हिमकर श्याम की कविता - विवशता

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विवशता

एक के बाद एक

फंसते जा रहे हैं हम

समस्याओं के

दुर्भेद चक्रव्यूह में।

 

चाहते हैं

चक्रव्यूह से बाहर निकल

मुक्त हो जाएं हम भी।

 

रोज प्रत्यंचा चढ़ जाती है

लक्ष्य वेधन के लिए

लेकिन असमर्थताएं

परास्त कर जाती हैं

हर तरफ से।

 

शायद-

हो गये हैं हम भी

अभिमन्यु की तरह।

 

काश!

इससे निकलने का

भेद भी

बतला ही दिया होता

अर्जुन।

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हिमकर श्याम

द्वारा: एन. पी. श्रीवास्तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांची-8, झारखंड.

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1 टिप्पणी "हिमकर श्याम की कविता - विवशता"

  1. anup kumar9:51 am

    sach aaj har aadmi kisi na kisi chakrvyuh mein phansa hua hai. ati sundar.

    उत्तर देंहटाएं

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