शनिवार, 12 नवंबर 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविता - मेरे शहर में

अब मेरे शहर में

कुछ नया ही प्रयोग होगा

पानी को बर्फ में बदलने के बाद

आदमी को पानी में बदलना होगा

कोई ज़रूरी नहीं

आदमी की रगों में खून का बहना

पानी ही अब रखेगी ज़िन्दा आदमी को

 

आपको पता हो /या न हो कि

एक चेहरे के लिए

प्रयोग किए जा रहे हैं कई मुखौटे

खाना खाने के बाद सौंफ की तरह

मन साफ करने के लिए

प्रयोग किया गया सम्बंध

अब जल्द ही बन्द होगा फ्रिज़ में

वक्त ज़रूरत पेश करने के लिए

 

सत्य असत्य की मीमांसा

नहीं करता मेरा शहर

मेरा शहर सिर्फ भेड़ चाल है

मेरे शहर में अब कुछ नए प्रयोग होंगे

घटती हुई इंसानियत के कारण

जानवर को आदमी में बदलने होंगे |

---

 

मर जाओगे इसी तरह

मर जाओगे इसी तरह

एक दिन तुम, रात के अन्धेरे में

बन्द कमरे में जिस्मों की सीलन

और संबंधों की घुटन लिए |

 

मर जाओगे इसी तरह एक दिन तुम

कलम को पकड़े हुए

या कागज़ को बांचते हुए

कोई नहीं याद करेगा तुम्हें ईशा की तरह

नहीं ज़िक्र होगा तुम्हारा इतिहास में

बस यूं ही ग़ुम हो जाओगे

जैसे सिगरेट का धुंआ

विलीन हो जाता है वातावरण में |

 

मर जाओगे इसी तरह एक दिन तुम

आस्थाओं की जड़ में देते हुए पानी

सत्य का उद्घाटन करते हुए

या अपनी सार्थकता सोचते सोचते

मर जाओगे एक दिन तुम |

 

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ए रामानन्द नगर ,अल्लापुर इलाहाबाद

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