रविवार, 6 नवंबर 2011

शेक्सपियर का नाटक : कुटिल स्त्री का वश में करना

कुटिल स्त्री का वश में करना

(The taming of the shrew)

इटली के पादुआ नामी नगर में एक धनाढ्य रहता था जिसका नाम बप्टिष्टा था। बप्टिष्टा के दो लड़कियाँ थीं। एक का नाम कैथराइन था दूसरी जो छोटी थी वयंका कहलाती थी। वयंका बड़ी सुशीला और नम्र थी। उसकी भाषा ऐसी प्रिय थी कि शत्रु का हृदय भी एक बार उसको देखकर आकर्षित हो जाता था। परन्तु कैथराइन बड़ी कुटिल थी। उसकी प्रकृति ऐसी कठोर थी कि वह झट लड़ पड़ा करती थी। उससे बात करने को किसी का भी जी नहीं चाहता था और सब नगरवासी उसको 'कुटिल कैथराइन' कहा करते थे।

बष्टिष्टा को अपनी ज्येष्ठ पुत्री की कुचाल देखकर बड़ा क्रोध आता था और उसके सम्बन्धी भाई-बन्द कैथराइन से बड़ा दुख मानते थे। अब होते-होते वह बड़ी और विवाह योग्य हो गई थी परन्तु पादुआ भर में उसकी 'कुटिलता ऐसी प्रसिद्ध हो गई थी कि कोई मनुष्य उससे विवाह करने का 'साहस न करता था।

वयंका के विवाह के लिए बार-बार लोग आते थे परन्तु बप्टिष्टा यह कह कर टाल देता था कि अभी मुझे कैथराइन का विवाह करना है। जब तक बड़ी लड़की के विवाह से हाथ खाली नहीं होते छोटी का विवाह नहीं किया जा सकता। इससे बप्टिष्टा का प्रयोजन यह था कि किसी-न-किसी तरह कैथराइन का विवाह हो जाय।

इस प्रकार थोड़े दिन व्यतीत होने पर पादुआ में पेटरोकियो नामी एक भद्र पुरुष आया और कैथराइन के रूप तथा धन की प्रशंसा सुनकर उससे विवाह करने पर राजी हो गया। यद्यपि वह सुन चुका था कि कैथराइन बड़ी कुटिल और लड़ाका है परन्तु इस बात से उसे कुछ भी संकोच न हुआ और मन में ठान ली कि इस लड़ाका स्त्री का विवाह करके उसे वश में करूँगा। उसे अपने चातुर्य का इतना बल था कि वह कैसी ही कुटिल स्त्री- को वशीभूत कर सकता था।

पेटरोकियो एक विलक्षण पुरुष था। मानो ईश्वर ने इसे कैथराइन से- विवाह करने के लिए ही उत्पन्न किया था। एक ओर तो वह बड़ा तेजस्वी, दृढ़ प्रतिज्ञ, स्थिर-बुद्धि और धैर्यशील था दूसरी ओर वह रसिक और हास्यप्रिय भी था। एक विचित्र बात उसमें यह थी कि जब वह वस्तुत:- शान्त-चित्त होता था उस समय भी यदि आवश्यकता हो तो अपने मुँह को क्रोधमय और विभीषण बना लेता था। चाहे क्रोध का कोई भी कारण न होता और उसके चित्त में किंचित् भी शोक न होता फिर भी हँसी के तौर- पर वह अपनी सूरत ऐसी बना लेता मानो उसे बहुत क्रोध आ रहा है। फिर स्वयं ही अपनी इस बनावट पर: हँसता। ऐसा पुरुष कैथराइन के- सर्वथा योग्य था। उसने विचार किया कि जैसे पुरुष से तैसा ही व्यवहार करना चाहिए। इसलिए कैथराइन से विवाह करने पर उसने इरादा कर लिया कि मैं लड़-लड़ कर उसको वशीभूत कर लूँगा।

अब पेटरोकियो ने कैथराइन से प्रेम करना आरम्भ कर दिया और बप्टिष्टा से प्रार्थना की कि आप अपनी सुशील और नम्र कन्या कैथराइन- का विवाह मेरे साथ कर दीजिए। बप्टिष्टा को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसी चाण्डाल स्त्री को पेटरोकियो नम्र और सुशील बताता है। यद्यपि उसकी बड़ी उत्कण्ठा थी कि जिस प्रकार हो सके कैथराइन का- विवाह कर देना चाहिए परन्तु उसने स्पष्ट कह दिया कि मेरी पुत्री बड़ी कुटिल है। उसके कथन का एक साक्षात् प्रमाण भी मिल गया। जब वे दोनों परस्पर बातें कर रहे थे तब कैथराइन के संगीत-पाठक ने बप्टिष्टा से शिकायत की कि तुम्हारी लड़की ने बाजे से मेरा सिर तोड़ दिया क्योंकि मैंने उसे ठीक-ठीक बजाने की शिक्षा की थी। यदि साधारण मनुष्य होता तो ऐसी कुटिल स्त्री के इस गुण को सुनकर झट कान पर हाथ रख लेता और कभी विवाह का नाम भी न लेता परन्तु पेटरोकियो ऐसा न था। वह कहने लगा, ''आहा! यह तो बड़ी वीर स्त्री है। मैं तो इसके गुणों का श्रवण कर मोहित हुआ जाता हूं। मैंने तो पहले ही सुना था कि कैथराइन सर्वगुण-सम्पन्न है। इसीलिए वरोना नगर से इतनी दूर मैं यहाँ आया हूँ।'' फिर बप्टिष्टा से कहने लगा, ''महाशय! मुझे बड़ी जल्दी है, मैं रोज-रोज यहाँ नहीं आ सकता। आप शीघ्र उत्तर दीजिए। मेरे पिता को तो आप जानते ही हैं। अब उनका देहान्त हो गया है और उनकी सब सम्पत्ति मेरे हाथ आ गई है। अब आप बताइए कि क्या अपनी सुशीला पुत्री का विवाह मेरे साथ करेंगे? और यह भी जानना चाहता हूँ कि कन्यादान के साथ आप क्या धन देंगे? ''

