।[29]

माधुरी से ही एक आख़िरी ख़त – चूँकि यह इस मुद्दे पर सबसे उत्कृष्ट बयान है - देकर इस विवाद और लेख की पुर्णाहुति की जाए। फिल्मेश्वर[30] ने अपने अनियत स्तंभ 'चले पवन की चाल' में 'हिन्दी-उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले साहिर के नाम एक खुला पत्र' लिखा, जिसमें सिद्ध किया गया कि हिन्दी-उर्दू दो अलहदा भाषाएँ नहीं हैं, गोकि उनकी लिपियाँ एक नहीं हैं: ग़ालिब ने अपने को हिन्दी का कवि कहा, और ख़ुद साहिर की नागरी में छपी किताबें उर्दू संस्करणों से ज़्यादा बिकी हैं, वो भी बग़ैर अनुवाद के, तो हिन्दी साम्राज्यवादी कैसे हो गई? और फिल्मों की भाषा अगर 97 प्रतिशत उर्दू है, तो वो हिन्दी हुई न? पिर झगड़ा कैसा! इस ख़त में साहिर के पूर्व-जन्म के पुण्य को बेकार नहीं मानकर उनके 'अलगाववादी' उर्दू-प्रेम पर एक छद्म अविश्वास, एक मिथ्या आहत भाव का मुजाहिरा किया गया है, कि 'साहिर, आप तो ऐसे न थे' या 'आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी'। छद्म और मिथ्या विशेषणो का सहारा मैंने इसलिए लिया है क्यूँकि शीर्षक में ही निर्णय साफ़ है, बाक़ी पत्र तो एक ख़ास अंदाज़े-बयाँ है, कोसने का एक शालीन तरीक़ा, बस। बहरहाल, पत्र-लेखक बेहद हैरत में है:

आख़िर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर सम्प्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्यमें आजादी के बीस सालोंमें इतना करिश्मा तो किया ही है कि हमारे अन्दर जो संकुचित भावनाओं की आग घुट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है, और उसे हिन्दी-उर्दूका नाम दे कर हम उसे छिपाने की कोशिश करते [रहते] हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी ही लफ्फाजी करते रहते हों, यह सही है कि आपके दिल में एक दिन इनसान के प्रति प्रेम भरा था। आप सब दुनियाके लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाए, आप हिन्दी-उर्दूकी आड़ में किस नफरत के शोलेसे खेलने लगे? सच कहूँ तो आपकी आवाज से आज जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था:

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले

यह पत्र लिखते समय मुझे उस गीत की याद हो आयी, इसलिए आपको देशद्रोही कहनेको मन नहीं होता। पर मुशायरे में आपकी तकरीरको पढ़कर आपको क्या कहूँ यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तानकी एक पीढ़ी, जिसमें पाकिस्तान की भी एक पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालोंसे(खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं, हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी साम्प्रदायिकता की एक झलक दिखा कर तोड़ दिया।...आपने एक बार लिखा था:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकलकी गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है कि ये आपकी भावनाएँ नहीं थीं, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्रकी भावनाएँ लिख रहे थे...सारे हिन्दुस्तान में फिल्म उद्योग एक ऐसी जगह थी जहां जाति, प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था। और आप इन्सानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया। लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजर में सिर्फ एक है:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आख़िरमें इतनी ही दुआ करना चाहता हूँ: खुदा उर्दूको आप जैसे हिमायतियों से बचाये! (15 दिसंबर 1967).

