शनिवार, 26 नवंबर 2011

रामवृक्ष सिंह की दो कविताएँ - बीत गई बरसात लो भइया आई प्यारी सरदी।

दो कविताएँ
डॉ. रामवृक्ष सिंह, लखनऊ



 
आई प्यारी सरदी
बीत गई बरसात लो भइया आई प्यारी सरदी।
सब ऋतुओं से रंग-रंगीली, सबपे भारी सरदी।


निकल रहे हैं स्वेटर मफलर निकल पड़े हैं टोपे।
रंग-बिरंगे ऊनी कपड़े दिखते हैं सड़कों पे।।


चुन्नू-मुन्नू पहन के जैकेट, मोजे और पजामे।
सेंक रहे हैं धूप, अंगुलियाँ दादी माँ की थामे।।


    बदल गई स्कूल में पढ़ने वालों की भी वर्दी।
बीत गई बरसात लो भइया आई प्यारी सरदी।


मंडी में पट रही है आकर नई-नई तरकारी।
क्या खाएँ क्या छोड़ें चिन्ता लगी हमें है भारी।।


सजे हुए आँवलों, संतरों, केलों के हैं ठेले।
निकल पड़े हैं सुर्ख पपीतों अमरूदों के रेले।।


        कुदरत ने हर झोली भइया खुशियों से है भर दी।
        बीत गई बरसात, लो भइया आई प्यारी सरदी।।


दादा ओढ़े रहें रज़ाई, दादी लेतीं शालें।
मम्मी उनकी खातिर हरदम काढ़ा-चाय उबालें।।


निकल गये हैं ट्रंक से कंबल, खेस, रज़ाई मोटी।
पिछले साल पहन के रक्खी कोटी हो गई छोटी।।


        मम्मी ने दीदी को जैकेट नई-नई लाकर दी।
        बीत गई बरसात, लो भइया आई प्यारी सरदी।।

गाजर का या मूँग का हलवा खाने का मौसम है
बैठे-बैठे मूँगफली चटकाने का मौसम है
बाहर धुंध घिरे जब घर में सिमटे कुनबा सारा
ऐसे में बस गरम पकौड़ी खाने का मौसम है


        पारित है प्रस्ताव लपककर मम्मी ने हाँ भर दी।
        बीत गई बरसात, लो भइया आई प्यारी सरदी।।


कपड़े नहीं हैं सूखे अब तक गए जो परसों धोए
ओस गिरे पेड़ों से ऐसे जैसे हैं सब रोए
धूप नहीं खिलती है जब तब सब उदास लगता है
सब प्रतीत होते रोगी से, या फिर सोए-सोए


        अब वसन्त को आ जाने दो, ओ सरदी बेदर्दी।
        बीत गई बरसात, लो भइया आई प्यारी सरदी।।

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हाय मेरे उत्तर प्रदेश को..


हाय मेरे उत्तर प्रदेश को फिर से बाँटा जाए रे।
शीष कट चुका पहले ही, अब धड़ भी काटा जाए रे।


नेताओं के निर्णय कैसे, वे जानें या उनकी माया।
हमने तो हर महानुभाव को बस बेहद खुदगर्ज ही पाया।
अपने हित साधन की खातिर सबने मिलकर जाल रचाया।
कल तक सारा प्रांत था अपना, आज अचानक हुआ पराया।
यह अलंघ्य दुर्नीति का सागर कैसे पाटा जाए रे।
हाय मेरे उत्तर प्रदेश को फिर से बाँटा जाए रे।


बढ़ती जाती है काशी से अब मथुरा की दूरी।
बुंदेलों से अवध बिछुड़ता, ये कैसी मजबूरी।
नहीं रहे अब ताज सीकरी और अलीगढ़ अपने
सेंध लगाकर घर को ढाना क्यों हो गया जरूरी।
फटा जा रहा मानचित यह कैसे साटा जाए रे।
हाय मेरे उत्तर प्रदेश को फिर से बाँटा जाए रे।


अब प्रयाग है अलग प्रांत में अलग हस्तिनापुर है
सदियों का नाता अपना क्या इतना क्षणभंगुर है
जिसे रचा गंगा-जमुना ने सदियों बड़े जतन से
खंडित करने को संस्कृति वह, हर नेता आतुर है
आओ इतिहासों का पन्ना पुनः उलाटा जाए रे।
हाय मेरे उत्तर प्रदेश को फिर से बाँटा जाए रे।


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