बप्टिष्टा को पेटरोकियो की बातों पर बड़ा आश्चर्य होता था परन्तु कैथरायन से पीछा छुटाने के लिए वह विवाह करने पर राजी हो गया और बीस हजार मुद्रा और अपनी मृत्यु पर आधी सम्पत्ति देने की प्रतिज्ञा की।

बप्टिष्टा ने इस बात का निश्चय करके अपनी कुटिल पुत्री को खबर -दी कि पेटरोकियो तुमसे विवाह करने आया है और बातचीत करना चाहता है।

पेटरोकियो ने मन में विचार किया कि कैथराइनसे प्रेम करने की एक नई विधि निकालनी चाहिए। मैं उससे बड़ी वीरता से बातचीत करूँगा। यदि वह क्रुद्ध होगी तो मैं नम्र बन जाऊँगा। अगर वह जोर से बोलेगी तो मैं कहूँगा कि तुम बड़ी मधुर हो। यह जान पड़ता है कि कोई बुलबुल गा रही है। यदि वह नाक-भौं चढायेगी तो मैं कहूँगा कि तुम्हारा मुख कमल के सदृश खिल रहा है। यदि वह चुप रहेगी तो मैं उसकी वाक्पटुता -की प्रशंसा करूँगा। यदि वह मेरे पास से जाने को कहेगी तो मैं धन्यवाद दूँगा, मानो वह मेरे पास बैठने को कह रही है।

जब कैथराइन पेटरोकियो के पास आई तब उसने कहा ''राम राम केट राम राम, मैं सुनता हूँ कि तुम्हारा नाम केट है।'' कैथराइन को बहुत बुरा मालूम हुआ कि एक अज्ञात पुरुष मुझे नाम लेकर पुकार रहा है और नाक-भौं चढाकर कहने लगी, ''जो लोग मुझसे वार्तालाप करते हैं वे मुझे कैथराइन कहा करते हैं।''

पेटरोकियो ने उत्तर दिया ''नहीं-नहीं, तुम झूठ बोलती हो, मैंने तो तुमको केट कहते ही सुना है। लोग तुमको 'केट' कहते हैं, 'सरल केट कहते हैं और 'कुटिल केट' भी कहते हैं। हे केट, तुम तो संसार भर के सबसे भली केट हो और इसलिए केट तुम्हारी नम्रता और सहिष्णुता- की प्रशंसा सुनकर मैं इस नगर में आया हूँ कि तुम्हारे प्रेम का पात्र बनकर तुम से विवाह करूँ।“

इन दोनों में बड़ा विचित्र संवाद हुआ। कैथराइन कटु भाषण से यह सिद्ध कर रही थी कि मैं वास्तव में 'कुटिल' ही कहलाने के योग्य हूँ और पेटरोकियो बड़ी मधुरता सै उसके नम्र व्यवहार की प्रशंसा कर रहा था।' इतने में बप्टिष्टा आ गया और पेटरोकियो ने जल्दी करने के लिए कहा, ''प्यारी कैथराइन, अब गपशप और व्यर्थ आलाप को बन्द कर देना चाहिए, तुम्हारे पिता ने मेरे साथ तुम्हारा विवाह स्वीकार कर लिया है। यौतुक ( दहेज ) भी निश्चित हो चुका। अब चाहे तुम्हारी इच्छा हो या न हो, मैं- अवश्य तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा।''

वष्टिष्टा के आने पर पेटरोकियो ने उससे कहा, ''महाशय, आप की- पुत्री मुझसे बहुत प्रसन्न है और रविवार को विवाह करने की प्रतिज्ञा करती है। ''

कैथ ०-''पिताजी! मैं इससे विवाह करने को राजी नहीं हूँ। विवाह तो'- क्या मैं इसे रविवार को शूली पर चढ़ता हुआ देखूँगी, यह बडा दुष्ट है। शोक है कि ऐसे मनुष्य से आप मेरा विवाह करना चाहते हैं। ''

पेट० -''महाशय, आप कैथराइन के इन बनावटी कटु शब्दों पर ध्यान न दीजिए। हमने परस्पर सब कुछ निश्चित कर लिया है। यह बात पहले ही से निश्चित हो चुकी है कि आपके सामने यह विवाह करने- में संकोच करेगी। अन्यथा यह मुझसे बड़ा प्रेम करती है। '' (फिर कैथराइन से )