एक झटके में साहिर लुधियानवी जैसा लोकप्रिय शायर 'फ़्राड', 'फिरकापरस्त', 'साम्प्रदायिक' और अमूमन 'देशद्रोही' क़रार दिया जाता है। इसमें इतिहास के विद्यार्थी को कोई हैरत नहीं होती क्योंकि फिल्मेश्वर की आलोचना चिरपरिचित ढर्रे पर चलती है, और इसको अपने मंत्रमुग्ध पाठक-समूह पर पूरा भरोसा है। कई दशकों से साल-दर-साल चलते आ रहे मुख्यधारा के राष्ट्रवादी विमर्श ने एक ख़ास तरह की परंपरा का सृजन किया था, और उसमें जो कुछ पावन, महान और उदात्त था, उसे अपनी झोली में डाल लिया था, और जो अल्पसंख्यक एक ख़ास तरह के सांस्कृतिक वर्चस्व को मानने से इन्कार करते थे, वे अलगाववादी कह कर अलग-थलग कर दिए गए थे। ये दोनों धाराएँ परस्पर प्रतिद्वंद्वी मानी गईं जबकि दोनों एक ही राष्ट्रवादी नदी के दो किनारे-भर थे। हिन्दी राष्ट्रवाद इस प्रवृत्ति का एक अतिरेकी विस्तार-मात्र था, वैसे ही जैसे कि उर्दू राष्ट्रवाद। जब इन दो किनारों को मिलाने वाली फ़िल्मी दुनिया की बिचौलिया पुलिया ज़बान को उर्दू के शायर ने उर्दू नाम दिया तो इस हिमाकत पर उन्हें वैसे ही संगसार होना ही था, जैसे एक-डेढ़ पीढ़ी पहले गांधी को उनकी हिन्दुस्तानी की हिमायत के लिए।[31]

बतौर निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि माधुरी ने सिनेमा को हिन्दी जनपद में सम्मानजनक, लोकप्रिय और चिंतन-योग्य वस्तु बनाने में अभूतपूर्व, संयमित, रचनात्मक योग दिया। लेकिन जिस तरह फ़िल्म-निर्माताओं की व्यावसायिक चिंताओं को समझे बग़ैर मुख्यधारा का सिनेमा नहीं समझा जा सकता, उसी तरह माधुरी की हिन्दी-प्रियता का आकलन किए बग़ैर इसके सिनेमा-प्रेम और सिने-अध्ययन की इसकी विशिष्ट प्रविधि का जायज़ा नहीं लिया जा सकता।

इस विशिष्ट पद्धति की एक आख़िरी मिसाल। हम मुख्यधारा के फ़िल्म अध्ययन में कथानक को संक्षेप में कहते हैं, और जल्द ही काम के दृश्य के विश्लेषण पर बढ़ जाते हैं। लेकिन अरविंद कुमार ने बक़लम ख़ुद फ़िल्म को क़िस्सागोई के अंदाज़ में पेश किया। फ़िल्मों को शॉट-दर-शॉट, बआवाज़, शब्दों में पेश करने की पहल करके उन्होंने एक नई विधा को ही जन्म दे दिया, जो आप कह सकते हैं कि किसी हिन्दुस्तानी सिनेमची के हाथों ही संभव था। क्योंकि यहीं पर आपको ऐसे लोग बड़ी तादाद में मिल सकते हैं जो कि फ़िल्म देखकर आपसे तफ़सील से उसकी कहानी बयान करने को कहेंगे। ख़ास तौर पर उस ज़माने में, जब आप ये नहीं कह सकते थे कि देख लेना, टीवी पर आ जाएगा, या देता हूँ, है मेरे पास। इस क़दर विस्तार से सुनने के लिए, और कहने के लिए वक्ता-श्रोता के पास फ़ुर्सत का वक़्त होना भी ज़रूरी है। ये बात भी याद रखने की है कि आठवें दशक के उस दौर में एक मौखिक लोकाचार को अपनी पसंद की पुरानी फ़िल्मों को कहन शैली में ढालकर उन्होंने अपने चिर-सहयोगी और नए संपादक विनोद तिवारी का हाथ भी मज़बूत किया, कि संपादकी का संक्रमण-काल सहज गुज़र जाए, पत्रिका वैसी ही लुभावनी व ग्राह्य बनी रहे। धारावाहिक रूप में छपने वाली इस शृंखला में आदमी, प्यासा, महल, बाज़ी, देवदास, जैसी शास्त्रीय बन चुकी कई लोकप्रिय फ़िल्मों का पुनरावलोकन किया, और यह लेखमाला 'शिलालेख' के नाम से जानी गई।[32]

