सोमवार, 7 नवंबर 2011

विजय जोशी के हाइकु

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घना कोहरा

खिड़कीसे चिपका

श्वेत परदा!

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येशुने कहा

थका हूँ क्रॉस पर

उतारो मुझे

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सुवर्ण सृष्टि

सोनेका असमान

ताम्र सूर्यास्त

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वर्षा सजावे

सप्तरंगी रंगोली

आयी दिवाली

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हवाका झोंका

गुलाबको हिलाये

गिरी खुशबू

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रंगीला सूर्य

शर्माई दुल्हनसी

गुलाबी संध्या

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सुवर्ण सृष्टि

सोनेका आसमान

भव्य सूर्यास्त

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आंखमें आंसू

बहते हैं दुखमें

सुखमें कभी

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लेखक परिचय:

My name is vijay joshi. I have lived in USA for last 40 years. An engineer by training,spent my life in USA is sales and marketing and now in retirement love to follow my lifelong passion for books. I write poems in Hindi, English, Marathi and Gujarati.

Vijay Joshi

Do anything, Do nothing.

Retirement is freedom!

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