''केट, प्यारी केट, अपना हाथ इधर लाओ । मैं अब वैनिस को जा रहा- हूँ वहाँ से तुम्हारे लिए बहुत उत्तम और बहुमूल्य वस्त्र लाऊँगा।' ' (बप्टिष्टा से ) ''पिता जी! आप विवाह की तैयारी कीजिए और अपने मित्रों- को निमंत्रण दीजिए। मैं अपनी 'कैंट' के लिए अँगूठी और अनेक प्रकार की उत्तम-उत्तम चीजें लाऊँगा; '' ( कैथरायन से) ''केट, मुझे प्यार करो।, हमारा तुम्हारा रविवार को विवाह होगा।''

रविवार को विवाह का दिन था। बप्टिष्टा के सम्बन्धी और इष्ट- मित्र वहाँ एकत्रित थे। परन्तु पेटरोकियो नहीं था। कैथराइन रो रही थी और कहती जाती थी कि दुष्ट पेटरोकियो ने मेरा उपहास किया है। इतने में पेटरोकियो आ गया परन्तु उसके पास कोई भी बहुमूल्य और उत्तम वस्त्र न था जैसी कि उसने प्रतिज्ञा की थी। उसके शरीर पर भी उत्तम वस्त्र न थे किन्तु फटे-पुराने कपड़े पहन कर आया था। आज उसके नौकर भी मैले- कुचैले कपड़े पहने हुए थे, पहले दिन की तरह उत्तम घोड़ा भी नहीं था किन्तु दो लदघुड़ियाँ उसके साथ थीं। एक पर वह स्वयं बैठा था और दूसरी अपनी कुटिल वधू के लिए लाया था।

सब लोगों ने पेटरोकियो से प्रार्थना की कि विवाह के योग्य कपडे धारण कर लो पर उसने न मानी और कहने लगा कि कैथराइन का विवाह मेरे साथ होगा न कि मेरे वस्त्रों के साथ। इसी प्रकार जो कोई पेटरोकियो से बात करता था एक अनूठा उत्तर पाता था। आखिरकार वे सब लोग मजबूर होकर वर-वधू के साथ विवाह-संस्कार के अर्थ धर्म मन्दिर में पहुँचे। पेटरोकियो मार्ग में उन्मत्तवत् तमाशे करता जाता था। जब मंदिर में पहुँचे और पुरोहित ने पूछा कि ''पेटरोकियो! क्या तुम कैथराइन से विवाह करोगे!।'' तब उसने इतने जोर से चिल्लाकर उत्तर दिया कि सब लोग चौंक पड़े और किताब पुरोहित के हाथ से छूट पड़ी। और जब वह अपनी पुस्तक को उठाने भूमि पर झुका तब इस अनोखे दूल्हे ने उसकी पीठ पर एक ऐसा घक्का मारा कि वह बिचारा फिर ग्रंथ सहित धरती पर गिर पड़ा। जिस समय संस्कार हो रहा था वह उन्मत्त की तरह नाना प्रकार के विघ्न कर रहा था। कभी तो बड़े जोर से अपने पाँव भूमि पर मारता कभी इतने जोर से चिल्लाकर मन्त्रोच्चारण करता कि सब अतिथियों का नाक में दम आ जाता। परन्तु सबसे आश्चर्यजनक बात यह हुई कि कलह प्रिया लड़ाका केथराइन भी अपने से चौगुने कुटिल पति की बातों से घबरा गई और थर-थर काँपने लगी। जब विवाह हो चुका तब उसने वहीं मद्य मँगा कर बिना किसी आव ताव के पीना आरंभ कर दिया और अन्य अतिथियों की तो कथा ही अलग है अपनी पत्नी तक को भी न पूछा। जब पेटरोकियो मद्य पी चुका तब उसने एक और कुचेष्टा की अर्थात् बची हुई मद्य को मन्दिर के एक पुजारी के ऊपर फेंक दिया और कहने लगा- ''आहा! तुम्हारी सफेद दाढ़ी मुझसे मद्य माँग रही है। इसीलिए मैं इसका सत्कार करता हूँ। आप किसी तरह बुरा न मानें।''

कभी किसी नगर में ऐसा उन्मत्त विवाह देखने में न आया होगा। परन्तु पाठकगण, आप यह न समझें कि पेटरोकियो आज उन्मत्त हो गया था। यह सब काम उसने कुटिल कैथराइन के वशीभूत करने के लिए किये थे।

विवाह तो किसी-न-किसी तरह हो ही गया, अब भोजन की वारी आई। बप्टिष्टा ने अपने इष्टमित्रों के लिए प्रीति-भोजन का सामान कर रक्खा था। परन्तु जब यह सब लोग धर्ममन्दिर से लौट कर घर आये तब पेटरोकियो ने स्त्री सहित अपने घर जाने की तैयारी कर दी।

बप्टिष्टा आदि सब लोगों को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई। वे सब एकस्वर होकर कहने लगे ''वाह वाह! ऐसा कहीं होता है। विवाह के पीछे भोजन कीजिए और तब जाइए।''

परन्तु दृढ़चित्त पेटरोकियो ने उत्तर दिया “अवश्य होगा, अवश्य होगा! मैं अपनी स्त्री को अभी लिये जाता हूँ।''