और भी बहुत कुछ ऐतिहासिक और दिलकश था माधुरी में, पर बाक़ी पिक्चर फिर कभी।

(इस लेख को सीएसडीएस व बाहर के कई गुरुओं-दोस्तों-सहयोगियों ने सुना-पढ़ा है। उनकी हौसलाअफ़ज़ाई का शुक्रिया - ख़ास तौर पर शाहिद अमीन, रवि वासुदेवन, आदित्य निगम, अभय दुबे, प्रभात, संजीव, विभास, भगवती, विनीत व सौम्या का. राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेखागार, पुणे की मददगार श्रीमती रचना जोशी व दीगर स्टाफ़ का भी बहुत-बहुत शुक्रिया. पंकज जी-वंदना राग तथा राजेश-संगीता व करुणाकर का विशेष शुक्रिया जिन्होंने मेरे पुणे-प्रवास को हर बार लज़ीज़ बनाया। मित्र पीयूष दईया को भी अनेकश: धन्यवाद कि मुझसे लिखवा लिया।)


[1] इधर फिर से फ़िल्मफ़ेयर और सिनेब्लिट्ज़ जैसी अंग्रेज़ी पत्रिकाओं के हिन्दी संस्करण आने लगे हैं, लेकिन नाम सहित पूरी सामग्री अनुवाद ही होती है। याद करें कि बंद होने के पहले कुछ समय तक माधुरी का नाम भी फ़िल्मफ़ेयर ही रहा था.

[2] हिन्दी फ़िल्म पत्रकारिता पर देखें ललित मोहन जोशी का सुचिंतित आलेख, ' सिनेमा ऐण्ड हिन्दी पीरियॉडिकल्स इन कॉलोनियल इंडिया: 1920-1947' जो मंजू जैन(सं.) नैरेटिव्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा, प्राइमस बुक्स, दिल्ली, 2009 में संकलित है।

[3] अमृतलाल नागर, ये कोठेवालियाँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2010.

[4] देखें इनकी आत्मकथाएँ: नारायण प्रसाद 'बेताब', बेताब चरित, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2002(मूलत: 1937 में प्रकाशित); कविरत्न पं. राधेश्याम कथावाचक, मेरा नाटक-काल: थिएटर के एक आदि व्यक्ति की आत्मकथा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004. तुलना के लिए आग़ा हश्र कश्मीरी के व्यक्तित्व व कृतित्व को देखा जा सकता है: अनीस आज़मी: आग़ा हश्र कश्मीरी के चुनिंदा ड्रामे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004, ख़ास तौर पर 'हयात और कारनामे', खंड 1. पारसी थिएटर में भाषा के मसले को लेकर देखें कैथरीन हैन्सन का अहम लेख, 'लैंग्वेजेज आन स्टेज: लिंग्विस्टिक प्लुरलिज़म ऐण्ड कम्युनिटी फ़ॉर्मेशन इन लेट नाइन्टीन्थ सेन्चुरी पारसी थिएटर', मॉडर्न एशियन स्टडीज़, वॉल्यूम 27, नंबर 2, (मई 2003), पृ. 381-405. हमारे अपने समय के बहुमाध्यमी लेखक स्वर्गीय मनोहर श्याम जोशी ने प्यार के इज़हार के लिए कसप में उर्दू शायरी और सिनेगीतों पर हमारी निर्भरता पर रचनात्मक टिप्पणियाँ की हैं। देखें इस विषय पर मेरा आलेख, 'कसपावतार में मनोहर श्याम की भाषा लीला', संवेद, फ़रवरी, 2007, पृ. 81-92.

