मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ज्योति सिन्हा का आलेख : संगीत चिकित्‍सा में सहायक राग के विशिष्‍ट तत्वों की भूमिका

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डॉ0 ज्‍योति सिन्‍हा लेखन के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। सांस्‍कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों की प्रगतिवादी लेखिका साहित्‍यिक क्षेत्र में भी अपने निरन्‍तर लेखन के माध्‍यम से राष्‍ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पत्रा-पत्रिाकाओं में अपनी सशक्‍त उपस्‍थिति दर्ज करवाती रही हैं। संगीत विषयक आपने पॉच पुस्‍तकों का सृजन किया है। आपके लेखन में मौलिकता, वैज्ञानिकता के साथ-साथ मानव मूल्‍य तथा मनुष्‍यता की बात देखने को मिलती है। अपने वैयक्‍तिक जीवन में एक सपफल समाज सेवी होने के साथ महाविद्यालय में संगीत की प्राघ्‍यापिका भी हैं ! आपको जौनपुर के भजन सम्राट कायस्‍थ कल्‍याण समिति की ओर से संगीत सम्‍मान, जौनपुर महोत्‍सव में जौनपुर के कला और संस्‍कृति के क्षेत्रा में उत्‍कृष्‍ट योगदान के लिए सम्‍मानित किया गया। संस्‍कार भारती, सद्‌भावना क्‍लब, राष्‍ट्रीय सेवा योजना एवं अन्‍य साहित्‍यिक, राजनीतिक एवं इन अनेक संस्‍थाओं से सम्‍मानित हो चुकी डॉ0 ज्‍योति सिन्‍हा के कार्यक्रम आकाशवाणी पर देखें एवं सुने जा सकते हैं। आप वर्तमान में अनेक सामाजिक एवं साहित्‍यिक संस्‍थाओं से सम्‍बद्व होने के साथ अनेक पत्रिाकाओं के सम्‍पादक मण्‍डल में शोभायमान है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में संगीत चिकित्‍सा (2010-12) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

संगीत चिकित्‍सा में सहायक राग के विशिष्‍ट तत्वों की भूमिका

डा. ज्योति सिन्हा प्रवक्ता- संगीत गायन विभाग भारतीय महिला पी. जी. कालेज जौनपुर

एवं

रिसर्च ऐसोसियेट 2nd spell भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला

संगीत मानव हृदय की राग-विरागमयी भावनाओ का मुखरित रूप है, मानव की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है, तथा इसकी उत्पत्ति उसी समय से मानी जाती है जिस समय से मानव ने अपने भावों को अभिव्यक्त करना शुरू किया था।

'नाद' और 'गीत' संगीत के ये दो मुख्य तत्व हमें प्रकृति से ही प्राप्त हुये हैं। नाद और गति के ही परिमार्जित रूप 'स्वर' और 'लय' के रूप में प्रस्फुटित हुये। स्वर और लय के व्यवस्थित रूप धारण करने पर जिस कला का प्रार्दुभाव होता है, वही 'संगीत' है। इसमें गायन-वादन-नृत्य तीनों का ही समावेश माना गया है। यथा शास्त्र-ग्रंथों में वर्णित है -

गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते1।।

( शारंग देव कृत 'संगीत रत्नाकर' )

संगीत का मुख्य आधार नाद है जिसके विषय में ग्रंथो में विस्तार से वर्णन मिलता है। भारतीय संगीत का मूलभूत उपकरण नाद अथवा संगीतोपयोगी ध्वनि ही है जो कि विज्ञान से भी सम्बन्धित है। संगीत ध्वनि विज्ञान की एक शाखा है जिसमें विविध मनोदशाओं की द्योतक राग-रागीनियां मनुष्य में रसानुभूति का संचार करती है, शारीरिक मानसिक व्याधियों से छुटकारा दिलाती हैं। संगीत के माध्यम से जो ध्वनि तरंगे उत्पन्न होती है वे स्नायु प्रवाह पर वांछित प्रभाव डालकर न केवल उसकी सक्रियता को बढ़ाती है वरन् विकृत चिन्तन को रोकती और मनोविकारों को मिटाती हैं। स्वर शक्ति के इस सृजनात्मक रोगोपचार, उपचारात्मक सामर्थ्य की ओर आज वैज्ञानिकों, चिकित्सकों का ध्यान आकृष्ट हुआ है। उनका मानना है कि संगीत में विद्यमान सूक्ष्म ध्वनि तरंगो का मनुष्य की मनोदशा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन ध्वनि तरंगों से शरीर की अन्तः स्रावी ग्रंथिया सक्रिय हो उठती है और उनसे रिसने वाले हार्मोन्स मानसिक स्थिति में परिवर्तन का स्पष्ट संकेत देते हैं।

भारतीय संगीत का इतिहास ऐसे कथाओं से भरा है जो कि इस बात की द्योतक है कि संगीत में रोगनिवारक क्षमता है। अतीत से ही संगीत का उपयोग मानव की भौतिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक दुर्बलताओं से मुक्त होने के लिये किया जाता रहा है। सामवेद में ही रोगों के निवारण के लिये साम गायन का विधान मिलता है। नारदकृत संगीत मकरंद, शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर, मतंगकृत बृहद्देशी, क्रोंच मुनी के ग्रंथ कुर्णक प्रभा, चरक संहिता, मैंद ऋषि के ग्रंथ शब्द-कौतुहल, अग्नि पुराण इत्यादि शास्त्र ग्रंथों में संगीत को रोगोपचार का मुख्य साधन बताया गया है।2

मध्यकाल में संगीत द्वारा अनेक चमत्कारिक प्रयोगों की कथायें, किवदतियां सुनने पढ़ने को मिलती हैं। आधुनिक काल में भी संगीतज्ञों ने कई चमत्कारिक कार्य किये।3

संगीत में निहित ध्वनि के विभिन्न स्वरूपों में आकर्षक ध्वनियों से रचित संगीत का सीधा सम्बन्ध मानव मन के सूक्ष्म एवं कोमल संवेगो से है। ध्वनि का विशेष रूप से किया गया संधात रासायनिक परिवर्तन पैदा करता है। इस प्रकार विभिन्न ध्वनियों के मिश्रण से निर्मित संगीत विभिन्न प्रकारों के भावों को निर्माण कर मानव मन व शरीर पर गहरा असर करता है। इसी प्रभावोत्पादक क्षमता का प्रयोग जब चिकित्सा रूप में शारीरिक व मानसिक संतुलन को व्यवस्थित रखने के उद्देश्य से किया जाता है, तो यह प्रभावात्मक प्रकिया Music Therapy अथवा 'संगीत-चिकित्सा' के नाम से जानी जाती है। अर्थात् संगीत की सुमधुर स्वर लहरियों से शारीरिक मानसिक विकार विकृतियों का उपचार ही 'संगीत चिकित्सा है'। यह कला और विज्ञान का समन्वय है। यह एक अर्न्तवैयक्तिक प्रकिया है जिसमें एक प्रशिक्षित संगीतज्ञ व संगीत चिकित्सकअपने मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार या उनके स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिएसंगीत या उसके-यथा शारीरिक, मानसिक , सामाजिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक व सौंदर्यात्मक सभी पहलुओं का उपयोग करता है।

संगीत-चिकित्सा का मूल यद्यपि भारतीय संगीत में है परन्तु पाश्चात्य देशों में इस पर विशेष प्रयोग एवं अनुसंधान होता रहा। 1870 में जब ग्रामोफोन की खोज हयी तब संगीत उपचार में गुणात्मक परिवर्तन हुआ। 19वीं सदी के उत्तरार्ध एवं 20वीं सदी के शुरूआत में युरोप में संगीत-चिकित्सा को बड़े सम्मान से देखा गया और इसका प्रयोग मानसिक रोगों को ठीक करने के लिये किया जाने लगा। इसके पश्चात् अवसाद एवं तनाव जन्य रोगों को दूर करने की प्रकृया चली। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका में इसकी लोकप्रियता में भारी अभिवृद्धि हुयी। संगीत-चिकित्सा का प्रयोग युद्ध से प्रभावित मनोरोगों की मुक्ति हेतु किया गया। संगीत-चिकित्सा के सकारात्मक परिणामों को देखते हुये 1944 ई0 में मिशिगन विश्वविद्यालय द्वारा संगीत-चिकित्सा का पाठ्यक्रम तैयार किया गया। और 1946 में कन्सास विश्वविद्यालय में आरम्भ किया गया। सन् 1950 में 'नेशनल एसोसियेसन फॉर म्यूजिक थेरेपी' ¼NAMT½ के स्थापित होने के पश्चात् संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान एवं अन्वेषण के कार्यों का विस्तार हुआ। अनेक विद्वानों ने अपनी पुस्तकों के माध्यम से संगीत-चिकित्सा की विशद् चर्चा प्रस्तुत की।4

अधिकांश चिकित्सकों ने भारतीय संगीत की प्रभावशीलता को जांचा-परखा एवं प्रयोग किया। संगीतज्ञ एन्ड्रयु वाटसन¼ANDREW WATSON½ के अनुसार ---- ''भारतीय संगीत में प्रयोग होने वाले राग संगीत चिकित्सा के मुख्य आधार हैं।'' 5 ''द हीलींग फोर्स ऑफ म्यूजिक'' के लेखक आर. मैकलीन ने स्पष्ट किया है कि -- ''भारतीय संगीत मानसिक शांति व सक्रियता लाने वाली दिव्य औषधि है जो हमारे तन-मन और भावना में नव जागृति भर देती है।'' 6

भारतीय संगीत चिकित्सा पद्धति के विषय में जैक्सन पाल ने अपनी पुस्तक 'संगीत-चिकित्सा' में विस्तार पूर्वक दिया है।

भारतीय संगीत का प्रधान वैशिष्ट्य 'राग'है। स्वरों की एक विशेष अवस्था राग कहलाती है। राग में कुछ ऐसे तत्व है जो राग की लक्ष्य पूर्ति 'रंजकता' में सहयोगी होते हैं। राग श्रोताओं के लिए चित्तवृत्ति का निर्माण करते हैं। यह ऐसी मधुर योजना है जिसको निश्चित् मधुर एवं विशेष स्वरों, विराम चिन्हों द्वारा इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है कि वह लालित्यपूर्ण, मधुर रंजक एवं भावोत्पादक हो। रागों की चर्चा अनेक ग्रंथो में मिलती है। आज भारतीय शास्त्रीय संगीत से मतलब 'रागदारी संगीत' समझा जाता है। स्वर एवं लय तो विश्व के किसी भी संगीत में मिल सकता है परन्तु राग की अवधारणा भारतीय संगीत की निजी विशेषता है। रागों की संकल्पना कुछ विशिष्ट तत्वों के साथ बंधी हुयी है। राग के विशिब्ट् तत्वों में स्वर, लय/ताल एवं पद अथवा बंदिश का विशेष महत्व है। रोगोपचार में इन विशिष्ट तत्वों की भूमिका निर्विवाद है। इन विशिष्ट तत्वों के उपचारात्मक प्रभावों को देखने-समझने से पूर्व यह समझना आवश्यक है कि संगीत से चिकित्सा से ये आयुर्वेद के अन्तर्गत होने वाला एक अंग है। चूंकि प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद है अतः हमारे महर्षियों, संगीताचार्यो ने संगीत से होने वाले प्रभाव को आयुर्वेदिक आधार पर ही विश्लेषित किया है। संगीत आर्युवेद तत्व के अनुसार हमारे शरीर को मदद करने वाली एक प्रणाली है। आर्युवेद के अनुसार शरीर के तीन स्तम्भ वात्, पित्त और कफ माने गये हैं।7 इनमें से यदि किसी भी एक में दोष अथवा विकृति आती है तो मनुष्य रोगी हो जाता है। स्वस्थ रहने के लिए जिस तरह उचित आहार की आवश्यकता होती है उसी प्रकार विहार के लिए ऋतु और समय के अनुसार विभिन्न प्रकार के राग-रागिनियों केा सुनना फलप्रद है।

जहां आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में सन्निपात, ज्वर, दमा, मधुमेंह, ह्दय रोग, टी. बी, पीलिया, मंदता आदि रोगों में मंत्रों से उपचार का उल्लेख हुआ है वही सामवेद में ऋचाओं के गायन द्वारा रोग मुक्ति महात्म्य बताया गया है। संगीताचार्य तुम्बरू ने 'संगीत स्वरामृत' में ध्वनि के विभिन्न प्रकारों को शरीर में होने वाले त्रिदोषों वात् पित्त व कफ के साथ क्या सम्बन्ध है, बताया है। यथा--

उच्च स्तरौः ध्वनिरूक्षो विज्ञेयः वातजाबुधै।

गम्भीरोधनशीलस्य, ज्ञातव्यः पित्तजो ध्वनीः।।

स्निग्धस्य सुकुमारस्य मधुरः कफजो ध्वनीः।

त्रयाणं गुण संयुक्त्तो विज्ञेयः सन्निपातजः।।8

अथार्त् उच्च स्तर के रूक्ष लगने वाले ध्वनि वात के होते हैं, गम्भीर गहरे धनशीलस्य ध्वनि पित्त के होते हैं तथा स्निग्ध भाव वाले सुकुमार और मधुर ध्वनि कफ के होते हैं। इन तीनों के संतुलन के लिए विभिन्न रागो का संयोजन कर मानव की प्रवृत्ति का सही निदान व उपचार किया जाना सम्भव है। आयुर्वेद व गन्धर्व वेद के नियोजन से ही पूर्व में संगीत द्वारा रोगोपचार की प्रकृया व्यवहार में थी और इसीलिए वैद्यों के लिए संगीत का ज्ञान आवश्यक था।