कैथराइन के मुँह से निकला कि ''मैं तो किसी प्रकार नहीं जाने की। देखें तो सही हमें आज कौन लिये जाता है? ''

कैथराइन की यह बात सुनकर सब सम्बन्धियों ने भी उसका साथ दिया और कहने लगे-

''यह तो बड़े अन्याय की बात है! कहीं ऐसा होता है? अभी मुँह मीठा तक नहीं किया। बिना कुछ खाये ससुर के घर से नहीं जाते।'' पेटरोकियो ने इतने जोर से उत्तर दिया कि कैथराइन काँप उठी, ''हाँ जाते हैं! अवश्य जाते हैं! ऐसा ही होता है और ऐसा ही होगा। देखो हमारे काम में कोई बाधा मत डालो। जैसा हमारे मन में आयेगा वैसा ही करेंगे। किसी का क्या। हमारी स्त्री है। हमारा उस पर अधिकार है।  अगर भला चाहते हो तो मेरे बीच में मत बोलो।'' ये सब बातें ऐसे उच्च-स्वर से की गईं कि और तो और बप्टिष्टा को भी कुछ कहने का साहस न हुआ और बिचारी कैथराइन बिना कान हिलाये, उसी बुरी घोड़ी पर सवार हो, बिना खाये-पिये अपने पति के साथ चल दी।

यह घोड़ी भी जिसे पेटरोकियो अपनी अनोखी दुलहिन के लिए छाँट कर लाया था दुनिया की घोड़ियों में अद्वितीय थी। मांस उसके शरीर पर  नाम को भी न था; पीठ पर ऐसे हाड़ निकले हुए थे कि बैठने वाले की सब नसें ढीली हो जाये। काठी के स्थान में कुछ चीथड़े डाल दिये गये थे इसलिए बैठने में बड़ा कष्ट होता था। चाल उसकी ऐसी मन्द थी कि कछुवा उससे बाजी ले जा सकता था।

ऐसी विचित्र घोड़ी पर अपनी विचित्र वधू को सवार करा के  पेटरोकियो ने घर को प्रस्थान किया परन्तु जिस मार्ग में होकर वह घर जा रहा था वह भी कुछ कम विचित्र न था। कहीं नाला, कहीं दलदल, कहीं  कीचड़ और कहीं मिट्टी के तूदे। इस प्रकार (वार-खड्डों में होकर जिस समय कुटिल कैथराइन अपनी सुसराल को जा रही थी उसका पति कोलाहल मचाता जाता था। जब कभी कैथराइन की घोड़ी के पैर लड़- खड़ाते पेटरोकियो इतने जोर से बिचारे जानवर पर चिल्लाता कि वह -बिचारा सवार-सहित काँप उठता। कैथराइन ने ऐसा लड़ाका आदमी कभी स्वप्न में भी नहीं देखा था।

जब इस विचित्र यात्रा से पेटरोकियो अपने घर आया तब उसने अपनी स्त्री को बड़े आदर-सत्कार से उतारा परन्तु यह बात पहले ही से निश्चय  कर ली थी कि आज इसको कुछ खाने को न मिलेगा। जिस समय भोजन  का समय आया और नौकरों ने मेज पर खाना रक्खा तब उसने एक-एक  करके सब रकाबियाँ भूमि पर फेंक दीं और तड़पकर कहने लगा, ''दुष्ट नौकरो! मेरी प्राणप्यारी ऐसा भोजन नहीं करती, आज पहले ही रोज  तुमने ऐसा बुरा भोजन बनाया है कि मैं एक सिरे से तुम सबको दण्ड दूंगा। पेटरोकियो की स्त्री और ऐसा बुरा खाना! छी! छी! छी! ''

जब कैथराइन दिन भर की थकी हुई सोने के कमरे में गयी तब यह कहकर कि चारपाई ठीक नहीं है, चादर मैली है, तकिया में बिनोला चुभता है, उसने सब वस्त्र भूमि पर फेंक दिये। बिचारी कैथराइन सारी रात कुर्सी पर बैठी रही। जब कभी वह सो जाती तब पेटरोकियो बड़े जोर से अपने नौकरों पर चिल्ला पड़ता और कुपित हो कहता कि तुमने अच्छे वस्त्र न'- बिछाकर मेरी स्त्री का अपमान किया है।

दूसरे दिन भी उसने ऐसा ही किया। जब वह अपनी स्त्री के समीप जाता तब बड़ी चिकनी-चुपड़ी खुशामद की बातें बनाता परन्तु भोजन और सोने के समय वही हाल करता। खाना जमीन पर फेंकता, रकाबियाँ तोड़ता और नौकरों पर क्रुद्ध होता। दीन कैथराइन अब अपना सब लड़ाकापन भूल गयी। भूख के मारे उसे छठी तक की याद आती थी। छिपकर उसने नौकरों से प्रार्थना की कि कुछ खाना ला दो। परन्तु वे लोग पहले से सिखा - दिये गये थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि हम अपने स्वामी से डरते हैं, बिना आज्ञा के कुछ भी नहीं कर सकते।

