संजय दानी की ग़ज़ल - मिले न राधा तो सलमा से ना ग़ुरेज़ करो, कि बेवफ़ाओं की गलियों की चाकरी कम हो।

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हमारा घर भी जला दो जो रौशनी कम हो,
हमारी झूठी मुहब्बत की बानगी कम हो।

अगर ग़रीबों की करनी है सेवा, ये तभी हो
सकेगा जब ख़ुदा-ईश्वर की बंदगी कम हो।

पड़ोसी ,दोस्ती के बीज़ गर न रोपे तो,
हमारे खेतों से क्यूं फ़स्ले दुश्मनी कम हो।

मिले न राधा तो सलमा से ना ग़ुरेज़ करो,
कि बेवफ़ाओं की गलियों की चाकरी कम हो।

कभी संवारा करो ज़ुल्फ़ों को सरेबाज़ार,
तराजुओं के इरादों की गड़बड़ी कम हो।

उतार दूं तेरी आंखों के दरिया में कश्ती,
तेरी ज़फ़ाओं की गर धरती दलदली कम हो।

उंचे दरख़्तों से क्या फ़ायदा मुसाफ़िर को,
किसी के काम न आये वो ज़िन्दगी कम हो।

भले दो घंटे ही हर कर्मचारी काम करे,
मगर ये काम हक़ीक़ी हो काग़जी कम हो।

मिलेगी मन्ज़िलें कुछ देर से सही दानी,
हमेशा जीत की दिल में दरीन्दगी कम हो।

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2 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - मिले न राधा तो सलमा से ना ग़ुरेज़ करो, कि बेवफ़ाओं की गलियों की चाकरी कम हो।"

  1. वाह! वाह!
    बहुत खूब दानी जी.

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  2. Tarajuo ke irado ki garbari kam na ho
    Sanjay ji vah kya kahne

    उत्तर देंहटाएं

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