राग संगीत का मुख्य उपादान स्वर है। स्वर सात है। इन सात स्वरों में से पांच स्वर विकृत भी होते हैं अतः शुद्ध विकृत मिलाकर कुल 12 स्वर होते हैं। स्वरों के कोमल-शुद्ध अवस्था के आधार पर ही अंसख्य रागों का निमार्ण होता है। प्रत्येक राग में लगने वाले स्वरो पर ही उस राग का स्वरूप निर्भर करता है। शास्त्रों में स्वरों के रंग, देवता, वर्ण, कुल, ऋषि इत्यादि समस्त बातों का वर्णन है। साथ ही स्वरों के रस व स्वभाव का भी वर्णन है जिसका प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। रोगों की प्रकृति के अनुसार ही स्वरों के प्रयोग का वर्णन है अथार्त् कौन सा स्वर किस प्रकृति को दूर करता है। डा0 प्रेम प्रकाश जी ने संगीत के सात स्वरो के देवता उत्पत्ति स्थान तथा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताया है। इनके अनुसार-9

-षड्ज (सा)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान नाभि प्रदेश है, देवता अग्नि है तथा यह स्वर पित्तज रोगों का शमन करता है।

--ऋषभ (रे)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान हृदय प्रदेश है। इसके देवता ब्रह्मा है तथा यह स्वर कफ एवं पित्त प्रधान रोगों का शमन करता है।

--गान्धार (ग)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान फेफड़ों में है, देवता सरस्वती है तथा यह स्वर पित्तज रोगों का शमन करता है।

--मध्यम (म)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान कंठ है।इस स्वर के देवता महादेव हैं। यह स्वर वात और कफ रोगों का शमन करता है।

--पंचम (प)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान मुख हैं, देवता लक्ष्मी हैं तथा यह कफ प्रधान रोगों का शमन करता है।

--धैवत (ध)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान तालू एवं देवता गणेश हैं। यह स्वर पित्तज रोगों का शमन करता है।

--निषाद (नि)

इस स्वर का उत्पत्ति स्थान नासिका है। इसके देवता सूर्य है तथा यह स्वर वातज् रोगों का शमन है।

सात स्वरों के बारे में अबुल फजल ने कहा है कि निम्न जठर, गला और मास्तिष्क का शीर्ष-इन अंगों में भगवत प्रभाव से बाईस नाड़िया (रग) विस्तृत हैं। नाभि देश से वायु प्रवाह मनोहर गति से उत्थित होता है एवं इसकी विस्तार गत प्रकृति के आधिक्य या मंथरता के अनुसार यह आवाज जाग्रत होती है। अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार है -

1. षड्ञ (सा) मयूर की आवाज से प्रतिस्ठित हुआचतुर्थ नाड़ी से इसका अभ्यूदय।

2. त्रषभ (रे) पपीहा (चातक) की आवाज से सप्तदश से नवम् नाड़ी तक व्याप्ति।

3. गान्धार (ग) बकरे की आवाज से गृहीता नवम् से त्रयोदश नाड़ी तक व्याप्ति।

4. मध्यम (म) सारस की आवाज से गृहीत। त्रयोदश से सप्तदश नाड़ी तक व्याप्ति।

5. पंचम (प) कोयल के सुरीले कंठ से गृहीत सप्तदश नाड़ी से विशं नाड़ी तक व्याप्ति।

6. धैवत (ध) मेढ़क की आवाज से गृहीत। विशं से द्वाविशं नाड़ी तक व्याप्ति।

7. निषाद (नि) हस्ति की आवाज से परिकल्पित द्वाविशं से परवर्ती मंउली की तृतीय पर्यन्त।10

पं. अहोबल ने भी 'संगीत -पारिजात' में भारतीय संगीत की 22 श्रृतियों का मनुष्य के शरीर की 22 धमनियो से सम्बन्धित होने का वर्णन किया है।

इसी प्रकार सात स्वरों के रंग, प्रकृति, स्वभाव तथा उसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में संगीतज्ञों ने उल्लेख किया है। डा. जैक्सन पाल ने अपनी पुस्तक संगीत-चिकित्सा में इसका उल्लेख विधि पूर्वक विस्तार से किया है। तालिका से यह स्पष्ट है।11

क्रम सं.

स्वर नाम

रंग

प्रकृति/स्वभाव

शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव

1.

षड्ज

गुलाबी

चित्त को प्रसन्न करना/ठंढा

पित्त के रोगों को दूर करता है।

2.

ऋषभ

हरा (पीला मिश्रीत)

प्रसन्नता/ठंढा़ खुश्क

पित्त के रोगों को दूर करता है।

3.

गान्धार

स्वर्ण व नारंगी के समान

करूणा/ठंढा

पित्त के रोगों को दूर करता है।

4.

मध्यम

पीला (गुलाबी मिश्रीत)

चंचल/गर्म, खुश्क

वात व ्कफ प्रधान को दूर करता है।

5.

पंचम

लाल

जोशीला, उत्तेजक/खुश्क

्कफ प्रधान को दूर करता है।

6.

धैवत

पीला

प्रसन्नता, उदास/ गर्म, ठंढ दोनो विशेषताये

वात व ्कफ प्रधान को दूर करता है।

7.

निषाद

लाल

जोशीला/खुश्क ठंडा

वात को दूर करता है।

राग में प्रयुक्त स्वरों की संख्या के आधार पर रागों की जातियों का निर्धारण होता है।12 नारद ने अपने ग्रंथ 'संगीत-मकरंद' में इस बात का उल्लेख किया है कि किस जाति के राग का गायन किस फल की प्राप्ति के लिए किया जाना चाहिये। इनके अनुसार-आयु, धर्म, यश, बुद्धि-धान्य, फल, लाभ व संतान की अभिवृद्धि के लिए पूर्ण रागों का गायन करना चाहिये। संग्राम, रूप-लावण्य, विरह और किसी के गुण-कीर्तन की दशाओं में षॉडव रागों का गायन करना चाहिए तथा किसी व्याधि को दूर करने, शत्रु नाश करने, भय शोक में, किसी व्याधि या दारिद्रय कि संताप अथवा विषय ग्रह माचन के लिए, शारीरिक स्वास्थ्य व मंगल के लिए ऑडव रागों का गायन करना चाहिए।13

इसी प्रकार सात स्वरों से विभिन्न रसों की निष्पत्ति भी शास्त्रों में वर्णित है ।

नाट्य शास्त्र के प्रणेता महर्षि भरत के अनुसार सात स्वरों से रसों की निष्पत्ति इस प्रकार है-

सरोवीरेद्भुते रौद्रे धा वीभत्से भयानके।

कायोगनि तु करूण हास्यश्रृंगार्योमपो।।14

(नाट्यशास्त्र)

स्वर रस

षड्ज वीर, अद्भूत, रौद

ऋषभ वीर, अद्भूत, रौद

गान्धार करूण

मध्यम श्रृंगार, हास्य

पंचम श्रृगार, हास्य

धैवत वीभत्स, भयानक

निषाद करूण

शारंगा देव एवं दामोदर पंडित ने भी स्वरों से इन्हीं रसों की उत्पत्ति को बताया है। इसके साथ ही शुद्ध स्वरों एवं कोमल स्वरों के भिन्न-भिन्न प्रभाव होते है। विशेषतः शुद्ध स्वर संयोगा श्रृंगार, वीर इत्यादि रसों के वाहक होते हैं वहीं कोमल स्वर वियोग श्रृंगार, करूण एवं शान्त रसों के वाहक होते हैं। रागों के रस निर्धारण एवं प्रभावी बनाने में वादी स्वरों का विशेष महत्व होता है।

संगीत स्थित सात स्वरों में मध्यम, धैवत, निषाद वादीत्व या बहुत्व वाले राग वातज, विकार को दूर करते हैं। इनमें मध्यम एवं घैवत वादीत्व वाले राग वात के साथ ही कफ प्रधान रोगों पर भी अपना उपचारात्मक प्रभाव डालते हैं। जैसे- राग बहार, बागेश्री, भैरवी, बसंत इत्यादि। रागों का चयन करते समय राग की प्रकृति एवं रस का भी ध्यान देना आवश्यक है। वाज् विकार में राग का करूण रस अथवा श्रृंगार रस प्रधान होना आवश्यक है। इसके साथ ही समप्रकृति तालों को भी प्रयोग होना चाहिए यथा-झपताल, रूपक, झूमरा।15

षड्ज, ऋषभ, गान्धार वादीत्व वाले राग पित्त के कारण हुये विकार को दूर करते है। त्रषम वादी स्वर पित्त के साथ कफ विकार में भी प्रभावी हैं जैसे - राग खमाज, दरबारी कान्हर, बिहाग तथा पूर्वी थाट उत्पन्न गान्धारवादी वाले राग- पूर्वी, पूरिया, पूरिया कल्याण तथा यमन थाट से उत्पन्न गान्धार वादी वाले राग-यमन, भूपाली, इत्यादि पित्तज रोगों की चिकित्सा में प्रभावी है। इसके साथ श्रृंगार रस प्रधान तालों जैसे -तीन ताल, कहरवा, दादरा का ंसंगत आवश्यक है। कफ विकार की चिकित्सा हेतु वीर रस प्रधान स्वरों पंचम, ऋषभ, मध्यम व धैवत वादी वाले राग प्रभावी होते हैं। राग मालकौंस, काफी, केदार, तिलक कामोद, तथा भैरवी थाट के राग भैरव, र भैरव, विभास इत्यादि कफज विकार से उत्पन्न रोगों को दूर करते है। इनके साथ वीर रस प्रधान तालों का संयोजन प्रभावी रहेगा। जैसे - चौताल, एकताल, रूद्रताल इत्यादि।16

डा. गौर ने अपने लेख ''संगीत और आयुर्वेद'' में लिख है कि- '' कफ प्रकृति की मंद्ता में साम्यावस्था लाने के लिए ऋषभ वादी स्वर वाले राग को सुनाया जाये तो उसकी कफ प्रकृति ठीक हो जायेगी। पित्त एवं वात् प्रकृति वालों को साम्यावस्था में लाने के लिए कफ प्रकृति राग-रागीनियां यानि श्रृंगार रस के राग खमाज, तिलंग, देश इत्यादि सुनाने चाहिए।''17

वातादि दोष शरीर में समयानुसार कार्य करते हैं। दिन व रात्रि के चौबीस घंटों में कोई समय यद्यपि दो बार आता है अतः इन दोषों का प्रभाव भी दो बार देखा गया है। जैसे-वात् के काम करने का समय सुबह 3 से 7 बजे तक तथा सांय 3 से 7 बजे तक। कफ के कार्य करने का समय सुबह सात बजे से दोपहर 11 बजे तक तथा सांय 7 बजे से रात्रि के 11 बजे तक। पित्त के कार्य करने का समय दोपहर 11 बजे से 3 बजे तक तथा रात्रि 11 बजे से तीन बजे तक।

रागों के गायन समय पर यदि हम ध्यान दे तो वात के समय यदि सुबह 3 से 7 बजे तक गाये बजाये जाने वाले रागों में सुबह देशकार, हिंडोल, ललित तथा सायं काल में मुल्तानी, पुरिया धना श्री, मारवा, श्री इत्यादि राग गाये बजाये जात हैं। ये सभी राग उत्तरांग प्रधान है तथा इनमें ध-नी स्वर विशेष महत्वपूर्ण है। अतः आयुर्वेद के तत्व के अनुसार इन रागों को वात् समय पर गाने का विधान है। सुबह 7 से 11 व सांय 7 से 11 का समय कफ प्रधान रागों का समय है। सुबह के पुर्वांग प्रधान राग भैरव, अहिर, भैरव, रामकली इत्यादि तथा सायं काल में पूरिया, यमन, बिहाग इत्यादि राग कफ के समय पर गाये-बजाये जाते हैं।

दिन के 11 बजे से 3 बजे तथा रात्रि के 11 से 3 बजे तक जो राग गाये जाते हैं उनमें मध्यम या पंचम स्वर विशेष महत्वपूर्ण होता है। दोपहर के रागों में मधमाद सारंगा, वृन्दावनी सांरग, भीमपलासी इत्यादि राग तथा मध्य रात्रि में राग मालकौंस, बागेश्री व दरबारी कान्हरा गाये बजाये जात हैं। म व प गम्भीर धनशीलस्य के स्वर हैं तथा पित्त प्रधान हैं अतः इन्हें पित्त समय पर गाने बजाने का विधान है।1अतः रागों का समय के साथ निर्धारण हमारे शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों से अपने धनिष्ठ सम्बन्ध एवं उपचारात्मक प्रणाली को दर्शाता है जो पूर्णतंया वैज्ञानिक है।

श्री गोपाल कृष्ण भारद्वाज ने अपने लेख 'नाद साधना एक अभूतपूर्व अभियान' में लिखते है-''शास्त्रीय संगीत की रचना वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित है। शारीरिक मानसिक असंतुलन को स्वर विज्ञान के आधार पर उपयुक्त गायन के विधान से संतुलित किया जा सकता है।''18 विद्वानों का मानना है कि यद्यपि सभी राग रंजक होते हैं परन्तु यदि सही समय पर यदि वे गाये बजाये जायें तो उनके प्रभाव में दोगुनी वृद्धि हो जाती है। रागों की प्रकृति, रस भाव सम्बन्ध राग-रागिनियों से है तभी तो प्रातः काल भैरव, दोपहर में तोड़ी सायंकाल यमन और रात्रि में मालकौंस गाने की एक सुदृढ़ परम्परा शास्त्रों में वर्णित है। चिकित्सकों की राय में शरीर में प्रातः काल और सायंकाल ही अधिक शिथिलता रहती है जिसका मुख्य कारण प्रोटोप्लाज्मा की शक्ति का ह्मस होना है, कमी होना है। इस समय किसी कार्य को करने में खिन्नता व उद्विग्नता बनी रहती है। शिथिलता के कारण शरीर पर काफी दबाव पड़ता है। अतः प्रातः काल का संगीत शिथिल हुये प्रोटोप्लाज्म को नियमित करते हुये शरीर को स्फूर्ति एवं बल प्रदान करता है। प्रातः कालीन व सायं कालीन पूजा अर्चना के पीछे यह एक वैज्ञानिक कारण था जो मनुष्य को स्वस्थ बनाये रखता था।19

