शशांक मिश्र भारती की हास्य - व्यंग्य कविता : महंगाई प्रार्थना

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

महंगाई पर विशेष-

महंगाई प्रार्थना

 

हे प्रभु !

हम महंगाई भ्रष्‍टाचार

साथ-साथ हों

आशीर्वाद युक्‍त मुझ पे

बेईमानों के हाथ हों

गरीब की गरबीली गरीबी

ईमानदारी से न शोषित हों

शत्रु जो जहां हैं उनके

उनसे ही रक्षित हो पोषित हों

दलालों की दया

घूसखोरों की गिद्ध दृष्‍टि से

हम दोनों पल्‍लवित

पुष्‍पित और फलित हों

मित्र बनें भ्रष्‍ट सभी

सज्‍जन न आस-पास रहें

घास-फूस सा बढ़ा दे

सो सहयोगी इष्‍ट हों

त्‍यौहारों पे रूला सकूं

ऐसे मिले मुझे मन्‍त्र हों

जय-जय कार मेरी

करवाने के नित यन्‍त्र हों

सहायक बनें मिलावटखोर

सटोरिये और पाखण्डी

कांटे पथ के हटाने को

सक्रिय जोक व तन्‍त्र हों

--

 

हिन्‍दी सदन

बड़ागांव

शाहजहांपुर-242401 उ0प्र0

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "शशांक मिश्र भारती की हास्य - व्यंग्य कविता : महंगाई प्रार्थना"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.