मंगलवार, 29 नवंबर 2011

कृष्ण गोपाल सिन्हा का व्यंग्य - रामलीला मैदान के बहाने

जनार्दन जी एक दिन अपने बाललीला के दिनों को याद करते-करते रामलीला को याद करने लगे. कहने लगे, जब रामलीला के दिन आते तो बड़े उत्साह के साथ छोटे, बड़े और मझले, बड़े, बूढ़े और जवान, बच्चे, बच्चियां और महिलायें, दादी, अम्मा, बुआ, चाची और बहनें सभी को रामलीला अच्छा लगता था, सभी जाते थे. घरों के लडके और बड़े रामायण के अलग-अलग पात्रों के रूप में अभिनय करते थे. लड़कों में से ही राम, लक्ष्मण के अलावा सीता की भूमिका भी कोई लड़का ही करता था, दशरथ, जनक, रावण, हनुमान, अंगद भी लोग बनते थे. बंदरों की सेना में बच्चों को आनंद आता था. एक मंडली रामायण की चौपाइयों का गायन करता था और उसी के अनुसार कथानक और पात्रों के संवाद आगे बढ़ते थे. जनार्दन जी के गाँव के मास्टर साहब रिहर्सल पर पूरा ध्यान देते थे और स्टेज पर परदे के पीछे से पात्रों को संवादों को बोलने के लिए प्रोम्प्टिंग भी करते थे. क्या दिन थे, जनार्दन जी भी औरों की तरह रात को खाने-पीने से निवृत्त होकर रामलीला देखने जाते और भोर होने से पहले घर लौटते थे. जनार्दन जी से ही यह भी जानकारी मिली कि वे जब कभी रामलीला के दिनों में अपने ननिहाल में होते तो रामनगर की रामलीला देखने का सौभाग्य मिलता.

अपने बचपन में रामलीला देखने के दिनों को याद करते-करते वे अब और आज की दुनिया में आ गए. कहने लगे कि अगर रामानानद सागर नहीं होते, उनकी रामायण नहीं होती, दूरदर्शन के जगह-जगह एलपीटी टावर्स नहीं होते तो राम और रामायण से हमारे बच्चे कैसे परिचित हो पाते. सबका भला हो कि जो रामलीला देखने कभी नहीं गए, रामलीला के पात्रों को देखा नहीं, उनके संवादों को सुना नहीं वे भी रामलीला का मतलब जानते और समझते हैं.

जनार्दन जी की मान्यता है कि जिस तरह रामायण ने, रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने और उसके दूसरे पात्रों-चरित्रों ने भारतीय समाज को दिशा और प्रेरणा दी वह हमारे लिए बहुमूल्य है. हमारे राष्ट्रपिता ने उन्हीं राम के आदर्शों के अनुरूप रामराज्य की परिकल्पना की थी. उनका यह भी मत है कि उन्हीं राम और उनकी अयोध्या ने हमारे देश के सत्ताकांक्षी लोगों को राज्याभिषेक का सुअवसर और सौभाग्य प्रदान किया. जनार्दन जी को इस बात का मलाल और खेद है कि सत्तासीन होकर रामराज्य का सपना दिखाने वाले हमारे रहनुमा रामराज्य की एक झलक भी नहीं दिखा सके. यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है कि रामनामी नारे और झंडे को लेकर चलने वालों में कुछ रावणनामी लक्षण और गुण उभरने लगे और अब तो बस सत्ता के लिए लोग बेचैन और बेहाल रहने लगे है.

जनार्दन जी के स्वर से अब करुणा और वेदना टपकने लगी थी. वे कह रहे थे, ' अब न तो रामायण धारावाहिक है न रामलीला. ‘राम’ और ‘राम के अयोध्या’ वाले भी अब सुविधा और राज भोगी हो गए है. सन्यासियों को तो अब सत्ता में या सत्ता के करीब ही परम आनंद की अनुभूति होने लगी है. मुझे जनार्दन जी के विचारों और भावनाओं से कटुता की गंध आ रही थी. यह कटुता किसी व्यक्ति या व्यवस्था के प्रति न होकर इस बात के लिए थी कि जिनसे थोड़ी आस थी और जिन पर थोड़ा भरोसा था वे ही न काम कर पाए और न ही किसी काम के रहे. जनार्दन जी की ही तरह मैं भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सका था कि भरोसे लायक तो कोई भी नहीं रहा पर इनमे से ही किसी से काम चलाने की मजबूरी है.