कार्डियो लॉजिस्ट डा. के. के. अग्रवाल के अनुसार-यदि आप रोज 20 मिनट मधुर संगीत सुने तो आपका ब्लडसर्कुलेशन यही होता है। संगीत की राग-रागिनियों का हमारे शारीरिक मानसिक व्यवस्था से गहरा ताल्लुकात है तभी तो दर्द के सुर हमें दर्द में डुबो देते है और खुशी के गीत आनन्द के सागर में डुबो देते हैं।20 संगीत के सुमधुर राग-रागिनयों से मानसिक स्वास्थ्य में बलता प्राप्त होती है। गायन व श्रवण से मनुष्य के भीतर आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन होते है जैसे हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, दुःख से आंखे भर आती है, व्यथा से दिल भारी हो जाता है। संगीत से हृदयगति, नाड़ीगति तथा मस्तिष्कीय तरंगों में परिवर्तन होते है।

नई दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के ' बॉडी, माइण्ड क्लीनिक में आने वाले मरीजों का संगीत चिकित्सा के माध्यम से इलाज किया जाता है। इस क्लीनिक के प्रमुख डा. रविन्द्र कुमार तुली का कहना है कि - मानसिक रोगों के मरीजो पर संगीत का चमत्कारिक असर होता है। संगीत मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, मांसपेशियों की उर्जा बढ़ाता है एवं श्वसन प्रक्रिया को नियमित करता है।21

इसी प्रकार क्लीव लैण्ड में की गई एक खोज के अनुसार आपरेशन के बाद धीमा व सुरीला संगीत सुनने से दर्द कम महसूस होता है तथा राहत प्रदान करता है। दिल्ली की शोधरत श्रुति ने अपने शोध में पाया कि शुद्धस्वरों से दिमागी बिमारियों, रक्तचाप, आपरेशन के बाद का दर्द, माईग्रेन, तनाव इत्यादि में आराम मिलता है।22 यौगिक साधना हेतु स्वरों के उच्चारण का स्थायी प्रभाव व उपयोगी हमारे प्राचीन ग्रंथो से प्राप्त होता है। स्वरों को साधने से चित्र की एकाग्रता कायम होती है। योग-साधना में स्वर की महत्ता को 'ब्रह्मबिंदुपनिषद' में इस प्रकार दशार्या गया है-

स्वरेण सन्ध्यवेद योगम्।।

अर्थात् योग की साधना स्वर से करनी चाहिये।23

स्वर साधना एक प्रकार का शरीरिक व्यायाम है जो स्वयं में एक चिकित्सा है। यह एक प्राणायाम है जिससे शरीर के समस्त अवयवों का व्यायाम हो जाता है। गाने से फेफड़े व स्वर यंत्र मजबूत होते हैं तथा दमा, तपेदिक इत्यादि फेफडों की बीमारी होने काडर नहीं रहता साथ ही संगीत का प्रयोग फेफड़े, गले, कंठ, तालु जबड़े व अमाशय का फलप्रद व्यायामहै। इससे नाड़ियों का शोधन होता है, ज्ञान तंतु सजग होते है,ं आक्सीजन की वृद्धि होती है। तथा दीघार्यु प्राप्त होती है, हमारे में आयुर्वेद उल्लेखित है कि एक अच्छा चिकित्सक स्वर विज्ञान का भी ज्ञाता होना चाहिए क्योंकि संगीत में रोग शामक एवं स्वास्थ्य वर्द्धक शक्ति नीहित है जिसका प्रयोग रोगोपचार में कियाजाना अभिप्रेत था।प्रत्येक स्वर शरीर के विशिष्ट स्थल से उत्पन्न होता है और वही स्वर उस स्थल की व्याधि या स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायी है। रेकी चिकित्सा पद्धति के अनुसार सात स्वरों का सम्बन्ध शरीर में स्थित सात चक्रों से बताई गई हैयोगदर्शन के अनुसार सात स्वर शरीर में स्थित चक्रों तथा बिदु- विसर्ग स्थान को झंकृत करते हैं जो इस प्रकार है-24

क्रमांक

स्वर का नाम

चक्र नाम

1.

षड्ञ (सा)

मूलाधार चक्र

2.

ऋषभ (रे)

स्वाधिष्ठान चक्र

3.

गान्धार (ग)

मणिपुर चक्र

4.

मध्यम (म)

अनाहद चक्र

5.

पंचम (प)

विशुद्ध चक्र

6.

धैवत (ध)

आज्ञा चक्र

7.

निषाद (नि)

बिन्दू विसर्ग

8.

तार षड्ज (संा)

सहस्त्राधार चक्र

इसीलिये मानव कंठ को शारीरीवीणा कहा गया है। हमारे शरीर को स्वस्थ रखने, आरोग्य तथा दीर्घायु प्रदान करने में इन चक्रों का विशेष महत्व है जिन्हें संगीत के स्वरों का द्वारा संतुलित रखा जा सकता है।

इसके आपसी सुसंवाद पर ही शरीर का स्वस्थ होना निर्भर है। रोगों में तानों के लेने का स्थान निर्दिष्ट हैं। वास्तव में यदि विशुद्ध उद्भव स्थानों की ताने यथा नाद, गमक, कंठ, जबड़े की ताने शुद्ध उद्रभव स्थानों यथा नाभि, छाती, कंठ, व मस्तिष्क से व्यक्त हों तो इनका स्वास्थ्य पर आश्चर्य जनक परिणाम होता हैं तथा प्रत्येक तान अपने उद्भव स्थान के प्रत्येक रोग के लिए श्रेष्ठतम औषधि का कार्य करती है।

इस संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. कृष्णा बिस्ट का कहना है कि - स्वामी नाद ब्रह्मानन्द जी जो सन्यास पूर्व उस्ताद अल्लादिया खाँ के शिष्य थे, अपने आश्रम के भीतर संगीत द्वारा चिकित्सा हेतु प्रशिक्षण केन्द्र खोला था। इन्होने विशिष्ट तानों के प्रकार से शरीर के विभिन्न अंगो के विकार दूर करने की प्रकिया बनाई थी।25

इसी प्रकार संगीत मार्तण्ड उस्ताद चाँद खाँ, औषधि से अधिक संगीत-चिकित्सा पर विश्वास करते थे। जैसे पाचन शक्ति में कमी हो तो कुछ विशेष प्रकार की गमक की तान, जुकाम से नाक बन्द हो जाय तो मुंह बन्द तान (ग्रंथो में उल्लेखित मुद्रित गमक सद्दश) आदि का अभ्यास करते थे और स्वस्थ हो जाते थे।26

स्वर तथा रागों का व्यक्ति के मनोभावों के साथ गहरा सम्बन्ध है। आचार्य भरत द्वारा प्रतिपादित रस सिद्धान्त इसी बात की पुष्टि करता है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से देखा जाये तो रस हमारे मनः स्थ्ति भावों को जाग्रत करते हैं। और ये भाव यथा क्रोध, मोह, खुशी, भय आदि शरीर में स्थित अन्तः स्रावी ग्रंथियों के स्राव की न्यूनता या अधिकता के कारण जाग्रत होती है। अतः संगीत शरीर के आन्तरिक अवयबों को प्रभावित कर शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु रखता है। भावो का उतार-चढ़ाव विशेष रूप से हमारे रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है और रक्त का प्रवाह विशेष रूप से हमारे मस्तिब्क की कार्य-प्रणाली को प्रभावित करता है।

राग के प्रभावी होने में रस भी भूमिका अति महत्वपूर्ण है। राग में रस निष्पत्ति उस राग में प्रयुक्त होने वाले स्वर, स्वरों की संगति, वादी-सम्वादी, अल्पत्व-बहुत्व, न्यास,-स्थायित्व, तार-मंद्र स्थिति के साथ ही कलाकार की व्यक्तिगत प्रस्तुतिकरण की शैली, काकू प्रयोग, बंदिशों के उपयुक्त चयन इत्यादि पर निर्भर है। इस विषय में डा.जैक्सन पाल का कहना है कि - ''प्रत्येक स्वर अलग-अलग रंग प्रभाव व स्वभाव रखता है और यही कारण है कि भिन्न-भिन्न रागों में भिन्न-भिन्न रस है, जिनका वर्णन आवश्यक है क्योंकि संगीत चिकित्सा का आधार यही है।28

संगीत चिकित्सकों जैसे भास्कर खांडेकर, डा. बाला जी ताम्बे, श्री शंशाक कटटी, टी. वी. साइंराम, इत्यादि ने संगीत-चिकित्सा को आयुर्वेद से जोड़कर की देखा है तथा प्रयोग भी इसी आधार पर कर रहे हैं। इनके अनुसार-यदि वात व पित्त के विकार से रोग उत्पन्न हुआ है तो उसे दूर करने के लिए श्रृंगार, शान्त व गम्भीर करूण रस प्रधान रागों का गायन करना चाहिए। जैसा कि विदित है कि पित्त की प्रकृति तेज एवं वात् की प्रकृति चंचल होती है अतः इन्हें विपरीत गुणों वाले यथा शान्त, करूण रसादि द्वारा ही दूर किया जा सकता है।

विद्वानो ने संगीत के प्रत्येक राग को किसी न किसी रस से सम्बद्ध माना है। राग भीमपलासी वीर रस से तथा मालकौंस का सम्बन्ध शान्त रस से है। बसंत, मधुऋतु के आगमन पर उल्लास व उत्साह की सृष्टि करता है तथा मेघ व मल्हार राग वर्षा ऋतु के आने पर अपनी खुशी प्रगट करता है। भैरवी के माध्यम से भक्ति तथा प्रेम की भावना को बल मिलता है। राग तोड़ी के स्वरों के कलात्मक उच्चारण में करूणा रस का आभास होता है। विरह की अभिव्यक्ति होती है। प्रातः कालीन भैरव राग में शान्त रस होता है। जोगिया तथा सोहनी राग विकल करते हैं। देश और सोरठ जैसे रात्रिगेय राग विरह तथा प्रेम का भाव पैदा करते है। रात्रीगेय राग दरबारी अपनी गम्भीरता से व्यक्ति में भावुकता पैदा कर देता है। संगीत के प्रत्येक स्वर में एक भाव होता है अतः रस निष्पत्ति के लिये स्वरों का सटीक उच्चारण मायने रखता है। पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने अपनी पुस्तक हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में रागों का वर्गीकरण करते समय रस का भी सामंजस्य किया है। यथा-29

रे-ध कोमल वाले संधि प्रकाश रागो में -शान्त व करूण रस

रे-ध शुद्ध वाले रागों में - श्रृंगार रस

कोमल रागनि. वाले रागों में - वीर रस

रागों में प्रयुक्त स्वर, स्वरों की शुद्ध व विकृत स्थिति, अन्तराल, गति, सप्तक भेद, भावानुरूप स्वरोच्चार पद्धति आदि अनेक विशिष्ट तत्व है जेा राग का एक निश्चित व्यक्त्त्वि, निश्चित आकार, निश्चित भाव व रस स्थापित करने में सहायक होते हैं। कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है-

बागेश्री- विरहोत्कंठिता नारी का सजीव चित्रण

गुणक्री -वासक सज्जा नायिका

तोड़ी - विरह दग्धा, विरहिणी

ललित- खंडिता नारी (वियोग श्रृंगार)

रागेश्री- विप्रलब्धा

बहार- उत्साही युवक

जोगिया - वेदना, करूणा से भरी स्त्री

सोहनी- आवेश युक्त प्रेम कलह से उग्र

भैरवी - अनेक रंग, भक्ति, करूणा, विरह, खुशी।

दरबारी - प्रौढ़, गम्भीर, राजसी व्यक्तित्व वाला

अड़ाना - चंचल, उत्साही युवक

मारवा- वेदना ग्रस्त पुरूष

मालकौंस- शान्त, सौम्य

हिंडोल -आवेश युक्त, उग्र, उदभट

खमाज -अनेक रूप, नखरीली, नार, मदमाती, वियोगिनी, विरहदग्धा।

इन रागों की प्रकृति-स्वभाव-रस के आधार पर ही इनका उपचारी रूप निर्भर करता है। राग विविध मनोदशाओं के द्योतक होते हैं और इसी कारण अपनी रस-भाव दशा के अनुरूप व्यक्ति व श्रोता में रसानुभूति का संचार कराने में सार्थक व सक्षम होते है।अनेक राग रोगो को दूर करने में सहायक सिद्ध हुये हैं। जैसे - भैरव कफ के रोगियों को लाभ पहुंचाता है। मल्हार, सोरठ व जयजयवन्ती शारीरिक उर्जा को बढ़ाते हैं, क्रोध शान्त करते हैं। राग आसावरी रक्त, कफ आदि रोगों को दूर करता है। भैरवी श्वास, दमा, सर्दी, एनफ्लुएंजा, क्षय रोग आदि को दूर करने में सहायक है। वात्, पित्त व कफ प्रकृति पर प्रभाव डालने वाले रागों का उल्लेख इस प्रकार है -30

