शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

साक्षी दीक्षित की कविता - मेरी खामोशियाँ

 

मेरी खामोशियाँ अक्सर चाँद से बातें करती है
रात की चादर तले बेचैन सी बातें करती है
परत दर परत खुलते जाते है कई ऱाज मेरे
चाँद की रौशनी इसी से तो बढ़ती जाती है

मेरी प्यारी बातों से ही तो चाँद का पोषण होता है
जिससे चाँद का तन्हा जीवन रोशन होता है
पर उसके जीवन में भी तो काल रात्रि आती है
जब दुबक जाता है चाँद तो मुझे उबकाई सी क्यों होती है

जब पुनः वह चाँद बुलाने पे मेरे , निकालता है चंद्कोर बन  ,
रौशनी मध्यम होती है , फिर से बातें होती है
वह चहकता है , महकता है , धीरे - धीरे बड़ा होता है
फिर वह रात आती है , जब चाँद की तारीफ होती है
चांदनी मुझसे जलती है , तभी तो टिमटिम करती है

पर ऐ चांदनी ना हो नाराज हमसे
हम तो बस एक दूसरे के गम बाँट लेते है
कुछ चाँद हंस लेता है ,कुछ में मुस्कुरा लेती हूं
कुछ वो रो लेता है कुछ में रो लेती हूं
कुछ ज़ख्म वो सी लेता है कुछ ज़ख्म मैं बयां करती हूं
कुछ वो ताज़ा हो जाता है कुछ मैं हल्का महसूस करती हूं

बातों बातों में रात यूं ही गुज़र जाती है
हम दोनों की यूं ही रातों में बातें होती है
मेरी खामोशियाँ अक्सर चाँद से बातें करती है

रात की चादर तले बेचैन सी बातें करती है

4 blogger-facebook:

  1. मेरी खामोशियाँ अक्सर चाँद से बातें करती है
    रात की चादर तले बेचैन सी बातें करती है
    परत दर परत खुलते जाते है कई ऱाज मेरे
    चाँद की रौशनी इसी से तो बढ़ती जाती है...सच में आपकी ख़ामोशी बहुत ही खुबसूरत रचना करती है.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ ज़ख्म वो सी लेता है कुछ ज़ख्म मैं बयां करती हूं
    कुछ वो ताज़ा हो जाता है कुछ मैं हल्का महसूस करती हूं
    vaha kya bat hai
    Achhi dosti hai aapki chand ji k saath

    उत्तर देंहटाएं
  3. sakshi10:40 pm

    dhanyawad aapki dono tippaniyo ka ........

    उत्तर देंहटाएं

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