[5] स'आदत हसन मंटो, दस्तावेज़ मंटो, (सं. बलराज मेनरा, शरद दत्त), खंड 5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995; उपेन्द्रनाथ अश्क, फिल्मी दुनिया की झलकियाँ, दो भाग, नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 1979; भगवतीचरण वर्मा, रचनावली, खंड 7 और 13, राजकमल प्रकाशन, 2008. दिलचस्प है कि इन तीनों अदीबों का त'आल्लुक रेडियो और सिनेमा से भी रहा, मंटो का बेशक सबसे ज़्यादा और गहरा।

[6] अरविंद जी हमारे समय के अथक और बेमिसाल कोशकार हैं - उनके वेसाइट http://arvindlexicon.com/3340/arvind-kumar-and-his-works/ पर तमाम तफ़सीलात और शब्दार्थ-खोज के विकल्प मौजूद हैं। उनकी जीवनी के लिए देखें, अनुराग की दो प्रस्तुतियाँ, http://lekhakmanch.com/2011/01/16/रुकना-मेरा-काम-नहीं और http://lekhakmanch.com/2011/01/17 लगन-से-किए-सपने-सच.

[7] हरीश तिवारी, 'फिल्मी गीतों में अश्लीलता सहनी ही पड़ेगी', सरगम का सफ़र, 2 मार्च, 1973.

[8] फ़िल्ल्लमेश्वर, 'किस्स्स्स्सा किस्स का', 22 सितंबर, 1967.

[9] अभी हाल में मशहूर सिने-चिंतक जयप्रकाश चौकसे ने शम्मी कपूर को गोया श्रद्धांजलि देते हुए कश्मीर में बनी फ़िल्मों को याद किया। देखें, उनके स्तंभ, 'पर्दे के पीछे', में छपा लेख, 'डल झील के आईने में यादें',दैनिक भास्कर, 8 सितंबर 2011.

[10] हमारे दौर में सिने-मनोरंजन टीवी-वीडियो और नक़ल करने की सहूलियतों के निहायत सस्ता और सहज-सर्वोपलब्ध हुआ है। मिसाल के तौर पर देखें मल्टीप्लेक्स के बरक्स 'खोमचाप्लेक्स' पर रवीश की यह रिपोर्ट:

http://naisadak.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html

[11] 30 जून, 1967 का अंक अच्छे सिनेमाघर के लिए चलाए गए आंदोलन का औपचारिक प्रस्थान-बिन्दु था‌।

[12] वैसे कुछ ठोस नतीजे भी निकले थे, ख़ासकर महानगरों में। मिसाल के तौर पर 'फिल्मक्षेत्रे' नामक स्तंभ में यह ख़बर छपी कि माधुरी में छपी शिकायत के बाद बंबई के पुलिस कमिश्नर ने नॉवेल्टी सिनेमाघर का एक दिन का लाइसेन्स रद्द कर दिया, 3 अगस्त, 1973.

[13] देखें धार्मिक फिल्म विशेषांक, 20 अक्तूबर, 1967

[14] ये लहर वैसे 70 के दशक में ज़ोर पकड़ती है, तभी माधुरी कहानियाँ लेकर भी आती है, मसलन, गोविंद मूनिस की हिमायत, रांगेय राघव की कहानी 'काका' के लिए, 6 जुलाई, 1973, और जयशंकर प्रसाद की कहानी 'गुण्डा' के लिए, 7 दिसंबर, 1973.

[15] 'सिनेमा और साहित्यकार' स्तंभ में सुमित्रानंदन पंत, 'जनरुचि का प्रश्न', 24 फ़रवरी, 1967. दुष्यंत कुमार, 'जब रामधारी सिंह दिनकर ने चेतना देखी', विजय बहादुर सिंह(सं), दुष्यंत कुमार रचनावली, खंड 4, किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.128-32.