राग का नाम रस/प्रकृति रागों मं सहायक

1. बिहाग करूण/गम्भीर कफ जन्य रोगों को

यमन करूण/अर्द्धगम्भीर दूर करता है।

2. भैरव शांत/गम्भीर

आसावरी श्रृंगार/गम्भीर पित्त जनित रोगों

भीमपलासी वीर/गम्भीर को दूर करता है।

बागेश्री श्रृंगार/गम्भीर

जौनपुरी श्रृंगार/अर्द्धगम्भीर

3. वृन्दावनी सारंग अर्द्धगम्भीर

कामोद अर्द्धगम्भीर त्रिदोषक रोगों

तिलक कामोद श्रृंगार/चंचल का शमन करता है।

राम कली अर्द्धगम्भीर वात् पित्त एवं

जयजयवन्ती श्रृंगार/करूण कफ तीनों में।

दरबारी कान्हरा गम्भीर

4. अल्हैयाबिलावल अर्द्धगम्भीर

हमीर उत्साह/अर्द्धगम्भीर

तिलंग श्रृंगार/चंचल कफ जन्य रोगों

देशकार श्रृंगार/चंचल का शमन

पूर्वी भक्ति/अर्द्धगम्भीर करते है।

शंकरा भक्ति/गम्भीर

सेहनी भक्ति/अर्द्धगम्भीर

5. पटदीप गम्भीर पित्तज तथा वातज

मुल्तानी श्रृंगार/करूण रोगों का शमन

अड़ाना श्रृंगार/चंचल करता है।

6. बहार श्रृंगार/चंचल पित्त जनित

तोड़ी श्रृंगार/विरह रोगों का

मारवा श्रृंगार/विरह शमन करता है।

किसी रोग क लक्षणों में दोष का निर्धारण किस प्रकार किया जाए इस विषय में महर्षि चरक ने विस्तार पूर्वक उल्लेख किया है। वात् विकार के बारे में उन्होने लिखा है- स्त्रंश, भेद, न्यास, भ्रंस कम्प, व्यथा, मुख शोध, शरीर या अंगों में शूल, शून्यता, संकोच, जकड़न इत्यादि कर्म वायु के होते हैं। इन लक्षणों से युक्त कोई भी रोग शरीर में उत्पन्न होता है तो वातज् विकार माना जाता है। पित्त विकार के बारे में लिखा है - दाह (सारे शरीर में जलन) उष्मता, शरीर में ताप की वृद्धि, स्वेदाधिक्य, खुजली, स्राव, लालिमा ये सब पित्त के लक्षण हैं और पित्त का जो रस, गंध, वर्ण होता है वह शरीर के विभिन्न अवयवों से उत्पन्न होता है। इन लक्षणों से युक्त जो रोग होगा उसे पित्तज विकार माना जाना चाहिए। कफज विकार में- श्वेत्पन, शीतपन, भारीपन, स्नेह, शून्यता तथा रोगों को चिर काल तक बनाये रखना कफ का कर्म है। इन लक्षणों से युक्त रोगों को कफज विकार के अर्न्तगत समझना चाहिए। संगीत चिकित्सा के लिए इन दोषों को देखना-जानना-परखना आवशयक है।31

राग चिकित्सा पर किये जा रहे शोध व अनुसंधानों के परिणाम स्वरूप यह बात सामने आई है कि राग भूपाली तथा तोड़ी उच्च रक्त चाप के रोगियों को आराम देते है। जबकि राग मालकौस तथा आसावरी निम्न रक्त चाप के रोगियों के लिए लाभ प्रद है।32 राग भैरवी मानसिक शिथिलता लाता है तथा सीजोफ्रिनिया के रोगियों को नीद लाता है। राग पूरिया अनिद्रा के रोगी केा लाभ पहुँचाता है।

राग सारंग पित्तनाशक है तथा क्षय एवं मिर्गी के रोगियों को राहत देने वाला है। राग गोरख कल्याण चिन्ता, तनाव व न्यूरोसिस के रोगियों को फलप्रद है। राग शिवरंजनी स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक है। अपने निश्चित स्वरूप व रस के कारण ही ये राग शरीर पर एक निश्चित प्रभाव डालते हैं तथा रोग विशेष में प्रभावी होते है। पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार मोजार्ट ¼High Frequncy Music½ व्यग्र लोगों में मन के वेग को कम करता है।33

ग्रेनेडा विश्व विद्यालय के शोध कर्ताओं ने यह साबित किया है कि संगीत चिकित्सा FIBROMYALGIA के साथ रोगियों के लिए जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। अवसाद चिन्ता, दर्द कम कर देता है।34

मुम्बई के अस्पताल व नागपुर के डाक्टरों की टीम ने संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में प्रशंसनीय कार्य किये है। ड्यूटी के दौरान दिल के दौरे पड़ने के बढ़ रहे मामलों के मद्देनजर बम्बई पुलिस ने तनाव घटाने के लिए संगीत का इस्तेमाल शुरू किया है।35

राग रिसर्च सेन्टर, चेन्नई में भारतीय रोगों पर शोध हो रहा है। डा., संगीतज्ञ व मनोचिकित्सक इस शोध कार्य में लगे हैं। अनेक भारतीय रागों में रोगोपचार की शक्ति नीहित है। यह व्यक्ति को तनाव तथा अवसाद से छूटकारा दिलाता है तथा उन्हें बेचैनी से शान्ति की ओर ले जाता है। चिकित्सा कर रहे संगीत चिकित्सकों का यह मानना है कि राग भैरवी से कफ जन्य बीमारियां दूर होती हे। राग आसावरी रक्त की अशुद्धियों का शमन करता है। राग मल्हार से क्रोध मानसिक अस्थिरता दूर होती है। श्वास सम्बन्धी बीमारी, तपेदिक, खंसी दमा आदि में राग भैरवी प्रभावी है तथा राग शिवरंजनी व हिंडोल से मेधा वृद्धि होती है।

रागों के चमत्कारी प्रभावों को पं. ओमकार नाथ ठाकुर जी ने प्रणव भारती में बताया है। स्वयं एक घटना का वर्णन करते हुये कहते हैं कि - एक दिन गुर्जरी तोड़ी का आहवान का कर रहा था तो तोड़ी के ऋषम-गान्धार की आलाप चारी करते- करते उन स्वरों को बार-बार छूते-छूते हृदय कुछ ऐसी अवस्था में पहुंच कर डूब गया कि सहज ही आंखों से अश्रु बहने लगा। ज्यों-ज्यों उन स्वरों का दिल पर असर होता गया, करूणा बढ़ती गई। घंटों तक यही अवस्था रही।36

स्पष्ट है कि स्वरों द्वारा रस की निष्पत्ति होकर राग मनुष्य पर अपना स्थायी प्रभाव डालता है। राग चिकित्सा के सन्दर्भ में परम पुज्य ओंमकार नाथ ठाकुर जी का जीवन दर्शन उजागर होता है। उन्होंने प्रत्येक राग का निश्चित प्रभाव, उसका लिंग, वय, स्वभाव प्रकृति, गति, स्वरूप की चर्चा विस्तार से की है। संगीत में स्वरों, रागों के प्रभाव के सन्दर्भ में मनोरमा शर्मा ने अपने शोध प्रबन्ध में शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा की है। उनके अनुसार स्वरों का प्रभाव विभिन्न रूपों में पड़ता है जैसे हृदयगति का बदलाव, श्वास की गति, शरीर का तापमान शरीर के चयापचय क्रिया की गति, शरीर के अन्तः स्रावी ग्रंथियो के स्राव में परिवर्तन, चित्त का परिवर्तन, व्यवहार का परिवर्तन तथा स्वभाव का परिवर्तन।37(Effects of music on human beings has been studied on aspects, like Physiological, changed , Psychological changes, Physical changes mental Therapy and general achievement ect.)

संगीत के प्रभावों केा विश्लेषित करते हुये स्वामी प्रज्ञानानन्द जी ने भी कहा है कि -

It should not be forgotten that music or musical culture is a true and surest means to purify the mind and the hearts……………… The sweet tunes of the tones of music bring concentration and meditation in ones life easily.38

प्राचीन षास्त्रों एवं ग्रथों में रागों का सम्बन्ध ऋतुओं से जोड़ा गया है। जिसके अनुसार कुछ रागों का सम्बन्ध ऋतुओं से इस प्रकार है-

राग का नाम ऋतु

मल्हार, देश वर्षा ऋतु, सावन

भैरव शिशिर ऋतु

बंसत, बहार बसंत ऋतु

काफी फागुन, होली

मालकौंस हेमन्त ऋतु

हिंडोल, सोहनी, ललित बंसत ऋतु

राग दीपक ग्रीष्म ऋतु

मेघ पावस

श्री राग शरद ऋतु

संगीत शास्त्रियों का इस प्रकार का वैज्ञानिक विश्लेषण इस बात की ओर संकेत करता है कि भारतीय संगीत मानव जीवन के कितना समीप है। जिसका उद्देश्य कल्याण कारी है तथा जो मानव देह के साथ ही मानव आत्मा को भी प्रभावित करता है।

भारतीय संगीत चिकित्सा दिवस (13 May) पर ललित नारायण मिथिला वि. वि. दरभंगा, बिहार में आयोजित संगीत विषयक गोष्ठी ''संगीत में इलाज की अद्भूत शक्ति'' पर व्याख्यान देते हुये मुजफ्फर पुर के वरिष्ठ प्रख्यात चिकित्सक निशिन्द्र किंजल्क ने कहा कि - भारतीय शास्त्रीय संगीत में विभिन्न रोगों के इलाज की अदभूत शक्ति है। तनाव जन्य बीमारियों जैसे - रक्त चाप, अम्लता, नींद सम्बन्धी समस्या, सिरदर्द, कब्ज, दमा, डिप्रेसन, हिस्टिरिया सहित सौ से अधिक बीमारियों का इलाज रागों के सही इस्तेमाल से सफलता पूर्वक किया जा सकता है।39

अनुसंधानरत संगीतज्ञों, चिकित्सकों का यह मानना है कि संगीत चिकित्सा के माध्यम से शरीर में एंडोर्फिन आदि लाभकारक रसायनों का स्राव बढ़ाकर और मस्तिष्क तरंगों पर नियंत्रण कर विभिन्न रोगों का इलाज किया जा सकता है। तथा इस पद्धति के माध्यम से एडस, कैन्सर, एल्जाईमर, टी. बी. आदि के मरीजों की तकलीफों केा कम करने, प्रसव पीड़ा कम करने के साथ-साथ आपरेशन के दौरान दी जाने वाली एनेस्थिसिया की मात्रा तक को कम किया जा सकता है। राग-चिकित्सा से न्यूरो हरमोन्स का स्तर बढ़ जाता है। और इससे प्राकृतिक तौर पर दर्द निवारण, मानसिक तनाव तथा विस्मृति दूर करने का प्रभाव होता है। अनुसंधानों में पाया गया कि ऐसे रोगियों में संगीत श्रवण से वैसा ही प्रभाव हुआ जितना कि 10 एम. जी. के बेलियम की गोली लेने से हुआ।40

मार्क राईजर एवं फ्लायर ने '' General of Music Therapy '' (1985) में अपने शोध पत्र में लिखा है कि संगीत के द्वारा तनाव हार्मोन के रूप में जाना जाने वाला 'कार्टीसोल' की मात्रा कम हो जाती है जिससे शरीर तनावमुक्त एवं शान्त हो जाता है तथा मांसपेशियों की जकड़न कम हो जाती है।41

किसी भी दशा में हम इस बात की उपेक्षा नहीं कर सकते कि संवेदन शील प्राणी पर गति का गहन प्रभाव पड़ता है। प्रायः घड़ी की निरंतर टिक-टिक थकावट एवं तंद्रा उत्पन्न करती है। गतिशील रेलगाड़ी की ध्वनि अनके याात्रियों के झपकी लेने में सहायक होती है। हिलते हुये झूले की गति बच्चे को शान्त कर निद्रामग्न कर देती है। मानव प्रकृति पर इस अपरिमित प्रभाव को देखते हुये उसके विवेक पूर्ण एवं कुशल प्रयोग से अनेक चमत्कार किये जा सकते हैं।

आयुर्वेद के सिद्धान्त के अनुसार वात्, पित्त, व कफ की प्रकृति प्रत्येक मनुष्य में भिन्न होती है। इन तीनों प्रकृति वाल मनुष्यों का गुण-धर्म भी अलग होता है जैसे कफ प्रकृति के हर हरकत आदि धीमें होते हैं जबकि पित्त के मध्यम गति में और वात प्रकृति वाले मनुष्यों की हर हरकत, हर कार्य में तेजी दिखाई देती है। अतः लय का सम्बन्ध भी प्रकृति से स्पष्ट रूप से है। लय के तीन प्रकार शास्त्रों में वर्णित है। विलंबित मध्य व द्रत। कफ प्रकृति की समानता बिलम्बित लय से है। दोनो की गति, प्रकृति व स्वभव धीमा है।पित्त व मध्य लय की समानता है, मध्यम एवं साधारण इसी तरह वात और द्रुत लय की हर हरकतों में तेजी या जल्दबाजी नजर आती है।

