सत्यप्रसन्न की दो लघुकथाएँ

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एन्काउन्टर

इंस्पेक्टर ठाकुर संहार सिंह पुलिस विभाग की आन बान और शान थे। एन्काउन्टर स्पेशलिस्ट के तौर पर उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। हर कामयाब एन्काउन्टर के बाद उनकी मूँछों की मोटाई और लंबाई में अपने आप उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती थी। विगत कई दिनों से वे कुख्यात स्मगलर और ड्रग सप्लायर गोगिया पठान की फ़िराक में थे। गोगिया 25-26 साल का गठीले बदन का खूबसूरत नौजवान था, और हाई सोसाइटी की हाई प्रोफाइल महफ़िलों की शान हुआ करता था। कहने वाले कहते थे कि गोगिया की वो आलीशान ज़िंदगी उसके नापाक धंधे की नापाक कमाई के ही कारण थी।

उस रोज रात 2 बजे तूफानी हवा और तेज बारिश के कारण शहर की बिजली गुल थी। इंस्पेक्टर संहार सिंह को मिली टिप के अनुसार उसी वक़्त गोगिया को पार्क की पीछे वाली गली में किसी से मिलने आना था। योजना बनाकर पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया। जैसे ही बरसाती पहने ठीक गोगिया की ही कद काठी का एक व्यक्ति गली से बाहर निकला, चारों ओर से गोलियों की बौछार ने उसे वहीं ढेर कर दिया। ठीक तभी इंस्पेक्टर संहार सिंह के मोबाइल की घंटी बजी। उनकी पत्नी दूसरी तरफ से घबराये स्वर में कह रही थी कि उनका जवान बेटा अविनाश, अपने किसी मित्र से मिलने गया था और अब तक घर नहीं लौटा था। संहार सिंह ने देखता हूँ कह कर मोबाइल बंद कर दिया।

किंतु अपने अविनाश को वे फिर कभी नहीं देख पाये।

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शर्मा जी का बगीचा

शर्मा जी पिछले वर्ष ही इस सरकारी बंगले में शिफ़्ट हुए थे। पेशे से सिविल इंजिनियर, पर्यावरण एवं संगीत के प्रेमी शर्मा दंपति को बागवानी का बड़ा शौक़ था। हाँलाकि उनका योगदान पौधों कि साज़-सम्हाल में केवल पानी डालने तक ही सीमित था। बाकि का सारा काम दो सरकारी माली किया करते थे। उस बार श्रीमती शर्मा कुछ हाई ब्रिड क्वालिटी के गुलाब के पौधे लाई थीं। जो सारी मेहनत-मशक्कत के बावज़ूद ठीक से पनप नहीं पा रहे थे। उनके मालियों ने बताया कि बगीचे कि बाउंड्री में जॊ ५०-६० वर्ष पु्राना साल का पेड़ है, उसकी छाया के कारण ही गुलाब ठीक से फूल नहीं पा रहे हैं।तुरंत आदेश हुआ कि पेड़ को काट दिया जाए। किंतु, फिर इस डर से कि, हरे वृक्ष को काटने से आपराधिक प्रकरण दर्ज़ हो सकता है, एक दूसरा ही नायाब तरीका अपना गया। उस मोटे हरे-भरे विशाल वृक्ष के तने के धरती से ठीक ऊपर के भाग की छाल को गहराई से छीलकर निकाल दिया गया, और किसी अनजान क़िस्म के रसायन का लेप कर दिया गया।

दो माह के भीतर ही वह विशाल पेड़ मानो शापग्रस्त होकर पूरी तरह से सूख गया। चूँकि सूखा (मरा हुआ) पेड़ कभी भी गिर कर ख़तरा बन सकता था, इसलिये आनन- फानन में उसे काट दिया गया।

आजकल शर्मा जी के बगीचे के गुलाबों की बड़ी शोहरत है। लोग दूर-दूर से उन्हें देखने आते हैं।

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"सत्यप्रसन्न"

कोरबा (छ.ग.)

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