इस प्रकार तंग आकर बिचारी कहने लगी, ''अरे, क्या इसने भूखों मारने के लिए विवाह किया था? भिखारी तक मेरे बाप के घर भोजन पाते हैं परन्तु मैं जिसने कभी भूख का नाम तक नहीं सुना था, बिना भोजन के मर रही हूँ। नींद के मारे मेरा सिर चकरा रहा है। यह मुझे सोने नहीं देता और कोलाहल से मेरा पेट भर रहा है। इस पर भी वह यह कहता है कि तुमसे प्रेम करता हूँ।''

जब कैथराइन अकेली बैठी ये बातें कर रही थी पेटरोकियो वहाँ पर आ गया और थोड़ा-सा खाना उसके सामने रखकर कहने लगा-''केट! प्यारी केट! तुम कैसे हो! क्या तुम्हें भूख नहीं है। देखो, मैं अपनी प्राण- प्रिया के लिए स्वयं खाना बनाकर लाया हूँ। यह दुष्ट नौकर अच्छा भोजन नहीं बनाते। मुझे आशा हैं कि तुम इसे अवश्य पसन्द करोगी।'' (कैथराइन को चुपचाप देखकर ) ''हैं! बोलती नहीं! क्या भूख नहीं है? अच्छा - नौकर इस रकाबी को उठा ले जाओ।''

कैथराइन का भूख के मारे दम निकल रहा था। उसका घमण्ड सब पानी हो चुका था। पहले तो उसे क्रोध आया फिर सोच-विचार कर कहने लगी ''नहीं नहीं, रकाबी को यहीं रहने दो।''

परन्तु पेटरोकियो का प्रयोजन कुछ और ही था। वह कहने लगा- ''प्यारी केट, जो मनुष्य थोड़ी-सी भी भलाई करता है उसे धन्यवाद देते हैं। मैंने तो ऐसी मेहनत से भोजन बनाया है, बिना मुमे धन्यवाद दिये मत खाओ। '

कैथराइन ने अपनी इच्छा के विरुद्ध चुपके से कहा, ' 'अजी! मैं तुम्हें धन्यवाद देती हूँ। ''

जब वह खाने लगी तब कहने लगा, ' 'प्रिय धीरे-धीरे खाओ। जल्दी खाने से स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। प्यारी केट, अब हम तुम्हारे पिता के यहाँ चलेंगे और खूब बहार रहेगी। तुम्हारे लिए एक उत्तम कोट, टोपियाँ- और सुनहरी अँगठियाँ बन रही हैं। '' इस बात को सच्चा करने के लिए एक बजाज और दर्जी को बुलाया। ये दोनों कैथराइन के लिए वस्त्र लेकर उपस्थित हो गये। अभी कैथराइन ने आधा पेट खाना भी नहीं (खाया था कि पेटरोकियो ने उसके सामने से थाली उठाकर नौकर को दे दी और कहा, ''अरे! क्या तुम खा भी चुकीं?''

बजाज ने एक बहुत उत्तम टोपी पेटरोकियो को दी और कहा, ''महाराज, यह वही टोपी है जिसके बनने की आपने आज्ञा दी थी। '' पेटरोकियो टोपी को देखते ही आग बबूला हो गया और कहने लगा- ' 'छी! छी! छी! यह भी कोई टोपी है?''

बजाज ने विनयपूर्वक कहा- ''महाराज! यह तो अच्छी टोपी है; क्या आपके पसन्द नहीं। ''

कैथराइन बोल उठी, ''हाँ, यह टोपी बहुत अच्छी है। मैं इसको लूँगी। ''

पेटरोकियो, ''नहीं नहीं, यह टोपी किसी काम की नहीं। ''

कैथंराइन, ''नहीं, यह टोपी बहुत सुन्दर है। सभ्य स्त्रियाँ ऐसी ही टोपी पहनती हैं। ''

पेटरोकियो-''अच्छा पहले सभ्य बनो, तब तुम्हें भी ऐसी ही टोपी मिल जायगी। ''

कैथराइन के शरीर में कुछ खाना खाकर थोड़ी-सी शक्ति आ गयी थी- इसलिए उसने तड़पकर कहा- ' अजी मुझे भी कुछ कहने दो, मैं अवश्य कहूँगी। मैं कोई बच्चा नहीं हूँ जो तुम मुझे बोलने नहीं देते। तुम तो क्या तुम्हारे बड़ों ने भी मुझे कभी नहीं रोका। सुनो और अगर नहीं सुन सकते तो कान बन्द कर लो। ''

पेटरोकियो इन कटु वचनों के उत्तर में कटु वचन कहना नहीं चाहता था। उसके पास कैथराइन के वशीभूत करने का एक बहुत अच्छा उपाय था। इसलिए उसने बात टालकर उत्तर दिया, ''हाँ ठीक है प्यारी, ठीक है; तुम सत्य कहती हो। यह टोपी वस्तुत: ठीक नहीं है। तुम जो इस टोपी से घृणा करती हो यह बात मुझे पसन्द है।''

कैथराइन, ''चाहे पसन्द हो या न हो! मुझे यह टोपी भली मालूम होती है। मैं इसे अवश्य लूँगी या किसी को न लूँगी।''

पेटरोकियो-''क्या तुम यह कहतो हो कि मैं कोट लूँगी? अच्छा अभी लो, तुम्हारे लिए एक अच्छा कोट मँगाता हूँ।''