हमारे शास्त्रों में लय व ताल का सम्बन्ध शरीर स्थित षठ्चक्रों से बताया गया है जो साधक के शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक मानी गई है।संगीत की लय व हृदयगति के बीच सम्बन्ध के बारे में 'कार्नुसों' ने Music and your Emotin में उल्लेख किया है - ''भारतीय संगीत उपचार में अधिक कारगर हे। भारतीय संगीत की स्वर रचनायें ऐसी होती हैं जो हृदय की धड़कनों की लय एवं स्वर से सामंजस्य रखती हैं। कुछ विशेष रागों द्वारा हृदय की गतिविधियों के साथ संवेदना के सूक्ष्म स्तर को स्पर्श कर विकृतियों को दूर किया जा सकता है।''42

स्वर व लय/ताल का विशिष्ट प्रभाव व्यक्ति के मन व चेतन पर पड़ता है, प्रभावित करता है। धीरे-धीरे यह प्रभाव उपचार बन जाता है। स्वरो तथा लय की भिन्न-भिन्न प्रक्रिया उसकी शरीरिक क्रियाओं, रक्त संचार, मांस पेशियों आदि में स्फूर्ति उत्पन्न करते हैं तथा विशिष्ट व्याधियों से मुक्ति का कारण बनते हैं। लयों के उचित प्रयोग से राग विस्तार के समय शरीरिक व्यायाम भी होता है। बिलम्बित में बंदिश को खींच कर गाना पड़ता है जिसका प्रभाव स्वर वाहिनी नलिकाओं को खोलता व सुदृढ़ बनाता है। मध्यम लय की प्रतिक्रिया स्नायु मंडल, नाड़ी संस्थान, हृदय एवं रक्त वाहिनियों पर होती है। द्रुत लय के गायन में जीभ, कंठ, वक्ष, और हृदय का विशेष व्यायाम होता है। लय का स्वरूप स्नायुवों को बल देता है और जिन लोंगो के स्नायु कमजोर होते हैं या अनुभव करने की शक्ति कम हो जाती है उसे संगीत से नियंत्रित किया जा सकता है।

संगीत में रस निष्पत्ति में भी लय सहायक होती है। बिलम्बित लय में स्थैर्य एवं गाम्भीर्य होने के कारण शांत रस का संचार होता हे। मध्य लय में थिरकन होती है अतः हास्य, करूण, श्रृंगार व वात्सल्य रस से पूर्ण भावों का संचार करती है। द्रुत लय में चपलता आ जाने के कारण यह श्रृंगार, वीर, रौद्र व अद्भुत रस उत्पन्न करती है।

प्राचीन ग्रथों एवं प्रयोगों के आधार पर नौ रसों की उत्पत्ति किन-किन तालों के कौन सी लयकारी से हो सकती है वर्णित है-43

क्रमंाक

रस

ताल

गति/लय

1.

श्रृंगार

छः, सात और आठ मात्रा वाली तालें जैसे - दादरा, रूपक व कहरवा।

मंद, ललित और कोमल गति स्वछंद।

2.

करूण

सात मात्रा वाली तालें जैसे - रूपक

विलम्बित लय प्रधान, शिथिल गति युक्त।

3.

वीर

छस, बारह और चौदह मात्रा वाली तालें जैसे-सूल ताल, आड़ा चार ताल, चारताल।

गौरव गति से युक्त आवेग पूर्व लय

4.

भयानक

बारह व चौदह मात्रा वाली तालें जैसे- चारताल, धमार इत्यादि

भयत्रासित, स्वचलित गति युक्त मध्यलय

5.

हास्य

चार व पांच मात्राओं वाली तालें यथा प्राचीन एकताल, चक्रताल व द्रुत कहरवा इत्यादि

विषम और विक्षप्त गति

6.

रौद्र

बारह व चौदह मात्रा वाली तालें जैसे - चारताल, धमार आदि।

अतिद्रुत लय युक्त प्रचंड गति

7.

वीभत्स

अनियमित मात्राओं वाला कोई भी सम विषम ताल स्वरूप

संकोच गति युक्त अनयंत्रित लय

8.

अद्भूत

ग्यारह, पन्द्रह, व सोलह मात्रा वाली तालें जैसे - तीन ताल, रूद्र , गजझंपा इत्यादि

आश्चर्य गति प्रधान लड़खड़ाती लय

9.

शांत

बारह और चौदह मात्राओं वाली तालें जैसे- एकताल व झूमरा।

स्थिर व अंचचल गति

इससे यह भी स्पष्ट है कि एक ही ताल अलग-अलग लय में बजाये जाने पर अलग-अलग रस उत्पन्न करने में सक्षम है।

डा. सुरेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने 'संगीत का सौंदर्य शास्त्र' लेख में लिखा है कि - विभिन्न लयों द्वारा विभिन्न भावों की अभिव्यक्ति भी प्रगाढ़ होती है। उदाहरणार्थ- शोक एवं कारूणिक भाव का प्रकाशन विलम्बित लय में जहां प्रभावकारी होता है वहीं उत्साह व उमंग के भावों को द्रुतलय द्वारा प्रभाव शाली रीति से अभिव्यंजित किया जा सकता है। इसी प्रकार निर्वेद भाव की अभिव्यंजना के लिए मध्य लय सर्वोत्तम मानी गई है।44

इन तीनों लयों का शरीर पर पड़ने वाले चिकित्सकीय प्रभावो की चर्चा जैक्सन पाल ने अपनी पुस्तक में भी की है। उनके अनुसार - ''यदि पित्त का रोग हो तो ताल की गति धीमी होनी चाहिए। इससे हृदय की गति ठीक होगी। वात प्रधान रोगों में भी ताल की गति चंचल, द्रुत रखनी चाहिए। इससे रोगी के रक्त संचार में वेग, तीव्रता आयेगी।45 लय के साथ ताल का महत्व विशेष मायने रखता है। प्रत्येक ताल अपने छन्द, वादन शैली व गति भेद के कारण पृथक-पृथक रस की सृष्टि करता है। तीन ताल के द्वारा श्रृंगार, करूण, वात्सल्य आदि रसों को, तिलवाड़ा शान्त रस का, आड़ा चारताल, शांत, भक्ति व वीर रस का, झूमरा, दीप चन्दी श्रृंगार रस, झपताल से श्रृंगार एवं करूण रस तथा चारताल, सूलताल, तीव्रा इत्यादि वीर, शान्त, भक्ति, श्रृंगार आदि रसों का संचार करते हैं। दादरा, कहरवा, रूपक इत्यादि ताले श्रृंगार रस को उद्दीप्त करती हैं। गायन की विभिन्न शैलियों के प्रकृति के अनुरूप ही वाद्यो का निर्माण एवं संगति होती रही हैं। वीर रस के लिए नगाड़ा, ढोल, मृदंग, पखावज आदि वाद्य तथा श्रृंगार रस के लिए तबला, ढ़ोलक, नाल इत्यादि वाद्य उपयुक्त हे। संगीत में स्वर व लय का संयोजन, पद के सहयोग से उस राग के अनर्तनीहित भावों व अथरें को उजागर कर देता है। तबला वादक मुस्तफा हुसैन तालों के माध्यम से संगीत-चिकित्सा का प्रयोग कर रहे हैं। इनका मानना है कि सूरों की लयबद्धता व उतार-चढ़ाव को कम ज्यादा कर साधारण या गम्भीर बीमारी में राहत दी जा सकती है। अलग-अलग ताल शरीर में अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पैदा करते हैं। विभिन्न प्रकार के वाद्यों को प्रभाव विभिन्न व्यक्तियों पर विभिन्न रूपों में पड़ता है जैसे-ढा़ेल की आवाज किसी के मस्तिष्क को शांत कर सकती है तो कितने ही उत्तेजित हो जाते है।46

इसी प्रकार बैंड के साथ बिगुल का स्वर मन में उत्साह व चंचलता भर देता है। बिगुल बजाने से उत्पन्न कम्पन हमारे आस-पास के वातावरण से बैक्टीरिया एवं जीवाणुओं को खत्म कर देता है। नगाड़े की लयात्मक ध्वनि हमारे रक्तचाप को नियंत्रित करने और मन को उल्लास से भर देने में सक्षम है।

अतः ताल व लय का प्रभाव रोगी पर निश्चित रूप से पड़ता है। विद्वानो ने संगीत चिकित्सा के समय रोगी की स्थिति के अनुकूल ताल के चयन को प्राथमिकता दी है। वात् प्रकृति कें गुण चंचलता को कम करने के लिए शांत रस प्रधान तालों का चयन करना चाहिए जैसे - रूपक, झूमरा, एक ताल (मध्य)इत्यादि। पित्त को साम्यावस्था में लाने हेतु श्रृंगार रस प्रधान तालोंका चयन करना चाहिए जैसे -दादरा, कहरवा, तीन-ताल , दीपचन्दी, धुमाली इत्यादि। इसी प्रकार कफ प्रकृति प्रधान रागों को दूर करने हेतु वीर रस प्रधान तालों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

संगीत चिकित्सा करते समय संगीत चिकित्सक को यह ज्ञात होना चाहिए कि किस प्रकार के रोग हेतु किस ताल का चयन किस लय में होना चाहिए। रोग की प्रकृति के अनुसार ही सही राग का चयन कर उसे उपयुक्त लय-ताल में रोगी को सुनाना चाहिए।

प्राचीन ग्रंथो में मनुष्य की प्रकृति के साथ ही लय-ताल का तादात्म्य स्थापित किया गया है। पं. भगवत शरण शर्मा ने अपने लेख 'संगीत, कला, और सौंदर्य में लिखा है कि - '' प्रत्येक रस में प्रत्येक लय का प्रयोग नहीं किया जा सकता। शोक की अवस्था में मनुष्य के चलने फिरने, कार्य करने तथा बोलने तक की गति मंद हो जाती है। अतः करूण रस के परिपाक के अनुकूल लय विलंबित है। हास्य व श्रृंगार के लिए मध्य लय तथा वीर, अदभूत, रौद्र तथा अद्भूत रसों के लिये द्रुत लय को उपयुक्त माना गया है।47

प्राचीन काल में युद्ध के समय भेरी, दुन्दुभी, भूमि दुन्दुभि इत्यादि वाद्यो का प्रयोग सैनिकों में उत्साह पैदा करने के लिए किया जाता था। समरगान व समर नृत्य का आयोजन इसी हेतु किया जाता था।

संगीत चिकित्सा के अर्न्तगत राग को प्रभावी बनाने में बंदिशो में मिलने वाले साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान गौण होते हुये भी गायन के समय स्थान अवश्य है राग से रस निष्पत्ति में इन बन्दिशों का महत्व निर्विवाद है। भावों के आलम्बन विभाव के रूप में इनकी महत्ता है। शब्दों से अर्थ बोध होता है तथा दो चार लाईन केी रचनाओं से ही श्रोता एक चित्र का निार्मण कर लेता है। स्वर का महत्व विशेष होते हुये भी पद/बंदिश के माध्यम से रागों का रूप सामान्य श्रोता को प्रभावित करत है। अर्थमूलक शब्द जब गाये जाते है तो उसकी प्रेषणीयता में कई गुना वृद्धि हो जाती है। मध्यकालीन संतो ने अपनी प्रचार प्रक्रिया को समर्थ, सजीव व मानव हृदय की गहराई तक पहुचाने के लिए अपने पदों को संगीतमय रूप दिया था। सूरदास व तत्त्कालीन कवियों ने विनय के पदों में विलावल, बागेश्री, आसावरी करूण प्रसंगों में तोड़ी, गुणकली श्रृगांर प्रसंगो में मालकौंस, हमीर तथा उल्लास विनोद के प्रसंगो में काफी, जयजयवन्ती, मल्हार, भैरव, वसन्त आदि रागों को प्रयोग किया। रागो के समय के साथ साहित्य के शब्दों का चयन भी रहा। जैसे-शाम के रागों में - ''शाम भई घनश्याम न आये'' तथा ''एरी आली पिया बिन'' तथा प्रातः कालीन रागो में ''जागो मोहन प्यारे-(भैरव)'' ''रैना बीती भोर भयी रे'' (भैरव) तथा ''सगरी रैन के जागे'' - (रामकली) जैसे पद्र अपनी सार्थकता से उचित रस-भाव उत्पन्न कर मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिए अतयंत अपेक्षित प्रतीत होता है।

रसो के अनुकूल पदों की भी रचनाये हुयी। जैसे -श्रंगार रस की प्रमुख रचना राग कामोद्र का छोटा ख्याल - ''जाने न दूंगी'' तथा राग सूहा सूघराई की द्रुत रचना - बलमा रे चुनरियां मैका लाल रंगा दे'' संयोग श्रृंगार की अवस्था का सुन्दर उदाहरण है।48

अन्य बंदिशों में, राग सोहनी की बंदिश - ''ऐरी यशोदा तोसे कंरूगी लड़ाई'' आवेश युक्त खिन्नता को प्रगट करती है। राग सूर मल्हार की रचना - ''बादखा बरसन आये'' उत्साह-उमंग से भरी बंदिश है। स्वर की तारता, तीव्रता एवं ताल की द्रुत गति इस राग व पद के सौंदर्य को बढ़ा देती है। राग तोड़ी की रचना - ''लंगर कांकरिया जिन मारो रे'' विवशता को दर्शाती है। बागेश्री की द्रुत रचना - एहो धाय-धाय गर लागूं'' संयोग रस की अद्भूत सृष्टि करती है। राग बिहाग की रचना ''कान्हा जारे-जारे सांवरिया'' संयोग श्रृंगार का तथा मारू बिहाग की द्रुत रचना ''पिया माने ना'' पद की सार्थक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं।

ठुमरी की कुछ रचनायें श्रोता के मन पर अमिट छाप छोड़ती है। खमाज की ठुमरी - ''कौन गली गये श्याम', पहाड़ी की ठुमरी- 'अबके सावन घर आजा'' तथा भैरवी की ठुमरी - ''आये ना बालम का करूं सजनी'' मन में भाव का संचार करती है।49

सुगम संगीत के अर्न्तगर्त पद की महत्ता और अपनी सार्थकता से श्रोता को भाव विभोर कर देते हैं। गजल के शब्दों की महत्ता निर्विवाद हे। भजनों का गाम्भीर्य एवं माधुर्य समझा भी गया।

आज जो सबसे प्रचलित शैली है वह है- फिल्म संगीत/चलचित्र में विशेष रस-भाव, स्थिति-परीस्थिति को उभारने के लिए संगीत का प्रयोग किया जाता रहा है। चलचित्र संगीत में राग-ताल-भाव-रस सभी का समुचित सामंजस्य रखा गया। प्रारंभ में ज्यादातर गाने किसी न किसी राग में निबद्ध रहे। कहानी के अनुरूप गीत, गीत के शब्द, रस-भाव सभी उच्च स्तरीय रहे। कुछ गीतों के बोल एवं राग यहां निदिष्ट हैं-50

क्रमांक

राग का नाम

गीत के बोल

गायक

फिल्म का नाम

1.