[16] 'बलूचिस्तान से दिल्ली, दिल्ली से बंबई: लोकप्रिय लेखक गुलशन नंदा की लंबी कहानी', 21 अप्रैल 1967. माधुरी की यह साहित्यिक यात्रा दोतरफ़ा थी: शास्त्रीय से लोकप्रिय की और, तो उलट भी: मिसाल के तौर पर देखें 22 मई 1964 के अंक में छपा शशि बंधुभ का आलेख, 'फिल्मी गीतों में छायावाद'। यहाँ व्यंजना रंचमात्र भी नहीं, उल्टे प्रसाद व महादेवी के बरक्स शकील बदायूँनी के गीतों के मौजूँ उद्धरण हैं। हालाँकि माधुरी ने फ़िल्मी प्रतिमानों का साहित्यिक मख़ौल भी जब-तब उड़ाया। इस तरह वह अपने साहित्य में पगे दुचित्ता पाठकों को फ़िल्मों को लेकर निंदा-रसपान से पूरी तरह महरूम भी नहीं रख रही थी। मज़ेदार है कि उसी साल आगरा विश्वविद्यालय से ओंकारप्रसाद माहेश्वरी ने 'हिन्दी चित्रपट और गीति-साहित्य' पर अपनी पीएचडी हासिल की, जो 14 साल बाद, 1978 में जाकर इसी नाम से विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा से छपी। किताब के लिए मिले अनुदान की संस्तुति के लिए लेखक ने डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ओर डॉ. रामविलास शर्मा को शुक्रिया कहा है। देखें, प्राक्कथन, पृ. 4. इस अनूठी किताब की ओर ध्यान खींचने के लिए मैं तलत गीत कोश के संकलक, कानपुर निवासी श्री राकेश प्रताप सिंह का आभार मानता हूँ।

[17] 17 जून 1966.

[18] देखें एरिक बार्नोव व कृष्णास्वामी, इंडियन फ़िल्म्स, कोलंबिया युनिवर्सिटी प्रेस, न्यू यॉर्क व लंदन, 1963, पृ. 55-68. पी सी चैटर्जी, ब्रॉडकास्टिंग इन इंडिया, सेज पब्लिकेशन्स, 1987.

[19] एक ईमेलाचार में अरविंद जी ने बताया कि "राही मासूम रज़ा का छद्मनाम से एक स्थायी स्तंभ था माधुरी में। उस का काम था फ़िल्मजगत की अंदरूनी बातों पर मज़ेदार भाषा में लिखना। वह भाषा राही ही लिख सकते थे। उन्हीं की एक लेखमाला इसी स्तंभ में थी - 'हेमा मालिनी पर मुक़दमा'...यह इंदिरा गांधी पर चल रहे मुक़दमे की पैरोडी होती थी।"

[20] 30 जुलाई, 1965.

[21] महेनद्र सरल, 'कनक छरी-सी कामिनी', 12 जून 1966.

[22] 'अंधी कैंची, पैनी धार: भारतीय सेंसर पर एक चिंतनशील निर्देशक के विचार', 24 सितंबर, 1965.

[23] देखें मुकुल केशवन, 'उर्दू, अवध ऐण्ड द तवायफ़: दि इस्लामिकेट रूट्स आफ़ इंडियन सिनेमा', जो ज़ोया हसन(सं), फ़ोर्जिंग आइडेन्टिटीज़: जेन्डर, कम्युनिटीज़ ऐण्ड स्टेट, काली फ़ॉर विमेन, 1994, दिल्ली में संकलित है. अली हुसैन मीर व रज़ा मीर, ऐन्थेम्स आफ़ रेसिस्टेन्स: अ सेलेब्रेशन ऑफ़ प्रोग्रेसिव उर्दू पोएट्री, रोली बुक्स, नई दिल्ली, 2006, ख़ास तौर पर अध्याय 7: 'वो यार जो है ख़ुशबू की तरह, है जिसकी ज़बाँ उर्दू की तरह'।

[24] रविशंकर शुक्ल, हिन्दी वालो, सावधान!, प्रचार पुस्तकमाला, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1947.