इतने में दर्जी ने एक बहुत उत्तम कोट लाकर दिया। परन्तु पेटरोकियो की इच्छा यह थी कि कैथराइन न टोपी ले और न कोट। इसलिए कोट में भी बुराइयाँ निकालनी आरम्भ कीं और कहने लगा, ''राम राम, -कैसा बुरा कपड़ा लगाया है? अरे मूर्ख देख तो ये बाहें हैं या तोपें हैं।''

-दर्जी-''महाराज, आपने तो कहा था कि आजकल के रिवाज के अनुकूल बनाना। यह वैसा ही है।''

कैथराइन ने भी कहा कि मैंने ऐसा उत्तम वस्त्र कभी नहीं देखा।

पेटरोकियो ने इस झगड़े को बहुत काफी समझा और दर्जी और बजाज को कुपित होकर घर से निकाल दिया परन्तु गुप्त रीति से अपने नौकरों से कह रक्खा था कि जिस-जिस चीज को मैं नापसन्द कह कर लौटा दूँ उस को लेकर मोल चुका देना। बस ऐसा ही किया गया।


जब बजाज और दर्जी चले गये वह कैथराइन से बोला- ''प्यारी केट, चलो अपने पिता के घर चलो। अच्छे वस्त्र न सही। यही पहनकर चलेंगे।''

यह कहकर घोड़े तैयार कराये और कहा कि भोजन के समय तक बप्टिष्टा के घर पहुँच जायेंगे क्योंकि अभी सात ही बजे हैं। वस्तुत: यह प्रातःकाल न था किन्तु दोपहर के दो बजे थे। इसलिए कैथराइन ने नम्रता से कहा, ''मैं कह सकती हूँ कि दो बज गये होंगे। पिताजी के घर पहुँचते-पहुँचते ब्यालू का समय हो जायेगा।'' परन्तु पेटरोकियो का यह प्रयोजन था कि कैथराइन इतनी उसके वश में हो जाय कि जो कुछ झूठ- सच वह कहे उसी को स्वीकार कर ले। इसलिए वह कहने लगा- ''मैं जो कुछ करता या कहता हूँ तुम उसी को काट देती हो। अच्छा- मैं आज नहीं जाने का। मैं उस दिन चलूंगा जब उतने ही बजेंगे जितने मैं कहूँगा। '

दूसरे दिन से कैथराइन ने आज्ञापालन के नये गुण का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया और जब तक कि उसका अभिमान बिल्कुल नष्ट नहीं हो गया उसके पति ने उसे बप्टिष्टा के घर जाने नहीं दिया। थोड़े दिनों में कैथराइन ऐसी वशीभूत हुई कि विरोध का नाम तक भी भूल गयी। यहाँ तक कि जब वे दोपहर के समय बप्टिष्टा के घर को जा रहे थे और पेटरोकियो कह रहा था कि चाँद निकल रहा है, कैथराइन ने भूल से कह दिया ''यह सूरज है चाँद नहीं। ''

इसी बात पर पेटरोकियो बिगड़ बैठा और कहने लगा- ''अपनी माता के पुत्र की शपथ खाता हूँ। तुम्हारे पिता के घर चलने से पहले इस समय चाँद और सितारे निकल आवेंगे। नहीं तो मैं नहीं चल सकता। ''

यह कहकर वह अपने घर को लौट चला। कैथराइन अब कुटिल कैथराइन न थी किन्तु आज्ञाकारिणी स्त्री बन गयी थी इसलिए वह कहने लगी, ''चलो जी चलो! आधी दूर से भी अधिक आ गये हैं। अब लौटना ठीक नहीं है। सूरज, चाँद या सितारे, जो तुम कहो वही निकल रहे हैं। यदि तुम इस समय यह कहो कि दीपक जल रहा है तो ईश्वर की सौगन्ध मैं ऐसा ही मान लूँगी। ''

पेटरोकियो यह बात सिद्ध करना चाहता था इसलिए उसने कहा, ''मैं कहता हूँ कि चाँद निकल रहा है।'' कै०-''हाँ मैं भी जानती हूँ कि चाँद निकल रहा है।'' पेट०-''नहीं, तुम झूठ बोलती हो यह तो सूरज है। '' कै०-' 'ठीक, तो यह सूरज ही है परन्तु जब इसको सूरज नहीं कहते तो ? सूरज नहीं रहता। इसका जो कुछ तुम नाम रख दो, कैथराइन इसको सदा उसी नाम से पुकारा करेगी। ''

अब पेटरोकियो आगे बढ़ा। लेकिन थोड़ी दूर जाकर उसने फिर यह जाँच करनी चाही कि देखें कैथराइन अभी बिल्कुल वश में हुई या नहीं। ? इसलिए मार्ग में एक बुड्ढे आदमी को आता देखकर यह कहने लगा, !'सुन्दरी! राम राम। '' ( फिर कैथराइन से ) ''प्यारी केट क्या तुमने कभी ऐसी रूपवती स्त्री देखी है? देखो, इसका मुख चाँद सा चमक रहा है। इसकी आँखें तारागण के समान हैं। ' ( बुड्ढे से ) ''सुन्दरी, राम राम लो! '' ( कैथराइन से ) ''केट, इस सुन्दर स्त्री को गले लगाओ।'' कैथराइन अब बिल्कुल वशीभूत हो चुकी थी इसलिए उसने कहा, ' 'हे कुमारी, तुम बड़ी रूपवती हो, तुम्हारे सौन्दर्य और यौवन को देखकर मुझे बड़ा आनन्द होता है। तुम कहाँ से आईं और कहाँ जाती हो? ''