राग अहिर भैरव

पूछो न कैस मैने

मन्ना डे

मेरी सूरत तेरी आंखे (1963)

   

मेरी बीना तुम बिन

लता मंगेशकर

देख कबीरा रोया (1957)

2.

राग कलावती

हाय रे वो दिन क्यूं न

लता मंगेशकर

अनुराधा (1960)

   

कोई सागर दिल केा

मोहमद्द रफी

दर्द लिया दर्द दिया (1966)

3.

राग काफी

अफसाना लिख रही हूं

उमा देवी

दर्द (1947)

   

बिंदिया चमकेगी

लता

दो रास्ते (1969)

4.

राग केदार

हमको मन की शक्ति

वाणी जयराम

गुड्डी (1971)

5.

राग खमाज

तेरे मेरे मिलन की

किशोर - लता

अभिमान (1973)

   

ओ सजना बरखा

लता

परख (1960)

6.

राग गारा

मोहे पनघट पे

लता

मुगले आजम (1960)

7.

राग जयजयबन्ती

जबसे बलम घर

लता

आवारा (1951)

8.

राग तोड़ी

रैना बीत जाए

लता

अमर प्रेम (1971)

9.

राग दरबारी

तोरा मन दरपन

आशा

काजल (1965)

   

ओ दुनियां के रखवाले

मोहमद्द रफी

बैजुबावरा (1952)

10.

राग दुर्गा

कोरा कागज था ये मन

लता-किशोर

आराधना (1969)

11.

राग नंद

तु जहां-जहां चलेगा

लता

साया (1966)

12.

राग पहाड़ी

चौदवीं का चांद हो

मोहमद्द रफी

चौदवीं का चांद (1960)

13.

राग नट भैरवी

ढूंढ़ों-ढूंढ़ों रे साजना

लता-उषा

गंगा जमुना (1961)

14.

राग मिश्र पीलू

ना मानू-ना मानू

लता-उषा

गंगा भईया तोहे पियरी चढ़इबो (1962)

15.

राग भीमपलासी

नैनो में बदार छाये

लता

मेरा साया (1966)

   

मेघा छाये आधी रात

लता

शर्मीली (1977)

16.

राग भूपाली

रसिक बलमा

लता

चोरी-चोरी (1959)

17.

भैरवी

तुम्हीं हो माता-पिता

लता

मैं चुप रहूंगी (1962)

   

लागा चुनरी में दाग

मना डे-लता

दिल ही ता है (1963)

इन गीतों के बोलों का महत्व इतना है कि आज भी लोगों की जबान पर बरबस ही आ जाता है। जो लोग शास्त्रीय संगीत में कम रूचि रखते हैं उनके लिये यें गीत विशेष मायने रखते हैं। गीतों के माध्यम से हर घर में राग-रागीनिया विद्यमान है।

अंतिम गायन शैली लोक संगीत है। जिससे भावपक्ष प्रबल है। आज अनेकों ऐसे अनपढ़ ग्रामीण हैं जिन्हें अक्षर ज्ञान नहीं है परन्तु राम चरिज मानस के पद तथा सूर व कबीर के दोहे कंठस्थ हैं। मंदिर में भजन-कीर्तन के दौरान ये घंटों भावपूर्ण गायन करते हैं। लोकगीतों के अर्न्तगत श्रम गीतों का सम्बन्ध वैज्ञानिक दृष्टि कोण से स्वास्थ्य से पूरी तरह सम्बन्धित है। कोल्हू चलाने, निराई-बोआई करने, जाँता पीसने, ढ़ेका चलाने, धान कुटने के समय गाये जाने वाले गीत निश्चित रूप से संगीत-चिकित्सा का महत्वपूर्ण अंग है।

समाज में रहने वाले भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की रूचि भी भिन्न-भिन्न होती है। कोई शास्त्रीय संगीत पसन्द करता है, कोई लोक संगीत तो कोई फिल्म संगीत। संगीत चिकित्सा के दौरान मरीज के पसन्द व नापसन्द का जानना इस चिकित्सा पद्धति में अनिवार्य है। लंदन के 'साईकोलॉजी आफ म्यूजिक जर्नल' में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जिन्हें 'रॉक' पसन्द हैं उन्हें सामाजिक गतिविधियों को बोध होता है। जो 'पॉप' सुनते हैं वे भावुक होते हैं। शास्त्रीय संगीत पसन्द करने वाले सुस्त पर बुद्धिमान होते हैं। संगीत की रूचि के आधार पर दूसरों के व्यक्त्त्वि को समझा जा सकता है।51

मनोचिकित्सक आरती आनन्द बताती हैं कि संगीत हमारे मनोभावों को व्यक्त करता है। खुशी के अवसर पर हम थोड़ा तेज संगीत सुनना पसन्द करते हैं परन्तु दुःख की घड़ी में धीमा संगीत हमारे उदासमन को दर्शाता है। संगीत सुनने से तनाव कम होता है और मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। अकले हैं तो संगीत सुने उदास हैं तो गीत गुन-गुनाये।52

राग संगीत के अर्न्तगत पद की, बंदिशों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये आचार्य बृहस्पति ने कहा है कि - ''राग में भाव-प्रकाशन की शक्ति सीमित है परन्तु है अवश्य। केवल राग से हम भाव विशेष की सृष्टि तो कर सकते हैं परन्तु भाव का उतना परिपाक केवल इससे सम्भव नहीं जिससे हम रसानुभूति की अवस्था तक पहुंच सके। भाव बोधन में भाषा का संयोग राग की सीमित शक्ति को अपना अंग बनाकर अपने बल में वृद्धि करता है और राग गीत का अनिवार्य अंग बनकर रस परिपाक में एक सुन्दर उपकरण बन जाता है।53

राग प्रस्तुतिकरण में भाव पक्ष एवं कला पक्ष दोनो का महत्व है क्योंकि ये दोनो ही रस सृष्टि के आधार है। सभी मिलकर उपचारी प्रभाव डालने में सक्षम होते है।

जिस प्रकार सुरीले मनभावन संगीत का मानव मस्तिष्क पर अनुकूल तथा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार बेसुरे, अत्यंत शोर गुल वाले, विवादी स्वरों से भरपूर संगीत का मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव भी अवश्यम्भावी है। मस्तिष्क विशेषज्ञों का मानना है कि तीव्र तीक्ष्ण आवाज का मन पर बहुत भयंकर प्रभाव पड़ता है, पेशियों की शक्ति क्षीण होती है, श्रवण शक्ति नष्ट होती है। प्रतिकूल संगीत का शरीर के अन्तः स्रावी त़ंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस विषय में संगीत चिकित्सक भाष्कर खाण्डेकर जी का कहना है कि - ''हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग तरीके का संगीत सुकून देने वाला हो सकता है। मन पसन्द संगीत सुनने से मनोरंजन होता है, लेकिन ऐसा संगीत जिसे हम पसन्द नहीं करते हैं उसको सुनने से तनाव बढ़ भी सकता है।''54

उत्तेजक ध्वनि तंरगों का प्रवाह अगणित समस्याओं को जन्म दे सकता है। आज कल शादी-विवाह या अन्य अवसरों पर तेज ध्वनि में बज रहे डीजे से शरीर व मन पर पड़ रहे प्रभावों के बारे में चिकित्सको यह मानना है कि - ''डीजे की तेज ध्वनि हृदय रोगियों के लिए कुछ ज्यादा की खतरनाक साबित हो सकती है। यहां तक की उनकी जान जाने का भी खतरा हो सकता है। कानफोडु ध्वनि से नामर्ल इन्सान भी ब्लड प्रेशर का मरीज हो सकता है।''55 वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डा. हरेन्द्र सिंह ने बताया कि - '' एक आम आदमी 20 से 20 हजार हर्टज तक की आवाज सुन सकता है लेकिन 500 से 700 हर्टज की ध्वनि उसे सुकून पहुंचाती हे। अतः तेज ध्वनि से दिल की बिमारी, ब्लड प्रेशर, व मधुमेह के रोगियों केा दिक्कत हो सकती है। गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है।56

लंदन के 'साइकोलॉजी ऑफ म्यूजिक' जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार - 'खराब संगीत सिर्फ मन और मिजाज ही नहीं रिश्ते भी खराब कर सकता है। सगीत का यौन आकर्षण से सीधा सम्बन्ध होता है। ऐसे में लोग अगर खराब संगीत सुनते हैं तो उसका असर रिश्तों पर भी पड़ सकता है।57

अतः संगीत चिकित्सा जहां शारीरिक लाभ व आरोग्य प्रदान करती है वहीं इसका गलत ढंग से इस्तेमाल नुकसान दायक भी हो सकता है। मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ चिकित्सक डा. निशिन्द्र किंजल्क ने राग-रागिनयों से होने वाली चिकित्सा को गम्भीरता पूर्वक अपनाये जाने पर बल देते हुये कहा कि -''इस पद्धति में किसी राग को सुन भर लेने से फायदा नहीं होता। इसमें रागों के प्रकार, उनकी ताल, मात्रा, उसमें प्रयुक्त छंद , संगत वाद्य यंत्र, गायक-गायिकाओं के स्वरों की क्षमता, विशेषता, तथा साथ ही रोगी की स्थिति रोग की तीव्रता, रोगी की शारीरिक-मानसिक स्थिति आदि कई बिन्दुओं का ध्यान रखकर ही इलाज के उचित प्रकार का चयन करना पड़ता है अन्यथा हानि भी हो सकती है।''58

लाभकारी संगीत वही है जो मधुर एवं मृदुल है। यदि इसे भावनाओं, संवेदनाओं से प्रस्तुत किया जाये तो इसका परिणाम न केवल गाने-सुनने वाले के लिए वरन् सम्पूर्ण परिवेश को श्रेयस्कर परिस्थितियों से भरा-पूरा करने में सहायक हो सकता है।

संगीत चिकित्सा के अर्न्तगत राग एवं उसके विशिष्ट् तत्वों के निर्धारण व चयन के समय कुछ विशेष महत्वपूर्ण बातों को जानना आवश्यक है -

1. रोगी की चिकित्सा गायन से अथवा वादन से।

2. गायन पुरूष की आवाज में या स्त्री की ?

3. वाद्य यंत्र से होना है तो कौन सा वाद्य यंत्र ?

4. स्केल (पिच) कौन सी हो ? मंद्र, मध्य या तार ?

5. रचना एवं बंदिश किस ताल में हो और कौन सा ताल वाद्य उपयुक्त है ?

6. लय की गति क्या हो ? तथा आवाज की गति कितनी धीमी व तेज हो।

7. कितने समय तक और कितनी बार ?

8. कब, कहां, और कैसे ?

इन सब बातों को जानना-समझना एक संगीत चिकित्सक के लिये अतिमहत्वपूर्ण है। इसके साथ ही रोगी के व्यक्तित्व को जानना भी आवशयक है। अन्य चिकित्सा पद्धतियों में जहां रोग के लक्षण को देखकर इलाज होता है वही संगीत चिकित्सा में लक्षण के साथ-साथ रोग का वजह भी जानना महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए कुछ बातों को जानना अति आवश्यक है -

1. रोगी के मानसिक विक्षिप्तता के कारणों को ज्ञात करना।

2. रोगी की सामाजिक, आर्थिक स्थिति का आंकलन करना।

3. रोगी के परिवेश, व्यवहार एवं स्वभाव इत्यादि की जानकारी लेना।

4. रोगी की संगीत अभिरूचि तथा पसन्द व नापसन्द को जानना।

5. पसन्दगी व नापसन्दगी संस्कारों का परिणाम होती है अतः यह जानना समझना आवश्यक है कि रोगी का संस्कार क्या है?