[25] हिन्दी, अंग्रेज़ी व उर्दू में इस मसले के ऐतिहासिक विवेचन पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है। मिसाल के तौर पर देखें, आलोक राय हिन्दी नैशनलिज़म, ओरिएण्ट लॉन्गमैन, दिल्ली, 2000. फ़्रन्चेस्का ओरसीनी, द हिन्दी पब्लिक स्फियर, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2003. दिलचस्प ये भी है कि अपनी हालिया किताब प्रिन्ट ऐण्ड प्लेज़र: पॉपुलर लिटरेचर ऐण्ड एन्टरटेनिंग फ़िक्शन्स इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया (ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2009) में फ़्रन्चेस्का ने बताया है कि लोकप्रिय साहित्य व संस्कृति में भाषा-व्यवहार की वह हदबंदी नहीं दिखाई देती जो पढ़े-लिखों की दुनिया में थी। पारसी थिएटर और सिनेमा की ज़बान उसी दरियादिल जनपद से तो आ रही थी।

[26] 5 नवंबर, 1965.

[27] 22 अक्तूबर, 1965.

[28] मैं ये चर्चा आधुनिक हिन्दी के संदर्भ में कर रहा हूँ, जहाँ आकर भाषाएँ अलग-अलग रास्ते बनाने लगती हैं, और नाम को लेकर भी लफ़ड़ा शुरू हो जाता है, वरना इतिहासकारों में अब तो ये आम सहमति है कि जो भी वो ज़बान रही हो, उसका सबसे पुराना, मध्यकालीन नाम तो हिन्दी ही था। देखें, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, अर्ली उर्दू लिटररी कल्चर ऐण्ड हिस्ट्री, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2001. तारिक़ रहमान, फ़्रॉम हिन्दी टू उर्दू: ए सोशल ऐण्ड पॉलिटिकल हिस्ट्री, क्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, कराची, 2011.

[29] फ़िल्मफ़ेयर, 16 फ़रवरी, 1968.

[30] यह 'फ़िल्मेश्वर' कोई और नहीं, ख़ुद अरविंद जी थे, ये ईमेल में बताते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक बार कमलेश्वर ने उनसे कहा, कोई और नाम क्यों नहीं ले लेते, लोग समझते हैं कि फ़िल्मेश्वर मैं ही हूँ।

[31] इस लिहाज से 25 सितंबर, 1964 यानि शुरुआती दौर का संपादकीय 'राष्ट्रभाषा हिन्दी' काफ़ी संतुलित है, और हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी साहित्य व सिनेमा के संबंध को लेकर आशान्वित भी, लेकिन तब साहिर ने ये बात नहीं कही थी। एक और अहम बात यह कि अरविंद जी का मानना था कि उर्दू को लोग अब समझते नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने 'बर्क सी लहराई तो...गाने को लेकर एक सर्वेक्षण करवाया, बर्क का मतलब फ़िल्म उद्योग के लोगों से पुछवाया, अधिकतर को इसका मतलब पता नहीं था। उन्होंने साबित कर दिया भाषा वह चलेगी जो आसान हो, फिर वह चाहे उर्दू हो या हिन्दी, लेकिन बर्क जैसा शब्द नहीं चलेगा।' देखें, उनकी जीवनी वाला वेबपृष्ठ.

[32] मिसाल के लिए देखें 1 जुलाई 1977 का अंक, पृ. 15 : जिसका बैनर था - वी. शांताराम निर्देशित प्रभात चित्र, आदमी; हिन्दी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख * अरविंद कुमार द्वारा पुनरावलोकन.

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(लोकमत समाचार, दीपवली विशेषांक 2011 में पूर्व-प्रकाशित)

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