इस बीच मेरे मन एक हार्दिक इच्छा पनपने लगी थी कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जनार्दन जी ही कोई हल या समाधान निकालें तो ठीक होगा. कोई हल या समाधान निकालने से पहले ही वे इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि रामलीला होता न होता, अगर रामलीला मैदान न होता तो क्या होता. अपने जिन नतीजों का खुलासा उन्होंने मुझसे करने की ज़हमत उठायी थी उनमे पहला तो यही था कि छोटे बड़े शहरों और राजधानियों में यदि इस तरह के मैदान न होते तो हमारा लोकतंत्र कैसे फलता-फूलता, हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों का प्रदर्शन कैसे और कहाँ होता. आखिर ऐसे मौकों पर जुटने वाले तमाशबीन और तमाशाइयों के लिए अपनी ताक़त और औकात दिखाने के लिए भरपूर जगह और फिर किसी मुसीबत के आने या ढाए जाने पर अफरा-तफरी और भागम-भाग के खुली जगह की भी दरकार तो होती ही है.

जनार्दन जी द्वारा जिस दूसरे नतीजे की बात मैं जान सका वह यह था कि हर किसी को अपने-अपने प्रदर्शन के लिए अपने-अपने ग्राउंड बनाने और अपने नाम से पंजीकृत कराने की लोकतांत्रिक छूट तो दी नहीं जा सकते थी इसलिए रामलीला मैदान और ऐसे दूसरे स्थल तो हमें वरदान स्वरुप मिले समझे जाने चाहिए. उनके इस निष्कर्ष का ठोस कारण यह भी था कि सब अपने-अपने मैदान बनाते तो कोई कॉंग्रेसी, कोई समाजवादी, कोई मार्क्सवादी, कोई जनसंघी मैदान आदि के नाम से जाने और पुकारे जाते. जिनके अपने नहीं होते वे किराए पर लेकर काम चलाते.

एक तीसरे नतीजे पर जनार्दन जी बहुत सोच-विचार के बाद पहुंचे थे कि जन लोकपाल बिल के पारित हो जाने पर रामलीला मैदान का नामांतरण और लोकार्पण जन लोकपाल मैदान के रूप में कर देना चाहिए. इसेसे जुडी दो और बातों पर जनार्दन जी ने स्पष्ट संकेत दिया था कि अब बाबाओं और संतों के लिए भी मैदानों का स्थायी आवंटन कर दिया जाना चाहिए क्योंकि अब उनकी गतिविधिधियाँ लगभग स्थायी और भारतीय लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य लगने लगी हैं.

जनार्दन जी के नतीजों और संकेतों से मैं कत्तई सहमत नहीं था. इसकी वजह यह थी कि एक ही टीम में रहकर भी जब लोग एक दूसरे से सहमत नहीं हो सकते तो मेरा भी जनार्दन जी से सहमत या असहमत होना मेरे लिए ज़्यादा और उनके लिए कम अहमियत रखता है.

जनार्दन जी का चौथा और अंतिम निष्कर्ष यह था कि इन मैदानों और स्थलों को लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए. इन सार्वजनिक स्थलों की गरिमा को बनाए रखना और मजबूत करना सभी की सोच होनी चाहिए. जनार्दन जी के इन नतीजों और निष्कर्षों से मैं अपना एक अलग से निष्कर्ष निकालना चाहता था. लेकिन मैं कई बातों को लेकर अपने को शंकाग्रस्त महसूस कर रहा था. इनमे से एक तो यह ही थी कि रामलीला मैदान की धरोहर तो नेताओं, संतों, बाबाओं और समाज सुधारको के काम तो आती रहेगी पर बच्चों के लिए खेल के मैदान बिल्डरों और रियल स्टेट के खेल में बचेंगे भी या नहीं. दूसरी निराधार और निर्मूल आशंका यह थी कि कहीं कालान्तर में आने वाली पीढियां राम, रामायण और रामलीला मैदान को बिस्मृत न कर दें. एक और बेतुका और बेहूदा आशंका यह भी हो रही थी कि कहीं इन मैदानों के नाम रामलीला मैदान से बदलकर अन्ना मैदान, बाबा मैदान वगैरह वगैरह न कर दिए जाय.

तत्काल मेरा ध्यान इस बात की और गया कि मेरी सारी शंकाएं अकारण और असंभव थीं. इससे मुझे बहुत बड़ी राहत मिली. मन को मैंने श्री राम की और मोड़ा. मैं अपने अंतर्मन से प्रभु से यह कामना करने लगा कि वे हमें सद्बुद्धि दें. वे उन्हें भी सद्बुद्धि दें जो मेरे और अन्ना के घोषित समर्थकों की तरह शंकाग्रस्त हैं. प्रेम से प्रेम और विश्वास से ही विश्वास मिलता है. महाप्रभु उनको भी राह दिखाए जो ह्रदय और अध्यात्म की बातों से ज़्यादा लोक और लोकाचार की ओर मुड़ने लगे हैं. ईश्वर हमारे अन्दर बुराइयों से लड़ने की ताक़त दे. हम नेताओं, बाबाओं और संतों की लीला से दूर राम की लीला देखें और धन्य हों.

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1 blogger-facebook:

  1. सटीक बहुत सुंदर आलेख,..
    मेरे पोस्ट 'शब्द' पर आइये स्वागत है,...

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