राग रागिनियों द्वारा फल प्रद चिकित्सा संभव है परन्तु इसके लिए ये महत्वपूर्ण है कि संगीतज्ञ, अनुभवी, कुशल एवं विचारशील हो। अनेक विषयों के साथ ही मेडिकल सांइस की जानकारी हो। यह ध्यान देना आवश्यक है कि राग का प्रयोग करते समय राग के नियमों का पालन हुआ है कि नहीं । राग की शुद्धता, तानपुरे के सुर के साथ सही श्रुतियों का प्रयोग, राग का समय, रस-भाव सौदर्य आदि बातों की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए। रोग के गहन अध्ययन, विश्लेषण, पूर्ण मानसिक तथा औषधिय चिकित्सकीय संरक्षण के पश्चात् स्वस्थ वातावरण में श्रोता तथा प्रयोक्त्ता के रूप में दी गई संगीत चिकित्सा निश्चित रूप से फल प्रदान करने में सक्षम है। मधुर संगीत की ध्वनि मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षक, रोग निवारक व आयु वर्द्धक होती है। राग के ढांचे, राग की शक्ति व राग की आत्मा पर विचार करके जो संगीत का सृजन करेगा वही राग चमत्कारिक, उपचारिक एवं सौंदर्य सम्पन्न होगा।

इस पद्धति में एक बात अवश्य है कि रोगी को भी इस पद्धति पर विश्वास एवं विषय के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। इस सन्दर्भ में पं. राम नाथ मिश्रा का कहना है कि - ''संगीत के माध्यम से चिकित्सा उसी की हो सकती है जो संगीत में रूचि रखता हो, संगीत से प्रेम हो, विश्वास हो। संगीत चिकित्सक भी दक्ष होना चाहिए। अधकचरा ज्ञान लेकर संगीत चिकित्सक किसी का भला नहीं कर सकते।''59

पिछले करीब 10 सालों में तनाव के हल के रूप में संगीत चिकित्सा पद्धति तेजी के साथ उभर कर आई है। दिनों-दिन गम्भीर होती तनाव की समस्या से निजात पाने के लिए पूरे विश्व में संगीत चिकित्सा को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। प्रसिद्ध संगीत चिकित्सक भाष्कर खांडेकर के अनुसार ''भारतीय संगीत चिकित्सा ही संगीत चिकित्सा पद्धति की जनक है। वर्तमान में 1993 में आई प्रारंभ हुयी। 'भारतीय चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद' में संगीत चिकित्सा विभिन्न वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को ध्यान में रखकर संगीत के माध्यम से विभिन्न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किये जा रहे है वे चमत्कारी एवं सम्भावनाओं से परिपूर्ण है।''60

आज इस विषय पर व्यापक शोध एवं अनुसंधान हो रहे है जिनमें कुछ शोधो का उल्लेख इस प्रकार है-

-चीन के शंधाई कन्जरवेटरी ऑफ म्यूजिक के चिकित्सकों ने 'इलेक्ट्रोनिक म्यूजिक थेरेपी' नामक एक प्रभावशाली उपचार पद्धति विकसित की है जिसमें भिन्न-भिन्न बिमारियों के लिये पृथक-पृथक ध्वनियां प्रयुक्त की जाती हैं। पाचन संस्थान, स्नायु संस्थान एवं हृदय की बीमारियों में यह विशेष कारगर सिद्ध हुआ।61

-पेन्सिलवानिया के ड्रेक्सेल विश्विद्यालय में किये गये शोध के अनुसार (जिसमें 1891कैंसर के मरीजों पर शोध किया गया) यह परिणाम प्राप्त हुआ हे गाना-बजाना, वाद्य संगीत सुनना कैंसर मरीजों की बेचैनी को कम करता है। यह न सिर्फ दर्द के अहसास को कम करती है बल्कि चित्त का शमन भी करती है और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाती है।62

- डा. अलिवर स्मिथ ने अपने शोध के परिणाम में यह पाया कि बांसूरी जैसे वाद्यों पर 20-25 मिन्ट हिंडोल, पूरिया, तोड़ी, भैरवी इत्यादि रागों को सुनने से उच्च रक्तचाप, तनाव आदि मस्तिष्क से सम्बन्घित रोगों पर नियंत्रण किया जा सकता है। पार्किन्सन्स व अलजाईमर के रोगों में राग शिवरंजनी प्रभावी है।63

- बम्बई के एक अस्पताल में दमा, अवसाद, उच्च रक्तचाप व अनिद्रा के 80 मरीजों के लिये अहिर भैरव (प्रातः काल) भीमपलासी (दोपहर) पूरिया (सायंकाल) तथा दरबारी कान्हरा (रात) को सुनाया गया। इस शोध का नेतृत्व करने वाली निवेदिता मेहता ने 'इडियन साइक्रेटिक सोसायटी' की बैठक में शोध के परिणामो को रखते हुये बताया कि संगीत का उन्मादी लोगों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह उनके उन्माद को कम करता है। यह अध्ययन उस समय किया गया जब गोधरा के पास बड़ोदरा व अहमदाबाद साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहे थे।64

- तिहाड़ जेल ने कैदियों को अवसाद से लड़ने के लिए संगीत-चिकित्सा शुरू की है। तिहाड़ जेल में संगीत का कमरा स्थापित किया गया है। इस संगीत कक्ष से जेल में रहने वाले कैदी व्यस्त रहते है और उनके मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोबल में सुधार आता है।65

- भारतीय संगीत में रूचि रखने वाले येरूशलम के योग अध्यापक तमार बेंटल ने बताया कि पं. हरि प्रसाद चौरसिया की बांसूरी की कर्णप्रिय धुनों का प्रयोग महिलाओं के गर्भ काल और प्रसव की पीड़ा को कम करने के लिए किया जा रहा है।66

- डा. भाष्कर खांडेकर ने कहा कि संगीत हमारे स्ट्रेस लेबल को बहुत कम समय में बदल देता हे। इससे स्ट्रैस्ड मांसपेशियों को आराम मिलता है। सूजन कम होती है, हृदय रोगों से राहत मिलती है। विदेशों में आपरेशन के दौरान आपरेशन थियेटर में संगीत का प्रसारण सर्जिकल प्रोसीजर के कारण बढ़े हुये ब्लडप्रेशर को कम रकने के लिए किया जाता है।67

- डा. खांडेकर, भारत के ऐसे संगीत चिकित्सक है जिन्होंने 5000 से भी ज्यादा रोगियों को इस चिकित्सा से लाभ पहुंचाया है। कलावर्धन के निदेशक, 'म्यूजिक थेरेपी' पत्रिका के सम्पादक RAASI Research and Advanced Studies Institute के निदेशक है। आपके निर्देशन में 'म्यूजिक-थेरेपी' का कोर्स भी चलाया जा रहा है जो विभिन्न तरीके का है जैसे - Music Therapy for pregnancy, music Therapy for child development, music Therapy for CNS, Disorders, music Therpy for Anxiety, blood Pressure and diabetic. etc.

संगीत चिकित्सा के प्रति आप पूरी तरह समर्पित है। आयुर्वेद से जोड़कर ही आप इस पद्धति को प्रयोग में लाते हैं।

इसी प्रकार मद्रास के अपोलो अस्पताल में संगीत -चिकित्सा का त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम शुरू है तथा इन्होंने संगीत के कई सीडी एवं अलबम निकाले हैं जो विभिन्न रोगों में लाभदायक हो रहे हैं जैसे - Music for the health, Music to over come depression, music to overcome fear & Anxiety, MusicTherapy to diabetic and Music Therapy to enhance concentration and Memory.

इन एलबमों में चुने हुए राग-रागनियों को रोगो के अनुरूप मधुर व कार्णप्रिय धुनों में दी गई है।68

नई दिल्ली में 2005 से The Music Therapy Trust काम कर ही है। संगीत चिकित्सा के प्रति जागरूकता लाने के लिए यह संस्था स्कूल, अस्पताल, नर्सिग होम आदि पर काम करती है साथ ही संगीत-चिकित्सा में पोस्ट ग्रेजुयेट डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाती है।इसके अतिरिक्त टी. वी. साईराम जो चेन्नई के प्रसिद्ध संगीत चिकित्सक है तथा नाद सेन्टर फॉर म्यूजिक थेरेपि के माध्यम से अन्तरराष्ट्रीय विचार संगोष्ठियों का आयोजन करते है। रागों के माध्यम से अनेक रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिल रहा है। सीडी एवं संगीत चिकित्सा पर लिखे लेखों के माध्यम से लोगों में ंइस पद्धति के प्रति जागरूकता उत्पन्न कर रहे है।69

प्रसिद्ध सितार वादक रूप वर्मा ने संगीत चिकित्सा से सम्बन्धित अनेक सीडी जैसै - नाद योग, योग निद्रा, द चक्राज (Chakras) इत्यादि के द्वारा रोगियों को स्वास्थ्य लाभ का अवसर दे रहे है।

बम्बई के श्री नारायण अग्रवाल द्वारा निर्मित चार ऑडियो कैसेट हैं जिसमें बासुरी, सरोद, तबला एवं गिटार आदि वाद्य यंत्रो का प्रयोग हुआ है। इनके नाम है - जीवन, तनाव, निद्रा, विश्राम। पं. विश्वमोहनभट्ट, रघुनाथ सेठ, तरूण भट्टाचार्य, पं. मजुमदार, तथा उस्ताद साबिर खंा के वादन द्वारा निर्मित से चारों कैसेट उच्च रक्तचाप , निम्न रक्त चाप, तनाव को दूर करने के लिये, मानसिक शान्ति के लिए अतयंत उपयोगी है।70

बैंगलोर के ''नेशनल इन्सटीट्यूट ऑफ न्यूरो हेल्थ एण्ड मेंटल सांइस'' एवं दिल्ली के अपोलो अस्पताल में ''बॉडी, माइन्ड, मेडिसन'' विभाग के द्वारा भी संगीत चिकित्सा की पद्धति अपनाई जा रही है तथा रोगियों पर इसका सफल प्रयोग किया जा रहा है। संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में अन्य अनेक विदेशी संस्थाए भी है जो कार्य कर रही हैं। इनके अतिरिक्त जो पहले से ही इस क्षेत्र में विद्यमान है उनके प्रमुख रूप से ड़ा. बाला जी ताम्बे ''आत्म सन्तुलन ग्राम, महाराष्ट्र, शंशाक कट्टी सुर-संजीवन केन्द्र, मुम्बई, राग रिसर्च सेन्टर चेन्नई, ब्रह्मवर्चस संस्थान, हरिद्वार, तथा शिमला के प्रो. चमल लाल वर्मा जी का नाम उल्लेखनीय है जो इस क्षेत्र में शोध एवं प्रयोग कर रहे हैं।

यद्यपि विदेशों में इस क्षेत्र में व्यापक कार्य हुआ है और निरन्तर जारी है परन्तु हमारे देश में भी इस चिकित्सा पद्धति पर लोगों की संतोषजनक दृष्टि गई है और अपनाया जा रहा है। हीलींगहैंड के निदेशक सतीश कपूर के अनुसार -''यह बहु उद्देशीय चिकित्सा पद्धति है जिसके द्वारा संप्रेषण को बढ़ाया जा सकता है, असामान्य व्यवहार का नियंत्रित किया जा सकता है, तर्क शक्ति को बढ़ाने में सहायक है। इसका सर्वाधिक लाभ तनाव ग्रस्त व्यक्ति को होता है। इस क्षेत्र में शोध की अपार सम्भावनाये हैं। कब, कैसे, किस बिमारी में कौन सा संगीत सुना जाये, इस पर शोध जारी है।71

भारत जैसी धनी आबादी वाले आर्थिक रूप से कमजोर देश में ऐसी सहायक चिकित्सा पद्धति का विकास होना आवश्यक है। स्वर, राग, लय, ताल का प्रभाव, उसकी विशद् चर्चा अपने संगीत की एक विशेषता रही है। तन-मन पर उसके प्रभाव की बातें केवल कपोल-कल्पित न होकर शास्त्र सम्मत, अनुभव सिद्ध और प्रयोग स्वीकृति होकर गुणीजनों की सम्मति पाया। निष्कर्षतः प्रभाव की बात अधिकांश लोंगो द्वारा अधिकांश रूप से स्वीकार होती गई, सुदृढ़ होती गई। यही है प्रभाव से उपचार की दिशा। संगीत के प्रायः पुराने सभी गुणी जनों का संगीत के प्रति दैवीय भावना ही रही है। बेतियां घराने के संगीत गुरू पं. राम नाथ मिश्रा का कहना है कि ''परम ब्रह्म से पैदा हुई इस विद्या में अपार सामर्थ्य है। यह प्राचीन विद्या है और लोग इसे परमात्मा का आर्शीवाद मानते थे। आज वैज्ञानिक युग है अतः संगीत चिकित्सा की व्याख्या के तरीके बदल गये हैं। अब ध्वनि तरंग का असर, स्वराधात का प्रभाव, स्वर लहरियों से पैदा स्पन्दन जैसी बातें होती हैं। सभी का प्रमाण चाहिए। युग के प्रभाव से प्रकृति व प्रवृत्ति बदलती है पर जो नहीं बदलती है वो है- आत्मा। शरीर का सुख मन व आत्मा के सुख, से जुड़ा है। जब मन दुःखी होता है तो शरीर रोगी होने लगता है।72

रोगों की जड़ शरीर में नहीं मन में होती है, इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुये महर्षियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा था कि - ''प्रज्ञापराधं रोगस्य मुल कारणम्'' अर्थात् प्रज्ञापराध, मानसिक अस्तव्यस्तता, असंतुलित मनः स्थिति, चिन्ता क्षोम तथा अन्यान्य मानसिक विकृतियां समस्त रोगों का मूल कारण है। अतः मन को संतुलित रखने के प्रयास में अन्य चिकित्सा पद्धतियों से परे सहायक चिकित्सा पद्धतियों में संगीत का स्थान सर्वोपरि है। भारतीय मनीषियों ने संगीत की शक्ति को हजारों वर्ष पूर्व पहचान कर उसका उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था। मंत्र चिकित्सा का अलग स्वतंत्र विज्ञान है परन्तु उसमें स्वर-लय गति का ताल मेल बहुत कुछ संगीत की इस जीवन-दात्री क्षमता के प्रयोग का उदाहरण है।