पेटरोकियो -''अरे केट! क्या तुम पागल हो गयी हो। यह तो एक बुड्ढा खुर्राट है। सुन्दरी युवती नहीं है! ''

कै०-(बुड्ढे से) ''बुड्ढे बाबा! क्षमा करो! धूप में मेरी आँखें चौंधिया गयी हैं! और मुझे हरा ही हरा दीखता है। अब मुझे मालूम हुआ कि तू बुड्ढा मनुष्य है। मुझसे भूल हुई। क्षमा कीजिये। ''

पेट०--( उसी बुड्ढे से ) ''बूढ़े जी तुम कहाँ जाते हो? यदि तुम हमारे साथ चलोगे तो हमें खुशी होगी। ''

बूढा-''हे महाशय और श्रीमती! तुम्हारी यहाँ भेंट होनी बड़ी आश्चर्य- जनक है। मेरा नाम विसेनशियो है और मैं पादुआ को अपने पुत्र के पास जा रहा हूँ।''

अब पेटरोकियो को मालूम हुआ कि यह भद्र पुरुष लूसेनशियो का बाप है। लूसेनशियो की बप्टिष्टा की पुत्री वयंका से मँगनी हो चुकी थी और अब वह उसका विवाह करने को तैयार था क्योंकि कैथराइन से उसका पीछा छूट चुका था।

जब वे सब साथ-साथ बप्टिष्टा के घर पहुँचे तब एक बरात की बरात एकत्रित हो रही थी क्योंकि उसी दिन वयंका का विवाह होने वाला था। बप्टिष्टा ने उन सबका बड़ा आदर-सम्मान किया। उस समय इस सभा में 'एक और स्त्री पुरुष थे जिनका विवाह भी उसी दिन हुआ था।

वयंका का पति लूसेनशियो और होरटेंशियो( जिसका विवाह भी उसी दिन हुआ था ) पेटरोकियो को देखकर उसकी हँसी कर रहे थे किस लड़ाका से तुमने विवाह किया है। ये लोग समझते थे कि हमारी स्त्रियाँ आज्ञा- कारिणी हैं। पहले तो पेटरोकियो ने कुछ न कहा परन्तु जब सब स्त्रियाँ भोजन करने भीतर चली गयीं तब वह कहने लगा कि नहीं मेरी स्त्री लड़ाका नहीं है। पेटरोकियो ने देखा कि और तो और बप्टिष्टा भी उपहास करता है और कहता है कि ''बेटा, तुम जो कुछ कहो, तुम्हारी स्त्री के समान कुटिल स्त्री पृथ्वी पर कभी उत्पन्न नहीं हुई।''

पेटरोकियो ने कहा कि अच्छा इसकी जाँच एक तरह हो सकती है, हम  तीनों शर्त बदें और अपनी-अपनी स्त्री को बुलावे। जिसकी स्त्री जल्दी चली  आवे वही बाजी जीत जाये।

लू सेनशियो और होरटेनशियो ने बड़ी प्रसन्नता से यह बात स्वीकार कर ली और बीस-बीस मुद्रा की शर्त बदी। पेटरोकियो ने हँसकर कहा, ''वाह, बीस-बीस मुद्रा तो तीतर और बटेर पर लगा देते हैं। स्त्री के लिए  कम-से-कम बीस गुनी रकम होनी चाहिए।''

इस पर उन दोनों ने सौ-सौ मुद्रा की शर्त बदी। पहले लूसेनशियो ने वयंका को बुलाने आदमी भेजा। लेकिन उसने  लौटकर उत्तर दिया- ''महाशय, श्रीमती कहती हैं कि हम काम कर रहे हैं और आ नहीं सकते। ''  पेटरोकियो बोला, ''आहा! क्या उनको काम है? और आ नहीं सकतीं? क्या स्त्रियों को पतियों की आज्ञा इसी प्रकार पालनी चाहिए? ''

इस पर वे दोनों हँसे और कहा, ''घबराओ मत, अभी कैथराइन का उत्तर तो सुनो, यदि वह इससे भी बुरा न हो तभी कहना।''

अब होरटेनशियो की बारी आयी। उसने अपने आदमी से कहा, ''मेरी स्त्री से प्रार्थना करो कि वह यहाँ चली आवे। '' पेटरो०-''वाह वाह! प्रार्थना करो! फिर वह अवश्य ही आ जाएँगी।' ' होरटे ०-''अजी साहब, आपकी स्त्री तो प्रार्थना पर भी न आवेगी। '' परन्तु थोड़ी ही देर पीछे इस सभ्य पति का मुँह फीका पड़ गया। जब उसका नौकर लौटा तो उसने पूछा- ''कहो, मेरी स्त्री कहाँ है?''

