मंगलवार, 8 नवंबर 2011

विजय जोशी के कुछ और हाइकु

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प्रभातकाल

धुन्धने चुरा लिये

ज़मी-आसमां,

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ओसकी बूंदें

गिरी पन्नों परसे

आसुओं जैसी

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वृद्ध पन्नोंने

पहेने पीले वस्त्र

लेने समाधि

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आतिशबाजी

मेघराजका लग्न

भूमिके साथ

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नीले पानीसे

मिला नीला आकाश

लुप्त क्षितिज

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इस दिवाली

आती यादें पुरानी

नये देसमें

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हवाका झोंका

तालाबके पानीमें

चन्द्रमा कांपे

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काला बादल

छुपा मृगजलमें

खो गया पानी

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रातकी गर्मी

चाँद कूदा नदीमें

उबले पानी

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शुभ्र बादल

जैसे रुईका गद्दा

ताज़ा बुना

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स्वपरिचय:

My name is Vijay Joshi. I have lived in USA for the last 40 years. Although engineer by training,

I have spent my entire life here in sales, marketing and in developing my own business. My  passion always has been literature but  during my active younger days, could not find enough time to follow it. Now actively retired, I spend a lot of time reading non-fiction English books in  Literature, Scince, Philosophy, hiking, travelling  etc eclectic activities.

I write poetry in English, Hindi, Gujarati and Marathi.  I am very impressed with your website whichI found very recently and love it. I commend your entire team for tireless work that you all mustput in. I wish you continued success. 

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Vijay joshi 

Do anything, Do nothing.

Retirement is freedom!!

1 blogger-facebook:

  1. ratme chand ka naadi me kudana pani ka ubalana
    tatha vriddh pannoka pilapdna samadhiki kalpana
    Anuthikalpana uttam bhaw

    उत्तर देंहटाएं

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