संगीत चिकित्सा अपने आप में एक श्रेष्ठ उपचार पद्धति है। भाव संवेदना और मानसिक संतुलन में लाभ प्रद यह पद्धति समकालिक औषधि के रूप में व वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में अत्यंत प्रभावी है।

हमारा सदा सहायक सेवक शरीर है जो चौबीसो घंटे सोते-जागते हमारे लिए काम करता है। इस शरीर को समर्थ, निरोग एवं दीर्धजीवी बनाये रखना प्रत्येक विचारशील का कर्तव्य है। महान मनीषी पी. साईटन ने लिखा है कि -''अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ, जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।''73

तुलसी दास जी ने भी कहा है- ''बड़हि भाग मानुष तन पावा''।

अन्त में यही कहना सार्थक होगा कि हमारी भारतीय संस्कृति ने सदैव भारतीय समाज को रास्ता दिखाया है, उनका जीवन पथ प्रशस्त किया है। सम्यता संस्कृति व वेदों का पाठ भारत ने पूरी दुनिया को पढ़ाया है। संगीत जो इसकी प्रगति, प्रेरणा, व प्राणशक्ति है, यह तत्व इतना महत्वपूर्ण एवं शक्ति समपन्न है कि इसके उपयोग से हम जीवन व मृत्यु, अमृत और विष जैसे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। संगीत स्वयं में एक 'थेरेपी' है। इसे सामजिक उपयोगिता के संदर्भ में देखते हुये चिकित्सा के माध्यम से मानव को स्वस्थ, निरोगी एवं दीर्धायु जीवन प्रदान करना ही इस पद्धति का उद्देश्य है। भारतीय संगीत की यह सबसे बड़ी विशेषता रही है कि यह परम्परा के अनुकरण के साथ ही मौलिक सृजन के प्रति सदा सजग व सचेतन रही है। भारतीय संगीत वैदिक है, शास्वत है, सनातन है और वैज्ञानिक है। आज कोलाहल भरे, तनाव पूर्ण जीवन में संगीत एवं ऐसी ज्योति की तरह है जो हमारे जीवन को आलोकित कर रसमय व मधुमय बना सकती है।

संदर्भ सूची

1. शारंगदेव - संगीतरत्नाकर, अध्याय 1/21

2. अश्विनी कुमारों के भैषज मंत्र में हर के लिए चार प्रकार का भैषज बताये हैं यथा पवनौकष, जलौकष, और शाब्दिक क्रौंच मुनी के ग्रंथ कुर्णक-प्रभा के प्रथम प्रकरण में शब्द की व्युत्पत्ति, शब्द और शरीर का सम्बन्ध, शब्द समय में राग मान इत्यादि का विवरण है। मैंद ऋषि ने 'शब्द-कौतुहल' में, प्रथम प्रकरण में वीणा तंत्री, प्रणव, शंख, भेरी, मृदंग, मजीरा, वंशी आदि भेषज से ही बनाने और उसे सुनाकर रोग दूर करने का उल्लेख किया है।

3. तानसेन द्वारा दीपक राग गाने से जल उठना, तानसेन की शिष्या द्वारा मेघ की अवतारणा कर वर्षा करना, बैजु बावरा द्वारा 'मृगरंजनी-तोड़ी' गाकर मृगों को बुलाना तथा मध्य प्रदेश के चन्देरी जिले के कछवाह नरेश राजा राज सिंह को पूरिया राग से अनिद्रा रोग से मुक्ति दिलाना इत्यादि घटनायें, मध्यकाल में संगीत के चमत्कारी प्रभाव को प्रस्तुत करती है।

परम पुज्य पं. ओमकार नाथ ठाकुर जी ने इटली शासक मुसोलिनी को राग पुरिया सुनाकर अनिद्रा से मुक्ति दिलाई थी।

- वांगमय शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म- पं. श्री राम शर्मा आचार्य पृष्ठ सं. 5. 3. ( अधिकांश पुस्तकों /ग्रथों 'में ये किंवदन्तियां' पढ़ने को मिलती है )

4. सबसे प्राचीन संगीत चिकित्सा की पुस्तक 'मेडिसिनाम्यूजिक' है जो चिकित्सक रिचर्ड ब्राउन द्वारा सन् 1729 में लिखी गई थी। डा. एडवर्ड पॉडीलस्की की -&Music for your health एम, शुलियन की - Music and medicine,जेन फॉक्स की - The health of music डा. रामेला की - The Enchanting power of music डा. जैक्सन पाल के संगीत - चिकित्सा' इत्यादि पुस्तकों में संगीत - चिकित्सा पर विस्तार से वर्णन है।

5. अखण्ड ज्योति - सितम्बर, 2004, पृष्ठ सं. - 07

6. वही पृष्ठ सं.- 7

7. दोषाः पुनस्त्रयो वात् -पित्त् श्लेष्माणः। ने प्रकृतिभूता : शरीरोकारका भवन्ति।।

(चरक संहिता विमान स्थान अध्याध 1/5)

स्ंगीत - चिकित्सा - सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. 161

8. महर्षि तुम्बरू - संगीत स्वरामृत (द्रष्टव्य - संगीत चिकित्सा -संगीत श्रीवास्तव, लेख - शंशाक कट्टी जी का, पृष्ठ सं. 14 - 15)

9. आरोग्य अंक, सवंर्धित संस्करण, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ सं. -152

10. मुगल काल में संगीत चिन्तन, राजेश्वरी मित्र, पृष्ठ सं. 4-5

11. संगीत चिकित्सा - सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. - 182-183 (द्रब्टब्य संगीत - चिकित्सा - जैक्सनपाल पृष्ठ सं. - 22)

12. सात स्वरों से पूर्ण राग - सम्पूर्ण जाति का, छः स्वरों से पूर्ण षॉडव जाति का तथा पाँच स्वरों का प्रयोग जिन रागों में होता है उसे ऑडव जाति का राग कहते हैं।

13. आयुधर्मयशोबुद्धि धनधान्य फलं लभेत्। रागभिबुद्धि सन्तान पूर्णरागाः प्रगीयते।।80।। संग्रामरूपलावण्य विरहं गुण कीर्तनम्। षौडवेन प्रगातव्यं लक्षण गदितं यथा ।।81।। व्याधिनाशे शत्रुनाशे भयशोक विनाशने। व्याधि दारिद्रय संतापे विषम ग्रहमोचने ।।82।। कायाडाम्बरनासे च मंगल विष संहते। ऑडवेन प्रगातव्य ग्राम शान्त्यथं कर्मणि ।।83।।

- संगीत मकरन्द - नारद, संगीताध्याय, (द्रष्टव्य-संगीत पत्रिका 1993, लेख - राग - रागनियों द्वारा राग चिकित्सा पृष्ठ - 97 तथा 'संगीत' अंक जनवरी 1872, पृष्ठ सं. 77

14. संगीत चिकित्सा - डा. सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. 66-67

15. वही पृष्ठ सं.- 144

16. वही पृष्ठ सं.- 442

17. संगीत, जनवरी, 1972, राग-रागनियों द्वारा चिकित्सा लेख - मधुगंधा मधुवृत, पृष्ठ सं. 81

18. संगीत, जनवरी, 1994, लेख चिकित्सा एक अभूतपूर्व अभियान, लेखन - श्री गोपाल कृष्ण भारद्वाज

19. वंागमय शब्द ब्रह्म - नाद, ब्रह्म - आचार्य श्री राम शर्मा पृष्ठ सं. 5.37

20. याहू इण्डिया, 4 मई, मन संगीत, in.jagaran.yahoo.com

21. Mind and body researches, Sunday 8 May 2011, www.ashokbsr.blogspot

22. राचीं एक्सप्रेस - 30 नवम्बर, 2010, www.ranchiexpress.com

23. वंागमय शब्द ब्रह्म - नाद, ब्रह्म - श्री राम शर्मा पृष्ठ सं. 3.9

24. National seminar on “ The relevance of music therapy-Indian perspective, Bhagal Pur लेखयोग एवं संगंीत, डॉ. शशी शुक्ला पृष्ठ सं. 17

25. संगीत चिकित्सा - डॉ. संगीता श्रीवास्व, पृष्ठ सं. - 3

26. वही पृष्ठ सं.- 3-4

27. Music for your health Adword Podylosky Page No- 47

28. संगीत चिकित्सा - डॉ. सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. - 185

29. संगीत विशारद - बंसत, संस्करण - 21 पृष्ठ सं. 549

30. प्रणव भारती - पं. ओमकार नाथ ठाकुर

31. संगीत भारती - डॉ. सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. 178-179

32. समाचार पत्र - डेली, लेख -म्यूजिक हेल्प्स टू हील फास्टर दिनांक 16.10.1992 (द्रष्टव्य - संगीत चिकित्या - डॉ. सतीश वर्मा, पृष्ठ सं. 409)

33. in.jagaran.yahoo.com.4 May 2011

34. www.news-medical.net, 26 May 2011

35. Mind and body researches Sunday 8 May 2011, www.ashokbsr.blogspot.com (Posted by Ashok Palmist)

36. प्रणव भारती - पं. ओमकार नाथ ठाकुर पृष्ठ सं. - 46

37. शोध प्रबन्ध - मनोरमा शर्मा Effects of music, education school achievements and adjustment of the mentally handicapped children in Himachal Pradesh – Page -2

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39. संगोष्ठि, ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा बिहार, 13 मई, www.prabhatkhabar.com

40. www.janokti.comमनोरमा शर्मा 24 जुलाई, 2010

41. संगीत, द्वारा उपचार या म्यूजिक थेरेपी, पत्रिका - म्यूजिक थेरेपी - संस्करण 22 मार्च 2010, लेख -राजश्री रावत numsamvet.org.in

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47. निबन्ध संगीत - श्री लक्ष्मी नारायण गर्ग, लेख भगवत शरण शर्मा - संगीत कला और सौन्दर्य पृष्ठ सं. 303

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49. वही पृष्ठ सं.- 82

50. संगीत का सौन्दर्य बोध, फिल्म संगीत के सन्दर्भ में, उमा गर्ग - पृष्ठ सं. 286

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53. निबन्ध संगीत - श्री लक्ष्मी नारायण गर्ग, रस सृष्टि में आलाप - तान की भूमिका - श्रीमति उमा गर्ग - पृष्ठ सं. 275

54. सेमिनार - 4 दिसम्बर - 2010, डी. जी. पी. जी. कॉलेज कानपुर, डा. भाष्कर खांडेकर का उद्बोधन।

55. दैनिक जागरण, वाराणसी - 16 मार्च 2011, पृष्ठ सं. 5, डीजे की तेज ध्वनि ले सकती है जान।

56. वही पृष्ठ सं.- 5

57. दैनिक जागरण, वाराणसी - 31 जनवरी 2011, पृष्ठ सं. 13, ]www.prabhatkhabar.com

58. ललित नारायण मिथिला वि. वि. में आयोजित संगोष्ठि - 13 मई 2011

59. पं. राम नाथ मिश्रा in.jagaran.yahoo.com10 जनवरी 2008 विश्वास व रूचि होगा तो होगा चमत्कार।

60. संगीत कला विहार, मई -2005, लेख संगीत चिकित्सा महत्वपूर्ण जानकारी - भाष्कर खांडेकर पृष्ठ सं. 38

61. शब्द ब्रह्म-नाद, ब्रह्म- श्री राम शर्मा आचार्य पृष्ठ सं. 6.4

62. Music soothes anxiety, pain in cancer patient –www.haaram.com

63. www.janokti.com 24 July 2010 लेख-मनोरमा शर्मा

64. प्रचलित हो रही है संगीत से चिकित्सा - 20 दिसम्बर 2006, Josh18.in.com

65. तिहाड़ जेल - संगीत से दूर हो रहा अवसाद, www.samaylive.com

66. दैनिक जागरण, वाराणसी, 23 मई 2011, पृष्ठ सं. 1, लेख - प्रसव पीड़ा हो जाती है कम।

67. सेमिनार - 4 दिसम्बर 2010, कानपुर, मुख्य अतिथि के रूप में डा. भाष्कर खांडेकर को उद्बोधन।

68. Emusictherapy.com. Dr. T. Mythily Deptt. Of Music therapy. Apollo hospital Chennai.

69. www.themusitherapytrust.com

70. संगीत चिकित्सा - डॉ. संगीत श्रीवास्तव, लेख - डॉ. स्वतंत्र शर्मा पृष्ठ सं. 8-9

71. भविष्य की चिकित्सा है म्यूजिक थेरेपी - अफसर अहमद navbharatimes indiatimes.com20 अगस्त 2003.

72. विश्वास व रूचि होगा तो होगा चमत्कार in.jagaranyahoo.com10 जनवरी 2008

73. निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र - प.ं श्री राम शर्मा आचार्य, पृष्ठ सं. 15.11

3 blogger-facebook:

  1. बहुत शानदार और ज्ञानवर्धक आलेख । बधाई और अभिनंदन.........

    आनंदकृष्ण , भोपाल
    मोबाइल : 9425800818

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  2. beautifully explained.....how can I share this article with my friends on facebook or email????


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  3. स्वाति9:13 am

    नमस्ते, आप के द्वारा लिखी इस रचना ने मुझे संगीत के शास्त्र को पड़ने के लिए बहुत प्रेरित किया | इस प्रकारके लेख संगीत के विद्यार्थियों के साथ साथ सामान्य व्यक्ति के लिए भी ज्ञान का स्तोत्र उपलब्ध करती है | आप के द्वारा किये अथाह परिश्रम एवं स्वयं के ज्ञान को बाटने के लिए मै आपकी मन से आभारी हूँ |

    उत्तर देंहटाएं

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