नौकर ने उत्तर दिया- ''वे कहती हैं कि तुम कुछ हँसी कर रहे हो। इसलिए वे नहीं आ- सकतीं यदि जाना है तो आप ही जाइये। ''

पेटरोकियो ने कहा कि यह और भी बुरा उत्तर है। फिर उसने नौकर से कहा, ''जाओ और मेरी स्त्री से कहो कि मेरा हुक्म है, वह अभी यहीं - आवे। ''

सब लोग अभी कुछ सोचने भी न पाये थे कि बप्टिष्टा बड़े आश्चर्य में- होकर बोल उठा, ' 'ओहो, ईश्वर की सौगन्ध, कैथराइन तो आ रही है। ''

कैथराइन ने आकर कहा- ''श्रीमन्, आपकी क्या आज्ञा है। '' पेटरो ० - ''तुम्हारी बहन और पेटरोकियो की स्त्री क्या कर रही हैं?'' कैथ० -''आग के पास बैठी बातें कर रही हैं। '' पेटरो ०-''अच्छा अभी उनको यहाँ ले आओ! '' कैथराइन फौरन बिना कुछ कहे आज्ञा पालन करने को चल दी-

लूसेनशियो बोला, ''बड़े आश्चर्य की बात है! '' होरटेनसियो, ' 'इससे भी अधिक क्या आश्चर्य हो सकता है? इससे- क्या प्रकट होता है?' पेटरो० -- ''इससे शान्ति प्रकट होती है, प्रेम प्रकट होता है और आनन्द प्रकट होता है।“

बप्टिष्टा ने कहा, ' 'बेटा पेटरोकियो, तुमने बाजी जीत ली। मैं इसमें- बीस हजार मुद्रा और मिलाता हूँ। मैं समझूँगा कि मेरी एक और लड़की थी। तुमने इसको ऐसी शिक्षा दी है कि मैं समझता हूँ मेरी पहली लड़की बदलकर यह सुशील लड़की आ गयी है।''

पेटरो ०-''नहीं नहीं, अभी तो मुझे एक और बाजी जीतनी है। अभी आपको मैं दिखाता हूँ कि मेरी स्त्री ने आज्ञापालन के गुण का कितना अध्यास किया है। '' ( कैथराइन को आता देखकर ) ''देखिये, कैथ- राइन आपकी स्त्रियों को यहाँ ला रही है। प्रतीत होता है कि पहले इनकी इच्छा यहाँ आने की न थी। सुशीला कैथरायन ने उनको उपदेश दिया और तब वह उनको यहाँ लायी है।''

( कैथ से) ''केट! तुमको यह टोपी शोभा नहीं देती। इसे उतारकर पैर के नीचे कुचल डालो।'

कैथराइन ने टोपी उतारकर झट पैर से कुचल डाली। होरटेनसियो की भार्या कहने लगी ''क्यों स्वामिन्, यह क्या बात है कि मुझे इस तरह बुलाते हो।''

वयंका ने कहा, ''वाह वाह! यह भी कुछ आज्ञापालन है। यह तो मूर्खता है“

वयंका का पति बोला, ''मेरी अभिलाषा है कि तुम भी ऐसी ही मूर्ख बनो। तुम्हारी बुद्धिमत्ता ने तो आज मेरे सौ रुपयों का नाश कर दिया।''

वयंका ने उत्तर दिया, ''तो तुम भी मूर्ख हो कि ऐसी शर्तें बदते हो। ''

इस पर पेटरोकियो ने कैथराइन से कहा कि इन स्त्रियों को अपने पति की आज्ञा पालन के लाभ बताओ।

कैथराइन ने इस गुण का भली प्रकार अभ्यास किया था इसलिए उसने खड़े होकर इस विषय पर ऐसा उत्तम व्याख्यान दिया कि सब चकित हो गये और पादुआ में फिर कैथराइन प्रसिद्ध हो गयी परन्तु 'कुटिलता' के लिए नहीं किन्तु 'पति सेवा' के लिए।

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(शेक्सपियर के नाटक - प्रकाशक : पुस्तकायन से साभार. रूपांतर - गंगाप्रसाद उपाध्याय)

(शेक्सपियर के अन्य प्रसिद्ध नाटक हैं - सिम्बेलिन, मिड समर नाइट्स ड्रीम, दि मर्चेन्ट ऑफ वेनिस, मैकबेथ, जूलियस सीजर, दि टेम्पेस्ट, रोमियो जूलियट, एज यू लाइक इट, दि विन्टर्स टेल, पैरिक्लिस, किंग लियर)

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  1. शठे शाठ्यम समाचरेत ...इतना प्रांजल भावानुवाद! गंगाप्रसाद उपाध्याय जी को नमन !
    बाकी तो ब्लॉग जगत की कुछ धुरंधराओं को यह नाट्य -अनुवाद जरुर पढना चाहिए

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह मजा आ गया,लेख में काफी विस्तार पूर्वक पत्नी को पति का आज्ञाकारी बनने की शिक्षा प्रदान की गई है....

    उत्तर देंहटाएं
  3. WOW ..BAHUT KHUB MAJA AA GYA ..BAHUT ACHCHHI BAAT HAI

    उत्तर देंहटाएं
  4. Shecspear Guru dev Aap mahan hai

    Aap amar rahe

    उत्तर देंहटाएं

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